कितने संवेदनशील हैं जनप्रतिनिधि?

Apr 8th, 2020 12:05 am

राजेंद्र राजन

लेखक, हमीरपुर से हैं

नकारात्मक ऊर्जा और अवसाद के माहौल में सरकार, प्रशासन, पुलिस सब अपना कर्त्तव्य निष्ठापूर्वक निभा रहे हैं। लेकिन जिन प्रतिनिधियों यानी विधायकों, सांसदों, जिला परिषद या पंचायत प्रतिनिधियों को जनता ने चुना है, उनकी उपस्थिति, संवेदना व भावनात्मक संबल कमोबेश गायब हैं। मैंने प्रदेशभर में अनेक मित्रों से बात की तो पता चला कि अधिकांश लोग या मतदाता जनप्रतिनिधियों खासकर विधायकों के ‘व्यवहार’ से क्षुब्ध हैं। संकट की घड़ी में चुने हुए जनप्रतिनिधियों से लोगों की अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे उनके सुख-दुख में शरीक हों, लेकिन हमारे ज्यादातर विधायक अपने-अपने घरों में यूं दुबक कर बैठे हैं मानों कोरोना का कहर उन पर ही टूटने वाला है…

बशीर बदर का एक शेर मौजूदा संकट पर मौजूं हैः ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, गर गले मिलोगे तपाक से। ये नए मिजाज का शहर है, फासले से मिला करो।’ कोरोना ने पूरे विश्व, देश का मिजाज बदल दिया है। हर कोई फिक्रमंद है और अनिश्चितता के वातावरण में सांस ले रहा है। नकारात्मक ऊर्जा और अवसाद के माहौल में सरकार, प्रशासन, पुलिस सब अपना कर्त्तव्य निष्ठापूर्वक निभा रहे हैं। लेकिन जिन प्रतिनिधियों यानी विधायकों, सांसदों, जिला परिषद या पंचायत प्रतिनिधियों को जनता ने चुना है, उनकी उपस्थिति, संवेदना व भावनात्मक संबल कमोबेश गायब हैं। मैंने प्रदेशभर में अनेक मित्रों से बात की तो पता चला कि अधिकांश लोग या मतदाता जनप्रतिनिधियों खासकर विधायकों के ‘व्यवहार’ से क्षुब्ध हैं। संकट की घड़ी में चुने हुए जनप्रतिनिधियों से लोगों की अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे उनके सुख-दुख में शरीक हों, लेकिन हमारे ज्यादातर विधायक अपने-अपने घरों में यूं दुबक कर बैठे हैं मानों कोरोना का कहर उन पर ही टूटने वाला है। अगर डाक्टर, नर्सें, पुलिस कर्मचारी और अधिकारी इस जंग से दिन-रात जूझ रहे हैं तो विधायक अपने-अपने हलकों में जाकर और उचित दूरी बनाकर जनसमस्याओं का जायजा तो ले ही सकते हैं। दिल्ली में प्रधानमंत्री सक्रिय हैं तो शिमला में जयराम ठाकुर चौबीस घण्टे कोरोना संकट पर नजर रखे हुए हैं और रोज अपने पदाधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। रोज नए-नए फरमान जारी हो रहे हैं। मुख्यमंत्री ने सभी मत्रियों को प्रत्येक जिले का प्रभारी बनाया है तो विधायकों को निर्देश हैं कि वे सुनिश्चित करें कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की समीक्षा करें और खाद्य वस्तुओं, सब्जियों, दूध आदि की आपूर्ति में मुश्किलें पैदा न हों, लेकिन हमारे ज्यादातर विधायकों ने स्वयं को अपने-अपने घरों में इस तरह कैद कर रखा है जैसे किसी ‘आईसीयू’ में हों या कोमा में जा चुके हों।

प्रत्येक जनप्रतिनिधि का यह कर्त्तव्य है कि वह सोशल मीडिया, दूरभाष, मोबाइल पर कम से कम जनता से सम्पर्क स्थापित करे और उनसे जनसमस्याओं की फीडबैक लेता रहे। यह काम प्रदेश का सूचना विभाग तो मुस्तैदी से कर रहा है। डेली वीडियो डायरी के माध्यम से यू-ट्यूब और व्हाटसैप पर जनता तक सूचनाओं व सरकारी निर्णयों को पहुंचा रहा है। क्योंकि कर्फ्यू में अखबारों का वितरण बंद है। लोग मीलों लंबा सफर तय करके शहरों, कस्बों में दवाइयों, फल, सब्जियों, दूध, ब्रेड आदि के लिए पहुंच रहे हैं। पुलिस गाडि़यों को जब्त कर रही है। उनका चालान कर रही है। कोरोना जैसे विश्वव्यापी संकट में भी पुलिस का बर्बर व अमानवीय चेहरा बरकरार है। बावजूद इसके कि पुलिस प्रमुख सीता राम मरड़ी पुलिस को ऐसे संकट में संवेदनशील बनने का आग्रह कर रहे हैं। अत्याचारी पुलिस कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई जरूरी है। कुछ विधायक अपने वोट बैंक को कायम रखने के लिए मीडिया में अनाप-शनाप बयानबाजी  कर रहे हैं।

मीडिया का भी यह कर्त्तव्य है कि विधायकों की जनसमस्याओं के प्रति उपेक्षा भाव को उजागर करे, न कि उनके बयानों को छाप-छाप कर उनका अनावश्यक प्रचार करे। मुख्यमंत्री का भी यह कर्त्तव्य है कि वे अपनी पार्टी के विधायकों की परफारमेंस की समीक्षा करते रहें और उन्हें जनसमस्याओं के प्रति संवेदनशीलता बरतने और जरूरत के वक्त उनके घरों में जाकर उन्हें हल करने के कड़े आदेश जारी करें। लेकिन हमारे जनप्रतिनिधि अपने घरों की दीवारों के भीतर रहकर ही मोबाइल पर ही छद्म नियंत्रण करने का दावा कर रहे हैं। लेकिन कुछ विधायकों की फीडबैक बताती है कि मुश्किल वक्त में वे मोर्चे पर डटे भी हैं। हमीरपुर जिले के एक हलके की विधायिका कमलेश कुमारी स्वयं मास्क सी-सी कर लोगों को बांट रही हैं तो सुजानपुर के विधायक राजेंद्र राणा चंडीगढ़ में फंसे हिमाचलियों के खान-पान का प्रबंध संभाले हुए हैं। नादौन के विधायक सुखविंद्र सिंह सुक्खू, इंद्रदत्त लखनपाल और नरेंद्र ठाकुर भी घरों से कभी-कभार निकलकर सरकार की मदद कर रहे हैं। कांगड़ा में सरवीण चौधरी और राकेश पठानिया भी दुख की घड़ी में बेसहारों का सहारा बने हुए हैं, तो कांगड़ा जिले के कुछ विधायकों ने स्वयं ही जनता से संपर्क तोड़ लिया है। कुछ लोग ऐसे प्रतिनिधियों का यह कहकर मजाक उड़ा रहे हैं कि वे शायद लॉकडाउन खुलने की प्रतीक्षा में घुले जा रहे हैं। लॉकडाउन खुले तो ट्रांसफर इंडस्ट्री को फिर से पंख लगें। लॉकडाउन के कारण लोगों को एक और समस्या दरपेश आ रही है। मृत्यु के बाद दाह संस्कार को लेकर परेशानियां बढ़ रही हैं। हमीरपुर में ही मेरे गांवों के आसपास कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिनमें अंत्येष्टि के लिए कफन तक उपलब्ध नहीं हो पा रहे। कपड़े की दुकानें बंद हैं। कम से कम सरकार पुरोहितों को संस्कार के लिए पास जारी करे। अपने प्रियजन को खोने के बाद परिजन न्यूनतम संस्कारों की अपेक्षा तो करते ही हैं। कोरोना का भय इस कदर हावी है कि पुलिस के डर से भी लोग अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो पा रहे। ऐसी समस्याओं के प्रति भी प्रशासन, सरकार व जनप्रतिनिधियों को अतिरिक्त रूप से प्रो-एक्टिव व संवेदनशील होने की आवश्यकता है। प्रश्न यह है कि अगर इस भयंकर आपदा के भय व असुरक्षा के बीच जनप्रतिनिधि अपने दायित्व का निर्वहन नहीं करेंगे तो सामान्य हालात में वे क्या मुंह लेकर जनता के बीच जाएंगे। ऐसे में वह वक्त दूर नहीं जब जनता नोटा का प्रयोग करेगी और नॉन-परफार्मर नेताओं के रीकॉल के लिए मांग करेगी।  

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