मैं ऐसा ही हूं

Apr 8th, 2020 12:05 am

अशोक गौतम

ashokgautam001@Ugmail.com

कोरोना के डर के बीच निडर हो हमें बचाने किसी भगवान के आने का इंतजार कर रहा था कि अचानक दरवाजे पर थाप हुई। दरवाजे पर होती थाप सुन बड़े दिनों बाद दरवाजा खोलने दरवाजे की ओर लपका भरा ही कि किसी ने मुझे मेरे भीतर से रोकते आदेश दिया, क्या कर रहे हो? मरना है क्या? जानते नहीं, बचने के लिए दरवाजा खोलना मना है।’ ‘मतलब?’ ‘दरवाजा मत खोलो! तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूं, सलामती चाहते हो तो,’ मेरे भीतर से उसने मुझे सावधान करते कहा। ‘बाहर कोई आया है। हो सकता है मसीहा ही हो’ ‘और ये भी तो हो सकता है कि मसीहा के भेस में कोई और ही हो? ‘मतलब?’ ‘यार, ये तो युगों पहले की बात है। अब तो कलियुग चला है कलियुग। पता ही नहीं चलता कि कौन किसका भेस धारण कर छल जाए? आज तो यहां असली भेस वालों से ज्यादा नकली भेस वाले भेस बदलकर सड़क से लेकर संसद तक घूम रहे हैं।’ तो.. ‘तो कुछ नहीं। चल, दरवाजा बंद कर और क्वारंटीन हो जा।’ ‘पर यार! जो दरवाजे पर भगवान हुए तो?’ महामारी के इस काल में वे धरती पर आकर पंगा लेंगे क्या? वे हम जैसे मूर्ख नहीं कि…. मौत से किसे डर नहीं लगता?’ पर मैंने उसकी एक न सुनी और दरवाजा खोल ही दिया। गौर से देखा तो सामने साधु के भेस में। शुक्र है, चोर के भेस में न था ‘और बेटा, क्या हाल हैं?’ ‘बस, ठीक ही हैं बाबा! लॉकडाउन में जैसे-कैसे अपने को खोले बैठे हैं,’ मैंने उनमें जोर जबरदस्ती भगवान ढूंढते कहा ‘घर सेनेटाइज किया कि नहीं? दिन में दस बार हाथ मल रहे हो या नहीं? बीच-बीच में दिमाग भी सेनेटाइज कर लिया करो। बेटा, बाबा लोग चीन से चले हैं। विश्व कल्याण हेतु विश्व भ्रमण पर निकले हैं। आगे हाथ करो और बाबा का प्रसाद ले स्वर्ग के उत्तराधिकारी बनो,’ बाबा ने चिमटा ठनका तन्मय हो कहा तो पैदाइशी समझ न होने के बाद भी समझते देर न लगी कि ले बेटा! बाबा के भेस में छलिया आ गया! सो उससे मीटर भर दूरी के बदले चार मीटर दूरी बनाते हाथ अपनी देह के भीतर छिपाते पूछा,’ तो आप? महामारी के दौर में भी छल?’ ‘छल तो हर युग में होते रहे हैं बेटा! और फिर यह कलियुग तो है ही छलयुग!’ ‘मतलब, तुम साधु के भेस में वही कोरोना हो जिसको लेकर मूर्खता के बाजार से लेकर समझदारी के बाजार तक में तथ्यों से अधिक अफवाहें गर्म हैं’ ’हां बेटा! मैं वही कोरोना हूं। पर क्या करें बेटा? पापी पेट के लिए भेस बदलना ही पड़ता है। असली भेस वाले को तो अब लोग तो क्या,  भगवान भी फ्रॉड कहते हैं।…’ तुम तो मेरे डर से ऐसे घर में कैद हो गए जैसे…. पर तुम ये सब गजब कर कैसे लेते हो?’ ‘मतलब?’ मैंने धीरे-धीरे अपने पांव भीतर सरकाते पूछा ‘मतलब ये कि थाली बजा-बजाकर तुम्हारे कान बहरे हुए हों या न, पर देखो तो, मेरे कान बहरे कर दिए तुमने। इसके लिए तुमको नहीं, तुम्हारे विश्वास को दाद देता हूं यार! मेरे आने से पहले ही मुझसे बचने को पता नहीं कहां-कहां से, क्या-क्या सोशल मीडिया पर सजा समाज को जागरूक कर दिया तुमने, इतने विश्वास के साथ कि पूछो ही मत। जब-जब थकान मिटाने को सोशल मीडिया पर जाता हूं तो परेशान हो जाता हूं कि यहां तो हर जीव खानदानी हकीम है।’ डगमगाते हुए भी इतने कैसे जगमगा लेते हो यार तुम लोग?’ उसके प्रश्न का जवाब देने के बदले मैंने जेब से चोरी-चोरी डुप्लिकेट कंपनी का ब्रांडेड सेनेटाइजर निकाल उस पर सेंट के बहाने छिड़का तो उसका कहीं पता ही नहीं चला।

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