हर शख्स कोरोना सा क्यों है

Mar 31st, 2020 12:05 am

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

पिछले एक हफ्ते से घर में करवटें बदलते-बदलते पंडित जॉन अली जब उकता गए तो अपनी बॉलकनी में आकर टहलने लगे। कालोनी में एनआईआर की संख्या अधिक थी। विदेशों में रहने वाले लोग कोरोना के डर से उसी तरह अपने वतन की ओर लपके जैसे किसी कोबरा को देखकर चूहा अपने बिल में घुस जाता है। लॉकडाउन के बाद जब बात उठी कि विदेशों से आए कितने लोगों ने सरकार के साथ जानकारी साझा की है, तब पता चला कि जानकारी छिपाने वाले कई लोग आतंकी स्लीपर सैल की तरह अपने घरों में छिपे बैठे हैं। कर्फ्यू के बावजूद लोग घरों में टिकने की बजाय कालोनी के अंदर घूमने में मस्त थे। बेचारे भीतर करें भी क्या? किसी सत्ताधारी के अहंकार की तरह पति का अहंकार पत्नी के सामने कितनी चोटें झेल सकता है। चाहते तो पंडित भी कालोनी में ऐसे लापरवाह लोगों की तरह घूम सकते थे, लेकिन उनमें बीवी को भरी जवानी में न बेवा बनाने की चाह थी और न हिम्मत। दूजे अपने चुन्नू-मुन्नू से भी उन्हें वैसे ही बेइंतहा मोहब्बत थी, जैसे किसी नेता को कुर्सी से होती है। वहीं खड़े-खड़े गमन फिल्म की शहरयार की लिखी गजल गुनगुनाने लगे, ‘‘सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है।’’ मैं भी अपनी बॉलकनी में खड़ा होकर चुपचाप उनकी गजल का आनंद लेने लगा। अचानक उनके बोल बदल गए, ‘‘सीने में अकड़न नाक में दरिया सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स कोरोना सा क्यों है।’’ जब मुझसे हंसे बिना नहीं रहा गया तो पंडित जी लगभग उछलते हुए, ‘‘ अमां यार! कभी तो शर्म किया करो। ऐसा धावा तो पाकिस्तानी रेंजर भी नहीं बोलते, हिंदोस्तानी फौजियों पर।’’ मैं बोला, ‘‘पंडित जी, आपकी गजल का मजा ले रहा था। अचानक बोल बदले तो हंसी आ गई।’’ वह बोले, ‘‘मियां! हंस लो, लेकिन अगर हिंदोस्तानी नहीं संभले तो कोरोना भी ऐसे ही हंसेगा हम पर। अब देखो न, यह जितने सिर, टोपियां और पगडि़यां नजर आ रही हैं। इनमें से बता सकते हो कितने कोरोना हैं। ये वही लोग हैं जो विदेशों में जाकर इतने अनुशासित हो जाते हैं कि इनकी पत्नियां भी देखें तो सोचें कि ये वही आदमी हैं जो इनके पल्ले पड़े हैं। विदेशों में घर से दफ्तर और दफ्तर से घर जाते वक्त उन्हें कहीं न थूकने की जरूरत महसूस होती है और न ही मूत्र विसर्जन की। इधर देखो, खैनी खाकर या बिना खाए ही थूके जा रहे हैं। एक-दूसरे से ऐसे मिल रहे हैं मानो कोई नई नवेली दुल्हन अपने मायके से काला महीना काट कर लौटी हो। हवाई अड्डे या कालोनी से बाहर निकल कर दीवार देखते ही इन्हें पेंटिंग करने की याद आ जाएगी। अपने थूक की तरह बिस्किट और नमकीन के रैपर कहीं भी गिरा देंगे। कुछ दिन तो सरकार को गालियां निकालते रहे। कोरोना की बालिंग पर कुछ लोगों के ऑउट होने की खबर आई तो कहीं जाकर अब कालोनी से बाहर निकलने में गुरेज करने लगे हैं। हैं इतने ढीठ कि कर्फ्यू की मियाद खत्म होने के बावजूद कालोना में घूमने से बाज नहीं आ रहे। कहीं पुलिस का सायरन बजा या वर्दी दिखी तो फिर ऐसे भागेंगे जैसे ऑफिस में खड़ूस बॉस के आने पर मातहत भागते हैं।’’ उनकी बात सुनकर मेरे मुंह से निकला, ‘‘पंडित जी! इतना सब होने के बावजूद यह हिंदोस्तान ही है जो इतनी सदियों से टिका हुआ है। अल्लामा इकबाल के शे’र की तर्ज पर फिलवक्त मैं इतना ही कह सकता हूं- ‘‘सार्स कोरोना लू सब मिट गए यहां से, मगर क्या बात है कि बेशर्मी मिटती नहीं हमारी।’’       

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