महर्षि वेदव्यास

By: Feb 8th, 2020 12:17 am

 हमारे ऋषि-मुनि, भागः 26

हे महर्षि व्यास यदि मेरे से पूछना ही चाहते हो, तो सुनो। तुमने धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष, इस चतुर्वर्ग को भली प्रकार समझाया है। फिर भी लोग धर्म,अर्थ और काम में फंसे रहते हैं। इन्हें मोक्ष का मार्ग विधिवत बताने की आवश्यकता है। वे भटके न रहें, यह समझाना जरूरी है। वे भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति पा सकें, ऐसा रास्ता बताना जरूरी है। महर्षि तुम तो सर्वज्ञ हो। तुमसे क्या कहूं? अब तुम विशुद्ध भगवदगुण वर्णन प्रधान भागवतपुराण का वर्णन करो…

वैवस्वत मन्वंतर में सत्ताइस व्यास हो चुके हैं। बीते द्वापर के अंत में भी वही भगवान कृष्ण द्वैपायन के नाम से पराशर ऋषि के घर पुत्र रूप में अट्ठाइसवें व्यासरूप में अवतरित हुए। माता थी सत्यावती। भगवान शंकर ने पराशर को व्यास जैसा पुत्र पाने का आशीर्वाद दिया था। पुत्र ऐसा हुआ कि जन्म लेते ही वन में जाकर तप करने की जिद करने लगा। मां को वचन दिया कि जब भी वह याद करेगी, पुत्र व्यास आ पहुंचेगा। स्वयं भगवान होते हुए भी संसार के सामने उन्होंने तपस्या का सुंदर आदर्श रखा। उन्होंने ही वेदों का विभाजन किया, ब्रह्मसूत्रों का प्रणयन किया, महाभारत व अठारह पुराणों की रचना की। उपख्यानों का सहारा लेकर वेदों को सरलतापूर्वक समझने योग्य बनाया। उन्होंने कर्म, उपासना तथा ज्ञान का विस्तार करने के लिए सब कुछ कर दिया। 

केवल दृष्टि से पैदा की वीर संतानें

महर्षि व्यास को माता सत्यवती का आदेश हुआ। उसी का पालन करने के लिए उन्होंने केवल दृष्टि के द्वारा पांडु, धृतराष्ट्र और विदुर जैसे महाबलियों व विद्वानों को जन्म दिया। इनके गुरुओं में पिता पराशर,गुरु वासुदेव, सनकादि आदि अनेक ऋषि हुए हैं। देवर्षि नारद ने आकर दर्शन दिए। बोले महर्षि लगता है, अभी आप अतृप्त हैं। आपने संजय को दिव्य दृष्टि देकर घर बैठे महाभारत देखने,भगवान का अर्जुन को उपदेश देने,गांधारी धृतराष्ट्र को मृत कुटुंब दिखाने, वेदों का विस्तार करने में तथा महाभारत ग्रंथ में वह सब कुछ पिरो दिया है, फिर भी आप असंतुष्ट! आश्चर्य। नारदजी से इतना सुनकर व्यासजी ने कहा, सचमुच मैं अतृप्त हूं। मुझे अभी कुछ ओर करना है। वह क्या है? मैं नहीं जानता। देवर्षि कृपा आप ही बताएं, मेरा मार्गदर्शन करें।

 नारदजी ने व्यासजी को चिंतामुक्त किया

हे महर्षि व्यास यदि मेरे से पूछना ही चाहते हो, तो सुनो। तुमने धर्म,अर्थ,काम, मोक्ष, इस चतुर्वर्ग को भली प्रकार समझाया है। फिर भी लोग धर्म,अर्थ और काम में फंसे रहते हैं। इन्हें मोक्ष का मार्ग विधिवत बताने की आवश्यकता है। वे भटके न रहें, यह समझाना जरूरी है। वे भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति पा सकें, ऐसा रास्ता बताना जरूरी है। महर्षि तुम तो सर्वज्ञ हो। तुमसे क्या कहूं? अब तुम विशुद्ध भगवदगुण वर्णन प्रधान भागवतपुराण का वर्णन करो। भगवान की कृपा हो गई और दर्शन दिए। उन्हीं की कृपा से अगला जन्म ब्राह्मणकुल में हुआ और अब उनकी लीला व गुणों का गायन करता, तीनों लोकों में विचरण करने योग्य हुआ हूं। अब तो उन्हें स्मरण करते ही अपने समक्ष पा लेता हूं। उन्हीं की गुणगान तुम भी करो। स्वयं शांति पाओ तथा त्रिलोकी को शांति पाने के साधन जुटाओ।

श्रीमद्भागवत की रचना

इसके बाद ही श्री व्यासजी ने परमहंस संहिता श्रीमद्भागवत की रचना की। यही वैष्णवों का वेद है। शुकदेव ने इसका निष्ठा व प्रेमपूर्वक अध्ययन किया। इसी से वह हरिरस में लीन रहने लगे। कहा जाता है कि भगवान वेदव्यास अभी भी हैं। समय-समय पर अधिकारी लोगों को दर्शन देते हैं। कहा जात है कि आद्य शंकराचार्य जी ने उनके दर्शन मंडनमिश्र के घर पर किए थे। महर्षि वेदव्यास को समझने के लिए उनके पुराणों का अध्ययन करना अनिवार्य है। तभी उनके विस्तृत जीवन की झलक मिल सकती है।                                                                                                                                – सुदर्शन भाटिया 

 


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