हाउडी मोदी से नमस्ते ट्रंप तक

विकेश कुमार बडोला

लेखक, उत्तराखंड से हैं

ट्रंप की ओर से की गई ऐसी अनुत्पादक बातों का औचित्य केवल देशी-विदेशी उन नेताओं, मीडिया कर्मियों तथा लोगों के लिए ही है, जो उन्हें अमरीका में राष्ट्रपति के रूप में नहीं देखना चाहते। भारत-अमरीका के मैत्रीपूर्ण संबंधों को एक नई राह पर चलता हुआ देखने के इच्छुक अधिसंख्य अमरीकियों तथा भारतीयों के लिए तो हाउडी मोदी से लेकर नमस्ते ट्रंप तक दोनों देशों के मध्य कई क्षेत्रों में प्रगति करने के उद्देश्य से अनेक साझीदारियां हुई और हो रही हैं…

लोकतंत्र के प्रति राजनीतिक दायित्व की बात उभरती है, तो अमरीका और भारत दोनों ही देशों के लिए यह महत्त्वपूर्ण कारक है। जहां अमरीका को दुनिया का सबसे प्राचीन लोकतंत्र माना जाता है, वहीं भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की विसंगतियों का सामना करते हुए तथा लोकतंत्र की सुंदर पुस्तकीय धारणाओं को एक-एक करके धराशायी होते देखकर भी सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों को भविष्य के लिए आशा व विश्वास का वातावरण बनाना पड़ता है। सत्ता में रहते हुए हर नेतृत्व इस दायित्व से बंध जाता है। अमरीका के लिए ट्रंप और भारत के लिए मोदी इसी परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। अपनी दो दिवसीय भारत यात्रा के पहले दिन अहमदाबाद के मोटेरा क्रिकेट मैदान में अयोजित नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम में डोनाल्ड ट्रंप ने लोकतंत्र के इसी महत्त्व पर अपना सार्वजनिक संबोधन केंद्रित रखा। मोदी ने भी लोकतंत्र की इसी पुस्तकीय सुंदरता पर अपने भाषण को केंद्रित रख ट्रंप का स्वागत और धन्यवाद किया। ट्रंप की भारत यात्रा के संबंध में भारतीय ही नहीं अपितु अमरीका मीडिया और विपक्षी नेतागण तरह-तरह की बातें व्यक्त कर रहे हैं। देशी-विदेशी विरोधियों के अनुसार ट्रंप की यात्रा का मुख्य उद्देश्य नवंबर 2020 में अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए अमरीका के चालीस-पचास लाख भारतीय नागरिकों को अपने पक्ष में करना है। ट्रंप को ज्ञात है कि भारतीय मूल के जिन प्रभावशाली व्यवसायियों की अमरीकी व्यापार जगत पर ठोस पकड़ है उनमें अधिसंख्य गुजरात के हैं। इतना ही नहीं, अमरीका के 40-50 लाख भारतीयों में अधिसंख्य गुजरात के ही हंै। विरोधियों की दृष्टि में अमरीका अपने व्यापारिक और कूटनीतिक स्वार्थों के लिए भारत को लुभाने की कोशिश में है। अगर विरोधियों की बातों पर ध्यान दिया जाए, तो ट्रंप की यात्रा में अमरीका के ऐसे उद्देश्य स्पष्ट परिलक्षित होते भी हैं। परंतु इस संदर्भ में एक साधारण प्रश्न यह उभरता है कि इसमें गलत क्या है। क्या ट्रंप अमरीका की ओर से ऐसा उद्देश्य लेकर भारत की यात्रा पर हैं, तो वे कोई अपराध कर रहे हैं। ट्रंप की यात्रा के सरोकारों से भारतीय विपक्ष, मीडिया और आम जन जितना परिचित है, क्या मोदी सरकार उन सरोकारों से परिचित नहीं। नहीं ऐसा नहीं है। भारत सरकार अमरीका के वास्तविक, व्यापारिक, कूटनीतिक और अन्य प्रकार के सभी उद्देश्यों से भलीभांति परिचित है। अब इसी परिस्थिति में केंद्र सरकार की कूटनीतिक योग्यता दिखाई देनी चाहिए कि वह इस परिप्रेक्ष्य में अधिआयामी भारतीय हितों की रक्षा कैसे कर पाती है। जहां तक ट्रंप द्वारा भारत की यात्रा से पहले दिए गए अनेक सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के वक्तव्यों का प्रश्न है, तो इससे पता चलता है कि यात्रा के संबंध में अमरीकी नीतियों को अंतिम रूप नहीं दिया गया था। चूंकि उस समय मीडिया के अधिसंख्य प्रश्न ट्रंप प्रशासन की छवि विकृत करने के उद्देश्य से पूछे गए थे, इसलिए ऐसे प्रश्नों का समुचित उत्तर भी नहीं दिया जा सकता था और इसलिए भारत आने से पहले ट्रंप कभी व्यापार समझौता होने तो कभी न होने वाले वक्तव्य देते रहे। हालांकि ट्रंप की ओर से की गई ऐसी अनुत्पादक बातों का औचित्य केवल देशी-विदेशी उन नेताओं, मीडिया कर्मियों तथा लोगों के लिए ही है, जो उन्हें अमरीका में राष्ट्रपति के रूप में नहीं देखना चाहते। भारत-अमरीका के मैत्रीपूर्ण संबंधों को एक नई राह पर चलता हुआ देखने के इच्छुक अधिसंख्य अमरीकियों तथा भारतीयों के लिए तो हाउडी मोदी से लेकर नमस्ते ट्रंप तक दोनों देशों के मध्य कई क्षेत्रों में प्रगति करने के उद्देश्य से अनेक साझीदारियां हुई और हो रही हैं। नमस्ते ट्रंप में ट्रंप के दो तरह के संबोधन थे। एक संबोधन वह था, जो खुद को 2020 में राष्ट्रपति चुनाव में मजबूती से खड़ा करने के उद्देश्य से दिया गया, तो दूसरा वह था, जो उन्होंने भारत के संदर्भ में अनेक क्षेत्रों के सामान्य ज्ञानार्जन के आधार पर दिया था। जिस प्रकार अपने किए गए कार्यों के संबंध में तथ्यों, आंकड़ों और अन्य जानकारियों का विवरण मोदी की स्मृतियों में स्टोर रहता है, नमस्ते ट्रंप में ट्रंप ने भारतीयों को दिखा दिया कि उसी तरह की, बल्कि उससे अधिक, योग्यता उनके पास भी है। इसी योग्यता के कारण वे मोदी सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किए गए उल्लेखनीय कार्यों का आंकड़ों सहित मौखिक विवरण दे पाए और धर्म, दर्शन, फिल्म, क्रिकेट से लेकर भारतीय जीवन के लगभग हर प्रमुख क्षेत्र से संबंधित उन संदर्भों को भी प्रस्तुत कर पाए, जिन्हें किसी भी विदेशी नेता के लिए आसानी से याद रखना संभव ही नहीं।  अपनी पहली भारतीय यात्रा में ट्रंप के वे सारे भ्रम टूट गए, जो भारत विरोधियों द्वारा देश-विदेश में चलाए गए दुष्प्रचार के कारण उनके मन-मस्तिष्क में घूर्णन कर रहे थे। ट्रंप के हाव-भाव से स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था कि वे भारतीयों द्वारा किए गए अपने स्वागत से गदगद हैं। अब भारत सरकार के हाथ में है कि वह भारत के प्रति उभरी ट्रंप की ऐसी सकारात्मक मनोदशा से क्या-क्या कूटनीतिक लाभ अर्जित कर सकती है। हालांकि इस बात की संभावना बहुत कम है कि व्यापार और अन्य क्षेत्रों में अमरीका कोई नया समझौता करेगा क्योंकि अभी ट्रंप का सारा ध्यान 2020 के राष्ट्रपति चुनाव पर है। ट्रंप के स्तर पर यह स्वाभाविक भी है। भारत भी इस विवशता को भलीभांति समझता है। हां, नमस्ते ट्रंप के मंच से रक्षा समझौतों को पारित कराने की मौखिक स्वीकृति ट्रंप ने अवश्य दे दी है, लेकिन यदि भारत-अमरीका स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप फोरम की अधिसूचना का संज्ञान लिया जाए, तो दोनों देशों का ध्यान अमरीका-भारत टैक्स फोरम आरंभ करने पर है। इस दृष्टि से देखने पर यही संकेत मिलता है कि दोनों देशों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है व्यापार का सुगम प्रबंध, ताकि व्यापारिक अभिक्रियाओं का अपेक्षित लाभांश प्राप्त किया जा सके। रक्षा, सुरक्षा से लेकर ऊर्जा और अंतरिक्ष कार्यक्रमों तक की साझीदारी का निर्वहन दोनों देश तब ही भलीभांति कर सकते हैं जब वे व्यापार में लाभान्वित होंगे। इसलिए दोनों देश आयात, निर्यात, कराधान, दोहरा कराधान, शुल्क छूट इत्यादि विसंगतियों के कारण उत्पन्न बाधाओं को दूर करते हुए विशुद्ध लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से टैक्स फोरम खोले जाने को लेकर अधिक सक्रिय हैं। इस संबंध में ट्रंप भारत में रहते-रहते अपने और भारतीय व्यापार प्रतिनिधिमंडल के साथ-साथ भारत सरकार के साथ क्या समझौता करते हैं, यह विचारणीय है। इस्लामिक आतंक के संबंध में अमरीका में भी दोनों नेताओं ने एक साझा संकल्प दिखाया था और अब मोटेरा स्टेडियम से भी ट्रंप ने इस संबंध में अपनी प्रतिबद्धता प्रकट की। जिस हिसाब से 370, 35, के हटने के बाद कश्मीर में तो लोकतांत्रिक स्थायित्व कायम हुआ, उस हिसाब से सीमापार से संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं और आतंकी हमलों में कोई कमी नहीं आ रही। इस बात को ध्यान में रखते हुए ट्रंप द्वारा नमस्ते ट्रंप मंच से पाकिस्तान को कोई कड़ा संदेश नहीं दिया गया। हाउडी मोदी हो या नमस्ते ट्रंप,दोनों ही कार्यक्रमों के माध्यम से दोनों देश अपने-अपने विरोधी देशों को दिखाने-सिखाने के लिए एक द्विपक्षीय संबंधात्मक प्रतिरोध स्थापित करना चाहते हैं। अमरीका यह काम चीन के साथ उभरी व्यापारिक प्रतिस्पद्र्धा तथा मध्य, पूर्वी एवं दक्षिण एशिया में चीन के व्यापारिक, सामरिक विस्तार को न्यून करने के उद्देश्य से कर रहा है तो भारत चीन, पाकिस्तान सहित अनेक देशों पर अपनी अंतरराष्ट्रीय शक्ति और विकसित होती स्थिति की छाप छोडऩे के लिए यह काम कर रहा है। देखा जाए तो ऐसे मंचों से दोनों ही देशों द्वारा प्रसारित अंतिम संदेश से दुनिया के लिए कोई नकारात्मक परिणाम नहीं निकलता। यह हर दृष्टि से सकारात्मक ही है।

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