जब तक सांस चलेगी, युवाओं को संस्कृति सहेजने की सीख दूंगा

By: Mar 6th, 2020 12:07 am

लाहुल के जाने-माने बांसुरी वादक रामदेव कपूर आधुनिकता के नाम पर लोक संगीत से छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ 

नाम  :  रामदेव कपूर

आयु  :  60 वर्ष

जन्म  :  15 अगस्त 1960, गांव ठोलंग  (लाहुल-स्पीति)

शिक्षा  :  स्नातक(संगीत)

परिवार :  पत्नी व बेटी

पद   ः पूर्व डीपीआरओ

‘दिव्य हिमाचल मीडिया ग्रुप’ हिमाचल, हिमाचली और हिमाचलीयत की सेवा में सदैव तत्पर रहा है। यही कारण है कि किसी भी रूप में कुछ हटकर करने वालों को सम्मान हमारी प्राथमिकता में शामिल है। ‘दिव्य हिमाचल एक्सिलेंस अवार्ड‘ ऐसी ही कर्मठ विभूतियों, संगठनों व संस्थाओं के प्रयासों को प्रणाम करने का संकल्प है। ‘दिव्य हिमाचल एक्सिलेंस अवार्ड’ की ‘सर्वश्रेष्ठ संगीतकार’ श्रेणी में शुमार हैं लाहुल-स्पीति के रामदेव कपूर…

कुल्लू  –

हाथों में खिलौने थामने की उम्र में चार साल के एक बालक ने जब बांसुरी बजाने की बजाय उसे बनाने की कोशिश की तो हाथ से खून निकल आया। इस पर पिता ने एक नई बासुंरी बेटे को थमाते हुए कहा कि ‘जो सीखना है, वह सीख लो… लेकिन अपनी संस्कृति से कभी किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए’। वही सीख बेटे ने अपने जीवन में कायम रखी है। जी हां, हम बात कर रहे हैं जनजातीय जिला लाहुल-स्पीति के रहने वाले रामदेव कपूर की, जिनकी आवाज के साथ लोग उनकी बांसुरी के भी दीवाने हैं। रामदेव कपूर आज लाहुल-स्पीति ही नहीं, बल्कि हिमाचल की संस्कृति को संजोए रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने यह ठान लिया है कि जब तक सांस है, वह संस्कृति के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए युवा पीढ़ी को भी जागरूक करते रहेंगे। रामदेव कपूर का जन्म जनजातीय जिला लाहुल-स्पीति के सबसे शिक्षित गांव ठोलंग में 15 अगस्त, 1960 को हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा ठोलंग गांव में व उच्च शिक्षा केलांग में हुई। इसके बाद उन्होंने कुल्लू से संगीत में स्नातक किया। 1985 में वह सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में बतौर कलाकार भर्ती हुए। उसके बाद उन्होंने नाट्य निरीक्षक के तौर पर सरकारी सेवा शुरू की। इसके बाद एपीआरओ बने। एपीआरओ रहते भी उन्होंने कई जगह अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2013 में वह डीपीआरओ के पद पर तैनात हुए। इसके बाद चंडीगढ़ में भी उन्होंने दो साल तक अपनी सेवाएं दीं और वर्ष 2018 में डीपीआरओ के पद से सेवानिवृत्त हुए। हालांकि सेवानिवृत्त होने के बाद अपनी संस्कृति को संजोए रखने के प्रयास कर रहे हैं। वर्ष 2014 में रामदेव कपूर ने वेणु समागम में अहम भूमिका निभाई और बांसुरी वादन से लोक संगीत की दिलकश झलक पेश की। हालांकि रामदेव कपूर लोक गीतों से छेड़छाड़ के विरुद्ध हैं। उनके पिता स्वर्गीय टशी दावा (अर्जुन गोपाल) पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के परम मित्रों में माने जाते थे। पिता की प्रेरणा ने उन्हें संस्कृति को संजोने का मौका दिया है, जिस पर वह आज भी कार्य कर रहे हैं। सेवानिवृत्त होने के बाद भी आज युवा पीढ़ी को संस्कृति से छेड़छाड़ न करने को लेकर जागरूक करते रहते हैं। जिन कलाकारों ने पुराने गीतों को तोड़-मरोड़ तक दर्शकों के समक्ष पेश किया है, वह उन्हें भी सीख देते हैं कि वे ऐसा न करें। रामदेव कपूर की मानें तो बचपन से ही उन्हें बांसुरी सीखने का शौक था। हालांकि परिवार से कोई भी संगीत के क्षेत्र में नहीं था, फिर भी परिवार का काफी सहयोग मिला। भाइयों ने भी उन्हें इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। वह स्व. पंडित श्याम लाल ठाकुर व बांसुरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया को अपना गुरु मानते हैं। गुरुओं के नक्शे कदम पर चलते हुए उन्होंने जो सीखा है, उसे वह नई पीढ़ी को सिखाने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार गुरु व गायन का एक अटूट रिश्ता है। उसे कायम रखते हुए वह निःशुल्क बच्चों को बांसुरी, संगीत व अन्य वाद्य यंत्रों की तालीम देंगे, जिसके लिए उन्होंने एक विशेष खाका भी तैयार किया है।

दूसरों की मदद को हमेशा तैयार

एक कलाकार के तौर पर रामदेव कपूर का सफर अभी भी जारी है। घर में आने वाले संगीत से जुड़े युवाओं को तालीम देने के लिए वह हमेशा तैयार रहते हैं। इसके लिए वह जरूरी काम छोड़ कर भी युवाओं को संगीत की बारीकियां बताने में जुट जाते हैं। यही नहीं, यदि राह चलते भी कोई संगीत के बारे में कुछ पूछ ले, तो तुंरत बासुंरी निकालकर वह उसे टिप्स देने में नहीं हिचकिचाते हैं। दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। रिटायरमेंट के बाद समाजसेवा ही अब उनका उद्देश्य है।

अब तक की उपलब्धियां

लोक जनसंपर्क अधिकारी रहते हुए विभिन्न संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया है। राज्य सरकार की ओर से भी अपने विभाग में हिंदी में कार्य करने को लेकर उन्हें सम्मान दिया गया है। इसी के साथ भूट्टिको ने भी उन्हें राज्य स्तरीय सम्मान से सम्मानित किया है। वहीं, हाल में उन्हें 26 जनवरी को एक निजी संस्था आशियां समूह की ओर से भी लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसके अलावा भी अनेक संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं।

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