जन-चिंताओं के अनुरूप हो बंदी

May 27th, 2020 12:05 am

विकेश कुमार बड़ोला

लेखक उत्तराखंड से हैं

फिर राज्यों के पास अपने संपूर्ण राज्यवासियों की घर-घर जाकर स्वास्थ्य जांच करने और रक्त प्रतिदर्श एकत्र करने की व्यवस्थाएं भी नहीं हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों में स्थितियां कई गुणा अधिक चुनौतीपूर्ण हैं। कोरोना के रोगजन्य लक्षण ऐसे नहीं कि थर्मल स्क्रीनिंग करने और 14 या 21 दिन तक पृथक-आवासीकरण कर लोग कोरोना से मुक्त हो जाएंगे। भारत में अब तक अनेक रोगी ऐसे भी निकले हैं जिनमें उनकी थर्मल स्क्रीनिंग किए जाने और होम क्वारंटीन की अवधि बीत जाने तक तो कोरोना के रोग लक्षण नहीं दिखे, परंतु बाद में उनके रोगग्रस्त होने और उनके रक्त प्रतिदर्श की जांच में उनके कोरोना पॉजिटिव होने के समाचार हैं। इसलिए आगामी लॉकडाउन की घोषणा लोगों की चिंताओं को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए….

ट्रंप का यह वक्तव्य अति ध्यान करने योग्य है कि उन्हें अधिक अमरीकियों के संक्रमित होने की प्रसन्नता है। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा क्योंकि इससे वे अपने आलोचकों का ध्यानाकर्षण उस एक महत्त्वपूर्ण बिंदु की ओर करना चाहते थे, जिसमें कोरोना से नागरिकों को स्वस्थ रखने का वर्तमान उपलब्ध उपाय अधिक से अधिक लोगों के रक्त प्रतिदर्शों की जांच से जुड़ा है। यदि अधिक लोगों के रक्त प्रतिदर्श एकत्र कर कोरोना के पॉजिटिव और नेगेटिव के विवरण त्वरित गति से प्राप्त होंगे तो उतनी ही त्वरित गति से पॉजिटिव सिद्ध लोगों की चिकित्सा संभव हो सकेगी। यदि कोरोना निवारण की औषधि बनने और औषधि बनने के बाद एक-एक व्यक्ति तक उसके पहुंचने में अभी महीनों का समय लगने वाला है तो इन स्थितियों में प्रत्येक उत्तरदायी राष्ट्र के पास कोरोना संक्रमण से सुरक्षित रहने का सर्वोत्तम उपाय अधिकतम अथवा प्रत्येक नागरिक के रक्त प्रतिदर्श की जांच करना ही है। अमरीका यही कर भी रहा है। उसके लिए यह असंभव भी नहीं है। वह अपने चालीस करोड़ से कम लोगों की स्वास्थ्य जांच पूरी कर लेगा, इसमें संदेह नहीं और यदि इस संदर्भ में भारत की स्थिति देखी जाए तो बड़ी भयावह है। चार चरणों की बंदी होने और प्रथम दो चरणों के बंदीकाल में सार्वजनिक जीवन व्यवहार और गतिविधियों सहित सब कुछ निषिद्ध होने के बाद भी अब एक आंकड़ा निकलकर आया है, जिसमें यह बताया जा रहा है कि यदि भारत ने बंद के चरणों को उत्तरोत्तर बढ़ाया नहीं होता तो यहां 78 हजार के लगभग लोग कोरोना से मर सकते थे। एक दृष्टि में तो यह आंकड़ा आकर्षित करता है। परंतु डेढ़ अरब से अधिक जनसंख्या वाले देश के अनुरूप तीन महीनों की बंदी की कुल जमा उपलब्धि कोरोना से केवल 78 हजार लोगों की जीवन सुरक्षा? जब इस दृष्टि से विचार करें तो यह उपलब्धि प्रतीत नहीं होती और ऐसे में तो कदाचित यह कोई उपलब्धि नहीं लगती जब बंदीकाल के तीसरे महीने में देश में संक्रमितों की संख्या प्रतिदिन पांच हजार और मृतकों की संख्या 100 तक पहुंच रही है। विगत बंदकाल बीत चुके हैं। बंदकाल के प्रमुख उद्देश्य सिद्ध हो चुके हैं। राष्ट्रीय शासन को विगत तीन माह के बंद अनुभव के अनुसार राष्ट्र परिचालन का अनुभव भी हो चुका है। भारत की जीवन और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बंद के आरंभिक चरणों में अनुमान लगाए गए थे कि मई-जून में गर्मी से कोरोना विषाणु समाप्त हो जाएगा। सामुदायिक संक्रमण नहीं फैलेगा। लेकिन यह क्या, कोरोना से मई में अब तक सर्वाधिक मृत्यु और संक्रमित होने के आंकड़े प्रकट हो रहे हैं। और प्रत्येक बढ़ते दिवस के साथ इन आंकड़ों में भयक्रांत करने वाली वृद्धि हो रही है। इन परिस्थितियों में भारतीय शासन ने वायु, रेल, बस और स्थानीय यातायात खोलने की अनुमति भी दे दी है। शहर के लोग गांवों में और गांवों में फंसे लोग शहर जा चुके हैं। कोई स्थान ऐसा नहीं बचा जहां सामुदायिक संक्रमण का प्रभाव न हो। मार्च और अप्रैल में राज्यों के जो अनेक जिले ग्रीन जोन, ऑरेंज जोन घोषित किए गए थे, मई में वही जिले ऑरेंज और रेड जोन घोषित हो चुके हैं। भारत में जैसे-जैसे बंद खोलने और गतिविधियां चलाने के निर्णय हो रहे हैं, वैसे-वैसे संक्रमण बढ़ता जा रहा है तथा संक्रमितों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। हालांकि राज्यों को अधिकार दे तो दिया गया है कि वे जिलावार संक्रमण की स्थितियों को देखते हुए गतिविधियों के क्रियान्वयन का निर्णय ले सकते हैं। परंतु राज्यों के सम्मुख विभिन्न चुनौतियां हैं। अंतरराज्यीय प्रवासन के कारण स्थितियां अधिक जटिल हो चुकी हैं। जिन राज्यों में श्रमिक अधिक संख्या में लौट रहे हैं, उन राज्यों पर आने वाले श्रमिकों की संपूर्ण स्वास्थ्य जांच करने के अतिरिक्त उनकी सामान्य खाद्य व आवास व्यवस्था करने का दायित्व है। वापस अपने गांव लौटे लोगों की संख्या अखिल भारतीय स्तर पर लाखों में नहीं, अब करोड़ों में पहुंच चुकी है। ऐसे में जिन राज्यों के गांवों में इतनी बड़ी जनसंख्या पुनर्स्थापन की परिस्थितियों से गुजरेगी, वहां जीवन जीने की स्थितियां सुगम नहीं होंगी। फिर राज्यों के पास अपने संपूर्ण राज्यवासियों की घर-घर जाकर स्वास्थ्य जांच करने और रक्त प्रतिदर्श एकत्र करने की व्यवस्थाएं भी नहीं हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों में स्थितियां कई गुना अधिक चुनौतीपूर्ण हैं। कोरोना के रोगजन्य लक्षण ऐसे नहीं कि थर्मल स्क्रीनिंग करने और 14 या 21 दिन तक पृथक-आवासीकरण कर लोग कोरोना से मुक्त हो जाएंगे। भारत में अब तक अनेक रोगी ऐसे भी निकले हैं जिनमें उनकी थर्मल स्क्रीनिंग किए जाने और होम क्वारंटीन की अवधि बीत जाने तक तो कोरोना के रोग लक्षण नहीं दिखे, परंतु बाद में उनके रोगग्रस्त होने और उनके रक्त प्रतिदर्श की जांच में उनके कोरोना पॉजिटिव होने के समाचार हैं। यदि सामुदायिक संक्रमण की स्थिति में लाखों-करोड़ों लोगों के रक्त प्रतिदर्श लेने की स्थितियां आकार लेंगी तो पहले तो रक्त प्रतिदर्श लेने का कार्य ही सहजतापूर्वक नहीं निपटाया जा सकेगा। ऊपर से यदि अधिसंख्य लोगों के रक्त प्रतिदर्श कोरोना पॉजिटिव होंगे, तो ऐसे में उनकी चिकित्सा की व्यवस्था कैसे संपन्न होगी? चिकित्सा व्यवस्था से पूर्व उनके क्वारंटीन की व्यवस्थाएं कैसे प्रबंधित होंगी और राज्य सरकारें जो बंदीकाल में राजस्व आय से पहले ही वंचित हो चुकी हैं, उनके पास लाखों-करोड़ों लोगों की खाद्यान व अन्य जैविक आवश्यकताओं की पूर्ति का क्या उपाय होगा। इन संभावित परिस्थितियों के संज्ञान के आलोक में आने वाले दिनों का चित्र अत्यंत भयाकुल करने वाला होगा। हालांकि केंद्र का शासन बंदी के समय को दीर्घावधि तक एक साथ बढ़ाने के स्थान पर संपूर्ण भारत और विश्व की जीवन परिस्थितियों के अनुसार कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर छोटे-छोटे समयांतरालों के लिए बंदी कर रहा है। परंतु शासन को विचार करना चाहिए कि वह विद्यालयी गतिविधियों के संदर्भ में छोटे-छोटे समय अंतरालों वाले बंदी चरणों को उपयोगी नहीं बना सकते। यदि बंदीकाल में ऑनलाइन, टेलीविजन और इंटरनेट के माध्यम से शिक्षा की औपचारिकताएं पूर्ण की जा रही हैं, पर ऐसा महीनों तक नहीं चल सकता। आशा है केंद्रीय शासन आगामी बंदी चरण की घोषणा से पूर्व लोगों की ऐसी ही अनेक चिंताओं को ध्यान में रखकर महत्त्वपूर्ण निर्णय लेगा।

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