इंतजार में परीक्षाएं

Apr 3rd, 2020 12:05 am

ज्ञान के समुद्र में कोरोना ने एक ठहराव सा पैदा कर दिया है और अंतरराष्ट्रीय समीक्षाओं के दौर में युवा बाधाएं सबसे ऊपर विराजित हैं। एक-एक करके शिक्षा के अनेकों सत्र और आगे बढ़ने की संभावना पर अद्भुत गतिरोध। इस दौरान मेहनत के फलक पर छाया अंधेरा और युवा प्रतिभाओं का आकलन कुंडली मारकर रुक गया। हिमाचल का जिक्र करें, तो कालेज परीक्षाएं करीब चार महीने आगे सरक कर जुलाई का खाका तैयार कर रही हैं और यह भी तब यदि कोरोना के तमाम अवरोधक दृश्य से हट जाएंगे। हिमाचल के करीब सवा सौ कालेजों के साठ हजार छात्र अपनी मेहनत का पसीना व्यर्थ न होने दें, इस पर विचार करना होगा। हिमाचल में ऑनलाइन शिक्षा की एक नई बुनियाद इस दौरान रखी जा सकती है या तमाम बच्चों के लिए वैश्विक ज्ञान सागर के पास जाने का अवसर मिल सकता है। जो भी हो हिमाचल के स्कूल शिक्षा बोर्ड, शिमला, सोलन व पालमपुर के विश्वविद्यालयों तथा धर्मशाला सीयू को अपने तौर पर गौर करना होगा कि वर्तमान संदर्भों में ऑनलाइन पढ़ाई के मजमून एक नई विधा के रूप में छात्र तरक्की का जरिया बन सकते हैं। विडंबना यह रही कि इन संस्थानों ने अभी तक यह विचार ही नहीं किया कि ज्ञान के लिए मात्र औपचारिक पढ़ाई या परीक्षा ही एक माध्यम नहीं हो सकता है, बल्कि ऑनलाइन रास्ते से असीमित दिशा की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। उदाहरण के लिए अगर हिमाचल विश्वविद्यालय प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत या इतिहास पर ऑनलाइन सामग्री उपलब्ध कराए तो सामान्य शिक्षा से कहीं आगे ऐसे पाठ्यक्रम की विशालता से प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं की तैयारी संभव हो जाती है। इसी तरह विविध भाषाई कोर्स अगर ऑनलाइन तैयार किए जाएं, तो शिक्षा की यह क्लास सीधे व्यक्तित्व विकास बन सकती है। हिमाचली परिप्रेक्ष्य में जो तिब्बती संसार बसा है, उसे केंद्रीय विश्वविद्यालय अपने ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के जरिए वैश्विक ज्ञान का प्रमुख स्रोत बना सकता है। अब तो केंद्रीय बजट ने भी कई अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों को भारत में ऑनलाइन शिक्षा प्रोत्साहित करने की छूट दी है, तो हिमाचल स्थित विश्वविद्यालय इस पहल में अपने लिए भी रास्ते बना सकते हैं। इस तरह पाठ्यक्रमों में विविधता तथा प्रासंगिकता के साथ-साथ प्रतिस्पर्धा का माहौल भी सशक्त होगा। पूरे विश्व में करीब पचास फीसदी ऑनलाइन स्कूल चल रहे हैं, तो इसका एक कारण डिजिटल प्लेटफार्म का निरंतर विकास भी माना जा सकता है। चर्चित निजी स्कूल बाकायदा ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के विस्तार में शोध व निवेश कर रहे हैं और यही कारण है कि हर तरह अमरीकी छात्र ऑनलाइन पढ़ाई से जुड़ा है। अब वे दिन लद गए जब अध्यापक की योजना से छात्र पढ़ते थे या पढ़ाई का सत्र पूरी तरह से परिभाषित था। जिस तरह इस बार कोरोना सारे अध्ययन सत्र को डरा रहा है, उसके विपरीत यही व्यवस्था आनलाइन में अवाधित तथा नियमित रह सकती है। यह इसलिए कि ऑनलाइन से हमेशा छात्र की सुविधा के अनुसार जानकारी, प्रोजेक्ट, असाइनमेंट, विचार-विमर्श, संपर्क या परीक्षा का समय तय होता है। ऑनलाइन अध्ययन का अनुभव सहज और अंतर संवाद को सुविधाजनक बनाता है। ऑनलाइन से अध्ययन का स्तर व मूल्य हमेशा उच्च तथा निरंतर गतिशील होते हैं। इतना ही नहीं छात्र अपने संसाधनों के अनुरूप सस्ती व उपयोगी शिक्षा का चयन करते हुए सीधे क्लास रूम के बजाय घर से पढ़ाई करते हुए परिवहन व अन्य खर्चों से भी मुक्त रहता है। इससे किताबों का खर्च बचाते हुए इंटरनेट पर उपलब्ध पुस्तकालयों का बेहतर उपयोग होता है, जबकि वास्तविक लाइब्रेरी तो अब सजावटी बनती जा रही है। जाहिर है आगे सरक रही परीक्षाएं हर छात्र को कम से कम चार महीने की अवधि दे रही हैं। यह अवधि बढ़ सकती है, तो इसे ज्ञान के नए नजरिए से कबूल करते हुए छात्र वर्ग शिक्षा के प्रति अपनी मांग बदल सकता है। इस दौरान भारतीय शिक्षा प्रणाली के हर स्तंभकार को यह शोध करना होगा कि परीक्षा से वंचित छात्र के इस सफर का कैसे मूल्यांकन करें। इस दौरान छात्रों की व्यस्तता में दायित्व निभा रहा स्मार्ट फोन, लैपटॉप या स्मार्ट टीवी किस रिक्तता को भर रहा है या इस दौर की मांग में इंटरनेट में क्या खोजा जा रहा है। जाहिर है शिक्षा को अपना नया घर इंटरनेट,स्मार्ट फोन, लैपटॉप, स्मार्ट टीवी या यू-ट्यूब में बनाना है ताकि प्रतिकूल परिस्थितियों में सहजता व सुविधा से बच्चे अपने करियर उत्थान की औपचारिकताओं के बाहर भी सदाबहार बने रहें। शिक्षा के माध्यम से करियर ढूंढ रहे बच्चों के लिए परीक्षाओं, प्रवेश परीक्षाओं या प्रतिस्पर्धी की दौड़ से चार महीने का विश्राम कतई सुविधाजनक नहीं है, अतः शिक्षा शास्त्री, योजनाकार तथा शिक्षण संस्थानों के ओहदेदार सोचें-समझें और विकल्प के साथ कोरोना त्रासदी को भविष्य की योजनाओं से समेट दें। यह समय घर से ऑनलाइन शिक्षा के द्वार खोल रहा है, अतः इसे इसी स्वरूप में पल्लवित-पुष्पित करें।

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