मजहबी वायरस की जमात

Apr 2nd, 2020 12:02 am

भारत में बीबीसी के प्रख्यात पत्रकार रहे मार्क टली ने मुसलमानों की ‘तबलीगी जमात’ को कट्टरपंथी करार दिया था। विवादास्पद लेखिका तसलीमा नसरीन का आरोप है कि जमात के तार आतंकियों से जुड़े हैं। केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने इनकी तुलना तालिबान से की है। बेशक आप इन टिप्पणियों से इत्तेफाक न रखें। इनके विश्लेषण का आधार क्या है, हम नहीं जानते, लेकिन निजामुद्दीन मरकज में जो हुआ है और वहां के मौलाना ने जो तकरीरें की हैं, उनसे लगता है कि वह एक जमात को नरसंहार के लिए उकसा रहे हैं! एक जमात को तबाही की भट्ठी में झोंक रहे हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे मौलानाओं को कोरोना वायरस के जानलेवा असर के बारे में जानकारी नहीं है, लेकिन फिर भी मजहबी ऐलान किया जाता रहा है कि यदि कोरोना से मस्जिद में मौत होती है, तो उससे अच्छी और पाक जगह कोई और नहीं है। मौलाना कह रहे हैं कि बीमारी के बहाने मुसलमानों को एक-दूसरे से अलग किया जा रहा है, शक पैदा किए जा रहे हैं और इस तरह एक साजिश काम कर रही है। ऐसी तकरीरों से साफ  है कि मौलाना एक मजहबी किस्म की खुदकुशी के लिए नमाजियों को उकसा रहे हैं। कमोबेश दिल्ली मरकज के मौलाना मुहम्मद साद की ऐसी तकरीरें यू-ट्यूब पर हैं और हजारों लोग उन्हें पढ़-सुन चुके हैं। मरकज में ‘तबलीगी जमात’ के मजमे पर उन्हें कोई अफसोस नहीं है, तकरीरें सुनते या करते हुए लोग खांसते रहें, उन्हें कोई परवाह नहीं है। आखिर यह कौन-सा इस्लाम है? इसके अनुयायी कौन हैं? किस दुनिया से इनका वास्ता है और ये किसके वफादार हैं? कोरोना वायरस के इस त्रासद दौर में भी जमात वाले किन्हीं भी दलीलों को सुनने के लिए राजी नहीं हैं। इसके उलट कुछ मौलानाओं ने कहा है कि खिलाफ  कार्रवाई करने वालों पर फतवा जारी कर दिया जाए। सरकार और पुलिस ने सार्थक कार्रवाई की कि मरकज के मौलाना और अन्य छह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर केस चालू कर दिया और जांच दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को सौंप दी। केस महामारी कानून की धाराओं के तहत दर्ज किया गया है। दरअसल जांच में खुफिया ब्यूरो और रॉ सरीखी अन्य एजेंसियों को भी जोड़ना चाहिए, ताकि ‘तबलीगी जमात’ की अंतरराष्ट्रीय हरकतों का भी खुलासा हो सके। यह जमात और मरकज भारत तक ही सीमित नहीं है। भारत के अलावा, 213 अन्य देशों में भी इसके संगठन सक्रिय हैं। बुनियादी तौर पर ये इस्लाम और अल्लाह की कही गई बातों के ही ‘प्रचारक’ हैं। दरअसल ब्रिटिश काल में जब आर्य समाज और अन्य हिंदूवादी संगठनों ने जबरन मुस्लिम बनाए जाने वालों का ‘शुद्धिकरण’ करते हुए उनके धर्मांतरण की कोशिशें शुरू की थीं, उस दौर में ही ‘तबलीगी जमात’ का गठन 1926-27 में किया गया। पहली जमात का मजमा हरियाणा के मेवात इलाके में नूंह कस्बे में किया गया था। तभी से मरकज का सिलसिला भी जारी रहा है। बीती 10 मार्च को पाकिस्तान के लाहौर में जमात का आयोजन किया गया, जिसमें करीब 2.5 लाख लोग जमा हुए और वहीं से अपने-अपने देशों को लौट गए या कुछ भारत में आ गए। गौरतलब यह है कि 28-29 की दरमियानी रात में 2 बजे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल मरकज गए और मौलाना साद समेत कुछ और मौलानाओं को कोरोना महासंकट को लेकर सचेत किया। उनके आग्रह पर मौलानाओं ने मरकज खाली कर देने का भरोसा भी दिलाया था, लेकिन दुनिया जानती है कि अंततः पहली अप्रैल की भोर में करीब 4 बजे मरकज को खाली कराया जा सका। वहां से कुल 2361 लोगों को निकाला गया है। मरकज और आसपास के इलाके को सेनिटाइज कर सील कर दिया गया है, लेकिन तब तक मौलाना और जमाती सामाजिक दूरी और भीड़ न करने के आदेश के कचूमर निकाल चुके थे। दुर्भाग्य यह है कि उमर अब्दुल्ला और ओवैसी सरीखों ने इसमें भी सियासत का सूत्र तलाश लिया और उसे हिंदू-मुसलमान बनाने की कोशिश की है। इस तरह यह देश कोरोना वायरस की मार से कैसे लड़ सकता है, क्योंकि एक मजहबी सोच है कि बीमारी भी अल्लाह की देन है!

 

 

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