धर्म और आचरण के मध्य झूलता कोरोना

Mar 30th, 2020 12:05 am

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

सोशल प्लेटफार्म पर तमाम अनाप-शनाप उपाय और अनुसंधान के स्थान पर सुनी-सुनाई बातों को बढ़ावा दिया जा रहा है। आम जीवन में शरीर की सामान्य प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के उपायों को कोरोना से लड़ने के तरीकों के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। विभिन्न बीज मंत्रों को कोरोना के खात्मे के लिए रामबाण बताया जा रहा है, जबकि सत्य यह है कि कोई भी मंत्र हमारी सजगता या चेतनता को बढ़ाते हुए उस एकाकार या वैश्विक चेतना के साथ जुड़ने के ब्रह्मास्त्र हैं…

भारत में जब भी कोई आपदा आती है तो सदियों से उसका सामना धर्म के स्थान पर कर्मकांड और आचरण के स्थान पर पलायन से होता आया है। सोमनाथ मंदिर पर सन् 1024 ई. में महमूद गजनवी ने जब पांच हजार सैनिकों के साथ लूट के इरादे से आक्रमण किया, उस वक्त भी हमारे पंडित आम लोगों के साथ हमलावर से मुकाबला करने की बजाय भगवान से गुहार लगाने की टेर लगाने में व्यस्त थे। परिणामस्वरूप महमूद गजनवी बिना किसी प्रतिकार के भारी लूटपाट और 25 हजार लोगों के कत्ल के बाद आसानी से निकल गया। कई अन्य उदाहरण भी हैं जब हमने विपदा का सामना करने की बजाय धर्म की आड़ लेकर अपनी पीठ दिखाने में कोताही नहीं की, लेकिन आम जीवन में जब धर्म और आचरण के सामंजस्य की बात आती है तो इनमें मेल नजर नहीं आता। आजकल कोरोना के प्रकोप के मध्य भी यही सामने आ रहा है। भयातुर भारतीय समाज धर्म के स्थान पर कर्मकांड पर जोर दे रहा है। सरकार द्वारा तमाम एहतियाती एड्वाइजरी जारी करने के बावजूद अधिकांश लोग वही कर रहे हैं, जो उन्हें सुविधाजनक लग रहा है। सोशल प्लेटफार्म पर तमाम अनाप-शनाप उपाय और अनुसंधान के स्थान पर सुनी-सुनाई बातों को बढ़ावा दिया जा रहा है। आम जीवन में शरीर की सामान्य प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के उपायों को कोरोना से लड़ने के तरीकों के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। विभिन्न बीज मंत्रों को कोरोना के खात्मे के लिए रामबाण बताया जा रहा है, जबकि सत्य यह है कि कोई भी मंत्र हमारी सजगता या चेतनता को बढ़ाते हुए उस एकाकार या वैश्विक चेतना के साथ जुड़ने के ब्रह्मास्त्र हैं, अगर कोई व्यक्ति सजग है तो ऐसे उपाय उसके आचरण में पहले ही निहित होंगे। वह केवल वैज्ञानिक तर्क के आधार पर संक्रमण से बचाव और संक्रमित होने पर इलाज को तरजीह देगा। प्रश्न उठता है कि धर्म है क्या? सामान्यतः धर्म, प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन जीना सिखाता है। कोई भी व्यक्ति जो प्रकृति के नियमों के  अनुसार जीवनयापन करता है, स्वस्थ और प्रसन्न रहता है। प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवनयापन शील और सदाचार का जीवन कहलाता है। सही धर्म ऐसी राह बताता है जिससे सुख मिलते हैं और दुःख उत्पन्न नहीं होते। जीवन में हम चाहे कुछ भी करें, वह उतना प्रासंगिक और पूर्ण नहीं हो सकता, जितना कि धर्म का आचरण। ‘धर्म’ का शाब्दिक अर्थ ‘धारण करना’ है।

‘धर्म’ का दूसरा अर्थ है ‘अनागत विपत्तियों और भयों से रक्षा करना’। इस अर्थ में धर्म का संबंध प्रचलित ‘रिलीजन’ से जोड़ा जा सकता है। यह धर्म निश्चित रूप से धर्मनिरपेक्षता के विपरीत है। साधारणतया मन, वाणी और शरीर द्वारा किए जाने वाले कुशल कर्म ‘धर्म’ कहे जा सकते हैं। धर्म विपत्तियों से हमारी रक्षा कर सकता है या अनागत विपत्तियों को रोक सकता है। कोई भी व्यक्ति जो इन कर्मों का अनुष्ठान करता है, वह धार्मिक व्यक्ति है। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निर्वाचित प्रथम कालोन ठिपा (प्रधानमंत्री) एवं विख्यात बौद्ध गुरु प्रो. समदोंग रिनपोछे लोगों द्वारा धर्म के मर्म को न समझ पाने को ही उनके धर्मच्युत होने का मुख्य कारण बताते हैं। उनके अनुसार महात्मा गांधी इसके लिए आधुनिक सभ्यता को दोषी मानते हैं। वह अपने एक ईसाई पादरी मित्र का हवाला देते हुए बताते हैं कि वह लोक दृष्टि से धर्म को तीन आयामों में देखते हैं-धर्मता (Religiousness), धार्मिक कर्मकांड एवं गतिविधि (Religiousty) और धार्मिक अभिनिवेश (Religionism)। पहला-धर्मता, चित्त का गुण होता है, जो मानव को क्लेशों में पतित होने से बचाता है, या धर्म धारण करने में मदद करता है। यह धर्म का सही रूप है। दूसरा, धार्मिक कर्मकांड एवं गतिविधि, धर्मानुसार भी हो सकता है और भ्रष्ट भी। तीसरा, धार्मिक अभिनिवेश, अधर्म ही होता है, जो धर्म को नष्ट करने वाला होता है। अब तीनों के मध्य हमें देखना होगा कि हम कहां ठहरते हैं। हालांकि सरकार के दिशा-निर्देशों के बाद प्रशासन ने तमाम मंदिरों को बंद करने के निर्देश इस आशय से दिए हैं कि अगर लोग वहां एकत्रित होंगे तो संक्रमण का खतरा बना रहेगा, लेकिन बावजूद इसके लोग कांगड़ा, धर्मशाला वगैरह में बंद मंदिरों के बाहर सामूहिक रूप से खड़े होकर पूजा और भजन-कीर्तन करने से बाज नहीं आ रहे। लगे हाथ धर्मगुरु अपने अनुयायियों को जो ज्ञान बांट रहे हैं, वह भी तभी असरकारक होगा अगर उसका सही आचरण किया जाए, लेकिन लोगों का ऐसे एकत्रित होना, हमारे भयातुर समाज का चेहरा ही प्रस्तुत करता है। अगर समाज वास्तव में सजग होता तो तमाम लोग कोरोना के विरुद्ध वैज्ञानिक उपाए बरतते और व्यक्तिगत एवं सामूहिक आचरण पर बल देते। प्राणायाम, वायु वेग को बढ़ाना, मंत्रों का जाप, ध्यान या साधना, हवन, हल्दी, तुलसी, गोमूत्र या विटामिन सी का सेवन और कपूर वगैरह का जलाना सब बातें प्राथमिक स्तर तक तो ठीक हैं, किंतु संक्रमण से बचने के उपाय और संक्रमित होने पर वैज्ञानिक इलाज तो सुनिश्चित करना ही होगा। प्रशासन और मीडिया तो अपना दायित्व निभा रहे हैं, लेकिन आम लोगों को भी सामने आना होगा। कोरोना की तरह अगर लोग भ्रष्टाचार, गंदगी, यातायात समस्या वगैरह से छुटकारा पाने के भी लिए शून्य सहनशक्ति प्रयोग करें तो कोई दोराय नहीं कि इन तमाम राष्ट्रीय समस्याओं से भी आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है। व्यक्तिगत साफ-सफाई, अपने नाक, मुंह और आंखों को बार-बार छून से बचना, लोगों से अनावश्यक मेलजोल तथा सार्वजनिक स्थानों पर जाने से परहेज, सामान्य लू होने पर आतंकित होने की बजाय घर पर रहकर इलाज और कोरोना के लक्षण होने पर सुरक्षित वातावरण में इलाज वगैरह ऐसे उपाय हैं, जो हमें व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से अपनाने होंगे। जहां तक हिमाचल का सवाल है तो हम भाग्यशाली हैं कि यहां ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की कमी भी नहीं है और न ही इतनी गरीबी कि लोग देश के अन्य देहातों की तरह साबुन और पानी से समय-समय पर हाथ न धो सकें। हां, आवश्यकता, सजगता और स्वच्छता को बनाए रखने की है, जो हमें व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से स्वयं सुनिश्चित करनी होगी।

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