कोरोना की पावती

Apr 2nd, 2020 12:03 am

कोरोना संकट के बीच निजामुद्दीन से आई खबर या तब्लीग-ए-जमात में शरीक धर्मांधता के पांव हिमाचल तक कैसे पहुंचे हैं, तो दर्जनों लोगों का जत्था हमारी परीक्षा ले रहा है। एक राष्ट्रीय हड़कंप और कोरोना संक्रमण के मध्य लोगों का जमघट अंध विश्वास की बैसाखी पहनकर नंगे पांव देश की कुछ तो परिक्रमा कर गया, लिहाजा तेलंगाना तक मौत की खबर ने तब्लीग-ए-जमात को कोरोना दहशत का नया नाम दे दिया है। इस जमात में उन्नीस राज्यों में हिमाचल का मुस्लिम समाज भी अपने साथ कोरोना की पावती को छू कर लौटा है। फिलहाल चंबा, कुल्लू, मंडी, हमीरपुर व सिरमौर के अनेक व्यक्ति अपनी पहचान की वजह से स्वास्थ्य की आवश्यक हिदायतों के दायरे में हैं, लेकिन यह ऐसी निशानदेही है जिसका कोई अंत नहीं। एक ऐसा समागम जिसकी रूपरेखा में कोरोना के खतरे की अनदेखी हुई है या यह धर्मांधता का खतरा है कि लोग चिकित्सा के सामने आस्था परोस कर मेहरबानियां गिन रहे हैं। जो भी हो इस शैतानी युद्ध में अल्लाह की इबादत का तरीका सामुदायिक होने के बजाय इस दौर की पनाह में है। यानी हम मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद या धार्मिक सम्मेलन में जिस आस्था को निरुपित करते आए हैं, उससे कहीं भिन्न अगर डिस्टेंसिंग नहीं हुई तो हर अनुयायी चेहरे पर दाग चस्पां होगा। इस मामले में भी बीमारी के संदिग्ध पांव चलते हुए संगत में हरकत करते रहे और नतीजतन एक बड़ा व घातक मंजर उस दर पर उभर आया, जहां कभी ईश्वर का नाम लेना ही न्याय की पूजा होती थी। यह धार्मिक कवायद न होकर राष्ट्रीय कसौटी है, जहां इक्का-दुक्का मामला भी प्रायश्चित करने का मौका नहीं देगा और यही निजामुद्दीन मरकज में मिलीछूट का नजराना बन रही है। आश्चर्य यह है कि लॉकडाउन की सीमा में इस तरह की घुसपैठ और कानून-व्यवस्था की चादर में छेद होना अपने आप में त्रासदी हैं। देश का कानून भी कई बार धर्म के लिफाफे को छूना नहीं चाहता, नतीजतन जो दिल्ली में हुआ उसकी आंच में आधारभूत तथा मानवतावादी संदेश गुम हो जाते हैं। यहां बहस यह नहीं कि समागम की अनुमति कहां से मिली या इस मिसाल को किस तहजीब से जोड़ा जाए, बल्कि यह है कि देश जब हर नागरिक की खातिर बंद है तो कुछ लोग राष्ट्र के सामने धर्म का लंगर कैसे लगा पाते हैं। मौत के शब्द उसी समागम से निकले, जहां जीवन की उम्मीदें या सुरक्षित मानने की गारंटी बिकी होगी। बहरहाल कोरोना के खिलाफ यह एक वीभत्स अध्याय नहीं बना, बल्कि यह समझ से बाहर है कि तब्लीग-ए-जमात के इस संदर्भ को क्या नाम दिया जाए। यहां जिक्र हिमाचल के साथ भी जुड़ गया, क्योंकि कुछ लोग उस पैगाम में सूचीबद्ध हैं जो दिल्ली की शिनाख्त में कोरोना को एक अवसर दे गया। गनीमत यह कि सत्रह हिमाचली दिल्ली में ही आइसोलेशन तक पहुंच गए वरना संपर्कों की न कोई सीमा और न ही दूरी बचती है। दरियों पर आसीन श्रद्धा ने जहां सिर झुकाया, वहीं कोरोना ने खुद को काबिज करती महिफल का इस्तेमाल किया है। कोरोना पॉजिटिव होने की कुछ वजह विदेशोें से पहुंचे सौ के करीब श्रद्धालु हो सकते हैं, लेकिन इस विरासत ने अपने ही दामन को आशंकित कर दिया। ऐसे में हिमाचल जैसे राज्य की चौकसी बढ़ जानी चाहिए और हर सूरत सीमाओं पर यह सुनिश्चित करना होगा कि बाहर से कोई संदिग्ध हालात में प्रदेश में सीधा प्रवेश न करने के बजाय आइसोलेशन के जरिए पुनः स्थापित हो। दिल्ली प्रकरण ने हिमाचल की संवेदना को सशक्त करते हुए धार्मिक सतर्कता बरतने की ताकीद की है ताकि किसी भी श्रद्धा के नाम पर लोग अपनी सामुदायिक शक्ति का प्रदर्शन न करें। नवरात्र महोत्सव के साथ कई आयोजन भी जुड़े हैं, लेकिन यह समय ऐसी आराधना का है, जो पूरे विश्व को बिरादरी के रूप में बचाने की आरती करे और यह घर के भीतर रह कर ही होगी।

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