मार्शल आर्ट में रोजगार के बेहतर अवसर

मार्शल आर्ट में स्टूडेंट्स को दांव-पेंच स्टाइल तथा आघात पहुंचाने की कला सिखाई जाती है। अपराधियों से दो-दो हाथ करने के लिए इन दिनों मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण लेने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। गौरतलब है कि आत्मरक्षा अथवा शौकिया तौर पर अपनाया जाने वाला मार्शल आर्ट रोजगार का भी एक बेहतर विकल्प साबित हो रहा है…बिना किसी अस्त्र-शस्त्र की मदद से दुश्मन को घायल करना या परास्त कर देने की कला मार्शल आर्ट है। मार्शल आर्ट में स्टूडेंट्स को दांव-पेंच स्टाइल तथा आघात पहुंचाने की कला सिखाई जाती है। अपराधियों से दो-दो हाथ करने के लिए इन दिनों मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण लेने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। गौरतलब है कि आत्मरक्षा अथवा शौकिया तौर पर अपनाया जाने वाला मार्शल आर्ट रोजगार का भी एक बेहतर विकल्प साबित हो रहा है। सेना, पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों आदि में भी उन उम्मीदवारों को प्राथमिकता मिलती है, जिनके पास मार्शल आर्ट का हुनर होता है। विभिन्न क्षेत्रों में जिस तरह मार्शल आर्ट के प्रशिक्षित लोगों की मांग इन दिनों बढ़ रही है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में युवाओं के लिए अवसर ही अवसर हैं।

बोधि धर्म का वरदान

बोधि धर्म का जन्म कच्छीपुरम, तामिलनाडु के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 522 ईस्वी में वह चीन के महाराज लियांग नुति के दरबार में पहुंचे। उन्होंने चीनी बौद्ध भिक्षुओं को कलरियपट्टु की कला में प्रशिक्षण दिया।  शीघ्र ही वह शिक्षार्थी इस कला के पारंगत हो गए और प्रशिक्षण शिविर शाओलिन के नाम से विख्यात हो गया। बोधि धर्म को मार्शल आर्ट के साथ प्राण ऊर्जा (ची) और एक्यूपंक्चर को जोड़ने का भी श्रेय दिया जाता है।  बोधि धर्म ने मार्शल आर्ट का उपयोग आध्यात्मिक साधना के लिए आवश्यक शारीरिक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए किया था। बाद में चीन में इसका उपयोग आतताई शासकों के विरोध के लिए भी किया गया और शाओलिन टेंपल इसका सबसे बड़ा केंद्र बन गया।

महिलाओं के लिए महत्त्व

जैसा कि आज के परिप्रेक्ष्य में महिलाओं के लिए समाज में असुरक्षा का माहौल बना हुआ है। उनकी सुरक्षा के लिए हरेक स्तर पर कड़े कानून बनाए जा रहे हैं, लेकिन उन कानूनों का भी असर होता दिख नहीं रहा है। 16 दिसंबर, 2012 के दिल्ली गैंगरेप की घटना ने तो पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। ऐसे में इस कला को महिलाओं के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। मार्शल आर्ट की विशेषता यही है कि इससे खुद में आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना पैदा होती है। इस कला को सीखकर महिलाएं अपनी सुरक्षा स्वयं करने के काबिल हो जाती हैं। बडे़-बड़े शहरों, कस्बों और अब तो गांवों में भी अभिभावक अपनी लड़कियों को मार्शल आर्ट सिखाने के लिए भेज रहे हैं। मार्शल आर्ट की कला महिलाओं को किसी भी मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार करती है।

ब्रूस ली का योगदान

पश्चिम सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में मार्शल आर्ट को चर्चित करने का श्रेय काफी हद तक स्वर्गीय ब्रूस ली को दिया जाता है। बाद में 1960 और 1970 के दशक में बू्रस ली ने कई फिल्मों में अपनी इस कला का प्रदर्शन किया। उनकी तेजी और लचीलेपन ने पश्चिमी दुनिया को अपना दीवाना बना लिया। पश्चिमी मीडिया ने भी  मार्शल आर्ट के प्रति काफी दिलचस्पी दिखाई। ब्रूस ली की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी शैली कुंगफू  को ही दुनिया अधिकांश हिस्सों में मार्शल आर्ट का पर्याय माना जाता है। निश्चित तौर पर मार्शल आर्ट को पुनर्जीवित करने और प्रतिष्ठा दिलाने में ब्रूस ली की भूमिका अविस्मरणीय है।

मार्शल आर्ट के लाभ

प्रारंभ में मार्शल आर्ट का उद्देश्य आत्मरक्षा और जीवन का संरक्षण था। वर्तमान में प्रशिक्षु के लिए मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण अनेकों प्रकार से लाभ प्रदान करता है। ंमार्शल आर्ट के व्यवस्थित प्रशिक्षण से एक व्यक्ति का शारीरिक फिटनेस काफी हद तक बढ़ जाता है। इसके प्रशिक्षण से प्रशिक्षु में आत्म नियंत्रणए दृढ़ संकल्प और एकाग्रता की विशेषता उत्पन्न हो जाती है जो परिस्थितियों के अनुरूप हमेशा लाभकारी ढंग से और बिना तनाव के प्रतिक्त्रिया व्यक्त करता है। गंभीर रूप से प्रशिक्षण का परिणाम आत्मरक्षाए फिर और मजबूत आत्म नियंत्रण होता है। प्रत्येक व्यक्ति खुद की क्षमताओं  बारे में ही नहीं बल्कि सम्मान और न्याय की भावना में भी सुधार करता है।  युवा नशे की प्रवृति से दूर रहता है। मार्शल आर्ट की कला युवा को इस व्यसन से कोसों दूर रखती है और यह सबसे बड़ा लाभ है।

प्रमुख संस्थान

* ग्लोबल स्पोर्ट्स कराटे डू इंडिया, हैदराबाद

* अकेडमी ऑफ  कंबाइंड मार्शल आर्ट, अंधेरी वेस्ट, मुंबई

* फ्रेंड्स अकेडमी ऑफ  मार्शल आर्ट, झंडेवाला, दिल्ली

* सीडो कराटे इंडिया, नोएडा, उत्तरप्रदेश

* संजय कराटे स्कूल जालंधर, पंजाब

* ट्रेडिशनल स्कूल ऑफ  मार्शल आर्ट हुगली, पश्चिम बंगाल

* कुंगफू  कराटे अकेडमी, चंडीगढ़

परिचय और पात्रता

मार्शल आर्ट में ट्रेनिंग पूरी होने के बाद ब्लैक बैल्ट दिया जाता है। ब्लैक बैल्ट प्राप्त स्टूडेंट्स के लिए लिखित परीक्षा होती है, जो स्टूडेंट्स इसमें सफल होते हैं, उन्हें सर्टिफिकेट दिया जाता है। जूडो-कराटे के प्रथम चरण से लेकर ब्लैक बैल्ट तक के स्तर तक पहुंचने के लिए लगभग 3 से 4 वर्ष लग जाते हैं।

अवसर

मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित युवा बतौर मार्शल आर्टिस्ट सरकारी नौकरी हासिल कर सकते हैं। युवा चाहें तो जिम या फिटनेस  सेंटर के अलावा विद्यालयों या कालेजों में भी बतौर इंस्ट्रक्टर अपना भविष्य संवार सकते हैं। अपना प्रशिक्षण संस्थान खोलकर भी कमाई की जा सकती है।

योग्यता

मार्शल आर्ट सीखने के लिए उम्र सीमा नहीं है। हालांकि 10 से 25 वर्ष तक के युवा आसानी से इसे सीख सकते हैं। मार्शल आर्ट उनके लिए बेहतर है, जो मानसिक और शारीरिक रूप से फिट हैं। इसके साथ ही इस क्षेत्र में बेहतर करने के लिए कड़ी मेहनत और जोश आदि गुणों का होना आवश्यक है।

कमाई

मार्शल आर्टिस्ट बनकर करियर के प्रारंभिक दौर में 15 से 20 हजार रुपए प्रतिमाह तक अर्जित किए जा सकते हैं। कुछ वर्षों के अनुभव के बाद बेहतर सैलरी पाई जा सकती है।

इतिहास और विकास

एशियाई मार्शल आर्ट का आधार पुरानी भारतीय मार्शल आर्ट और चीनी मार्शल आर्ट का मिश्रण लगता है। चीन के इतिहास में दृढ़ राज्यों की अवधि के दौरान मार्शल दर्शन और रणनीति का व्यापक विकास हुआ। एशिया में मार्शल आर्ट की शिक्षा ऐतिहासिक रूप से गुरु-शिष्य प्रणाली की सांस्कृतिक परंपरा का अनुकरण करती आई है। छात्र एक सख्त पदानुक्रम व्यवस्था में एक गुरु प्रशिक्षक द्वारा प्रशिक्षित किए जाते हैं। आग्नेयास्त्रों के आविष्कार के बाद इस मार्शल आर्ट की लोकप्रियता और महत्त्व में कमी दर्ज की गई। भारतीय मार्शल आर्ट के रूप में सर्वाधिक लोकप्रिय केरल के कलरियपट्टु का पुनरुत्थान 1920 के दशक में  हुआ और पूरे दक्षिण भारत भर में फैला। अन्य भारतीय मार्शल आर्ट जैसे थांगटा का विकास 1950 के दशक में देखा गया।

शैलियां

यूरोप मार्शल आर्ट की कई व्यापक प्रणालियों का घर है। इसमें से अब कुछ ही अपने पारंपरिक रूप में उपलब्ध हैं। जोगो डु पाओ और सेवेट जैसी मार्शल आर्ट की पारंपरिक शैलियों के दर्शन अब भी यूरोप में कहीं- कहीं हो जाते हैं।  ब्रूस ली की शैली कुंगफू  के प्रभाव में अब पश्चिम के सभी देश आ गए हैं। प्रत्येक शैली के अद्वितीय पहलू उसे दूसरी मार्शल आर्ट से अलग बनाते हैं, लेकिन लड़ाई की तकनीकों का प्रबंधन एक ऐसा लक्षण है, जो सभी शैलियों में पाया जाता है। प्रशिक्षण के तरीके भिन्न होते हैं और उनमें मुक्केबाजी का अभ्यास, कृत्रिम लड़ाई या औपचारिक समूह या तकनीकों का व्यवहार हो सकता है, जिन्हें काता के नाम  से जाना जाता है। एशिया और एशिया से आई मार्शल आर्ट में काता का विशेष महत्त्व होता है। आज पूरी दुनिया में कुंगफू , गोजू रियू, ताइक्वांडो और जूडो का विशेष रूप से प्रचलन है। पहली तीन शैलियों में आक्रमण, जबकि जूडो में आक्रमण की बजाय बचाव पर अधिक बल दिया जाता है।

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