मां तो मां होती है

Feb 5th, 2020 12:20 am

रमेश की मां बोली, बेटा भले ही तुम बड़े हो गए हो, बड़े शहर में रहने लगे हो, भले  ही अच्छे-बुरे की ज्यादा समझ आ गई  हो, लेकिन मेरे लिए आज भी मेरे कलेजे का टुकड़ा ही हो…

मां एक को कंधे में उठा कर और छोटे भाई को अंगुली से पकड़ कर काम पर जाया करती थी, क्योंकि रमेश के पिता जी नहीं थे। इस तरीके से इनकी पढ़ाई मां ने करवाई थी। कुछ दिनों के बाद रमेश का छोटा भाई भी इस दुनिया से चल बसा। रमेश को बड़े शहर में नौकरी लग गई थी, तो उसकी मां ने उसकी शादी करवा दी, लड़की भी नौकरी करती थी। अब रमेश और पत्नी दोनों जॉब करते हुए एक साथ ही शहर में बस गए थे। कुछ दिनों के बाद रमेश अपनी मां को अपने साथ रहने के लिए शहर ले आया। शहर में आकर रमेश की मां खुद को एकदम अकेले पाती थी। इस तरह उन्हें भी अच्छा नहीं लगता था, लेकिन एक मां अपने बेटे की हमेशा खुशी ही चाहती है, सो धीरे-धीरे वह शहर में रहना भी सीख गई थी, लेकिन रमेश और उसकी पत्नी हमेशा अपनी मां को समझाते रहते थे, कि ऐसा मत करो, ये मत करो, लेकिन मां का दिल तो हमेशा से अपने बच्चों के लिए बड़ा ही होता है। वह सभी बातें चुपचाप सुनकर हां में हां मिलाती। एक दिन रमेश की पत्नी को आफिस जल्दी जाना था, सो वह सबकुछ जल्दी से तैयार करके रमेश का खाना पैक करके आफिस चली गई। रमेश भी जल्दी-जल्दी आफिस निकल गया था। कुछ समय बाद रमेश की मां ने देखा कि उसका बेटा तो खाने का लंच बॉक्स घर पर ही भूल गया है, तो मां ने बिना देर करते हुए लंच बॉक्स लेकर फटाफट आफिस पहुंच गई और पास में एक कुर्सी पर बैठ गई क्योंकि कंपनी में बाहर के व्यक्तियों को अंदर जाने के लिए मना था। बेटे को दिक्कत न हो इसलिए फोन न करके मैसेज किया, लेकिन रमेश अपने काम में बीजी था, सो मां के मैसेज पर ज्यादा ध्यान न दिया, लेकिन उसकी मां बाहर कब से उसका इंतजार कर रही थी। इस तरह कई घंटे बीत गए और इस बीच कई मैसेज भी किए, लेकिन रमेश का कोई उत्तर नहीं आ रहा था। इस तरह रमेश की मां को चिंता होने लगी थी। लेकिन रमेश अपनी मां के कई मैसेज आने के बाद वह  खूब गुस्सा होने लगा था। आज घर जाकर मां को खूब अच्छे तरह से समझा देगा कि यह उसका गांव नहीं है, जो कुछ भी मनमानी करती रहेगी और इस तरह शाम हो गई। अब रमेश घर जाने के लिए कंपनी से बाहर निकला तो देखा तो उसकी मां तो यहीं खड़ी है, जिसे देखकर उसका गुस्सा अब सातवें आसमान पर था और बिना कुछ पूछे ही अपनी मां को डाट फटकारने लगा कि पहले घर में खाली बैठे-बैठे मैसेज से परेशान करती रहती है और अब कंपनी में भी आ गई है आखिर उनका यह गांव नहीं है, जो मनमानी करती रहेगी। यह सुनकर रमेश की मां ने खाने का टिफिन रमेश की ओर आगे बढ़ा दिया, जिसे देखकर रमेश को अब समझते हुए देर न लगी कि वह अपना खाना भूल गया था, जिसे देने के लिए मां यहां आई थी। इसके बाद रमेश की मां बोली बेटा भले ही तुम बड़े हो गए हो, बड़े शहर में रहने लगे हो, भले ही अच्छे बुरे की ज्यादा समझ आ गई हो, लेकिन मेरे लिए आज भी मेरे कलेजे का टुकड़ा ही हो। रमेश की आंखे खुल चुकी थी कि आखिर उसकी मां उसकी परवाह करते हुए खाना लेकर आई थी। उसे अपने किए हुए पर बहुत पछतावा हो रहा था, जिसे देखकर मां ने उसे एक बार फिर से अपने गले लगा लिया, और इस तरह रमेश अब आगे से खुद को मां के लिए बदल लिया था,अब उनकी पहले से ज्यादा अच्छे से देखभाल करने लगा था ।

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