पिता से विरासत में मिली थी देशभक्ति की भावना

May 30th, 2020 12:15 am

द्धितीय विश्व युद्ध के बाद आजाद हिंद फौज में भर्ती होकर देश को करवाया आजाद, रंगून जेल में रहे भूख-प्यासे

 नगरोटा सरियां-इस आयु में जब हम अपने परिवार के प्रति भी अपना उत्तरदायित्व नहीं समझते । वहीं, खुद को देश सेवा की भावना से ओत प्रोत होकर सालिगराम शर्मा 18 वर्ष की आयु में ही भारतीय सेना में बलोच रेजिमेंट की 4जी बटालियन में भर्ती हो गए।  इस क्रांतिकारी सैनिक सालिगराम शर्मा का जन्म पांच जून, 1925 को हलदून घाटी के बधोपल डाकघर दरोका तहसील देहरा गोपीपुर जिला कांगड़ा में माता स्व. निहातू देवी और पिता स्व. बलाकी राम के घर हुआ था । बड़े भाई स्व. संत राम शर्मा और चार बहनों में सबसे छोटे सालिगराम बड़ी ही विलक्षण बुद्धि के धनी व्यक्ति थे । इनकी प्राथमिक शिक्षा दरोका स्कूल में हुई ।  देश प्रेम की भावना इनको अपने पिता बलाकी राम से विरासत में मिली थी। द्धितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेनाएं अंग्रेजों के अधीन थी और अंग्रेजी सेनाओं के अधीन ही युद्ध लड़तीं थी। उसी दौरान द्धितीय विश्वयुद्ध में भारतीय सेना को अंग्रेजी हुकूमत ने द्धितीय विश्वयुद्ध में धकेल दिया । इस दौरान सालिगराम शर्मा को अफ्रीकन युद्ध सेवा मेडल से सन्मानित किया गया था। द्धितीय विश्वयुद्ध के दौरान ही जर्मन की नाजी सेनाओं के द्वारा भारतीय सेनाओं को सूड़ान आजिपट में युद्ध बंदी बना लिया गया और वर्मा की रंगून जेल में कैद कर लिया गया । जेल के दौरान इन्होंने कई यातनाएं सही व कई बार भूखे-प्यासे  रहे। उसी दौरान भारत मे स्वतंत्रता  आंदोलन  बड़े जोर शोर से चल रहा था  अंग्रेजों ने  कई नेताओं को भी जेलों में भर दिया था। उसी दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय सेना आजाद हिंद फौज का की स्थापना की थी। 1945 में सालिगराम शर्मा ने भारतीय सेना को छोड़कर भारतीय राष्ट्रीय सेना आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गए थे । सालिगराम शर्मा ने 1940 से लेकर 1946 तक लगभग सात वर्षों तक घर का दरवाजा तक नहीं देखा था । घरवालों ने इनको मृत घोषित कर दिया गया था, परंतु ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। जब 15 अगस्त ,1947 को भारत आजाद हुआ तो आजाद हिंद फौज के सेनानियों की वतन और घर वापसी की प्रक्रिया शुरू हुई। जब सालिगराम शर्मा के परिवार ने उनकी वापसी की सूचना परिवार और उनके गांव में मिली तो पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गई।  सालिगराम का घर पहुंचने पर जोरदार स्वागत किया गया।  उसके उपरांत इनकी शादी गांव जरोट में फुलां देवी से हुई । उनके परिवार में दो बेटे और दो बेटियां  हैं। इनका बड़ा बेटा शिक्षा विभाग में बतौर लेक्चरर और छोटा बेटा स्वास्थ्य विभाग में  स्वास्थ्य कार्यकर्ता व छोटी बेटी शिक्षा विभाग में बतौर केंद्र मुख्य शिक्षक सेवाएं दे रही हैं। आजादी के बाद कई वर्षों तक सरकार ने इनकी कोई सुध नहीं ली । इस दौरान इन्होंने अमृतसर में एक कपड़े की मिल में नौकरी मिलन गई।  मिल में सभी लोग इन्हें बाबू जी के नाम से पुकारते थे। अमृतसर में लगभग 12 वर्षों तक नौकरी करने के बाद घर आकर खेतीबाड़ी शुरू कर दी।  देश में जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी तो आजाद हिंद फौज के सभी सेनानियों को  ताम्र  पत्र देकर सन्मानित किया गया और इन्हें स्वतंत्रता सैनानी  धोषित किया गया और इनके सम्मान में पेंशन निधि  का प्रावधान  किया । इनके सहयोगियों में पंडित सुशील रतन ज्वालामुखी, मियां भाग सिंह देहरा,  सरला शर्मा देहरा,  लाल चंद प्रार्थी कुल्लू, शेर बहादुर थापा धर्मशाला, रसील सिंह जवाली,  प्रेम सिंह, प्रभात सिंह व बक्शी प्रताप सिंह इत्यादि इनके सहयोगी रहे। इनका परिवार पोंग बांध विस्तापित होकर गांव जरोट में बस चुका है । इनका निधन 30-5-1981 को गांव जरोट में हुआ था।

 

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