पुलिस के समक्ष चुनौतियां व समाधान

May 18th, 2020 12:05 am

राजेंद्र मोहन शर्मा

पूर्व डीआईजी

हाल ही में नागरिकता संशोधन बिल के संबंध में दिल्ली के शाहीनबाग में हुए दंगों में पुलिसवालों पर हर दिन पत्थर फेंके गए, कहीं जवानों की वर्दियां फाड़ दी गईं और कुछ जवानों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। आखिर क्या कारण था कि दंगाइयों से सख्ती से नहीं निपटा गया और पुलिस की कार्यप्रणाली क्यों दागदार होती रही? उत्तर स्पष्ट है कि कहीं न कहीं पुलिस नेतृत्व में कमी रही, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस की छवि मटमैली हुई। इसी तरह ऐसी भी घटनाएं हैं जब जवानों को उचित उपकरण नहीं मिले। बहुत से पुलिसकर्मी इस वजह से भी कोरोना से संक्रमित हुए हैं क्योंकि उनके पास पीपीई किट नहीं थे...

पुलिस को देखकर जनमानस के मानसिक पटल पर आमतौर में कोई अच्छा संदेश नहीं जाता तथा लोग पुलिस को बुराई का पर्याय समझते रहे हैं। पुलिस की छोटी सी कमी का ढिंढोरा तो पीट दिया जाता है, मगर अच्छाई का कभी भी गुणगान नहीं होता। पुलिस के हर कार्य को संदेह की दृष्टि से देखा जाता रहा है। ऐसा इसलिए भी होता रहा है, क्योंकि जनता ने पुलिस के कार्य को कभी भी नजदीकी से नहीं देखा और इन्हीं दूरियों के कारण पुलिस व जनता के आपसी संबंध मैत्रीपूर्ण व सौहार्दपूर्ण  नहीं हो सके। वास्तव में पुलिस को विभिन्न परिस्थितियों में काम करना पड़ता है तथा संभवतः उसे परोपकारी, बेचारी व अत्याचारी की संज्ञा दी जा सकती है। पुलिस को एक ऐसी दोहरी नंगी तलवार पर चलना पड़ता है जो दोनों तरफ  से काटती है। किसी अपराधी के साथ सख्ती न की जाए तो नपुंसक या कोढ़ी कह दिया जाता है और यदि उसके साथ सख्ती वाला व्यवहार किया जाए तो पुलिस को कलंकी माना जाता है। पुलिस को तो प्रतिदिन कुरुक्षेत्र की लड़ाई लड़नी पड़ती है। आजकल कोरोना की जंग में सभी लोग पुलिस को अपना मसीहा मान रहे हैं। पुलिसवालों के ऊपर पुष्षों की वर्षा की जा रही है तथा हर नागरिक अपनी सहानुभूति प्रकट करता नजर आ रहा है। ऐसा हो भी क्यों नहीं! आज हम जब सभी अपने-अपने घरों में महफूज हैं तो पुलिस वाले सड़कों, चौराहों, गली-कूचों में दिन-रात पहरेदारी करते नजर आ रहे हैं। पंजाब के पटियाला में हुई एक घटना में पुलिस के सहायक उपनिरीक्षक हरजीत सिंह को अपनी ड्यूटी बखूबी निभाते हुए अपना हाथ कटवाना पड़ा। आज सारा पंजाब इस योद्धा को सलाम कर रहा है और उसके शीघ्र सकुशल होने की कामना भी कर रहा है। ऐसे अन्य भी बहुत से उदाहरण हैं जिनमें पुलिसजनों ने हम सबकी सुरक्षा के लिए अपना बलिदान दिया है। वर्ष 2008 में मुंबई में आतंकवादी हमला हुआ तो हेमंत करकरे व तुक्का राम आंवले जैसे अधिकारियों ने हमलावर आतंकवादियों का डटकर मुकाबला करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। जनता आज ऐसे सभी पुलिसवीरों को नमन करते देखी जा सकती है, मगर कभी-कभी पुलिस की लाचारी व बेबसी का प्रयोजन भी देखने को मिलता है जिससे लोगों को पुलिस की कार्यकुशलता पर संदेह होना स्वाभाविक हो जाता है। हाल ही में महाराष्ट्र के पालघर जिले में एक ऐसी दर्दनाक व शर्मनाक घटना हुई, जिसमें हिंसक लोगों ने दो संतों व उनके ड्राइवर की पत्थरों व डंडों से निर्मम हत्या कर दी। पुलिस जवानों के सामने हत्या ही नहीं हुई, बल्कि इन जवानों ने उन संतों को मरने के लिए भीड़ के हवाले कर दिया।

इसी तरह वर्ष 2019 में  पुलवामा की आतंकवादी घटना में सीआरपीएफ के 40 जवानों की हत्या कर दी गई थी तथा इसमें उसी क्षेत्र के डीएसपी देवेंद्र सिंह की संलिप्तता भी पाई गई। ऐसे उदाहरणों ने पूरे पुलिस विभाग को दागदार कर दिया है। पुलिस की ऐसी कसाइगिरी व उद्दंडता की और भी कई घटनाएं हैं जो निश्चित तौर पर विभाग पर ग्रहण लगाती हैं। पुलिस नेतृत्व की लाचारी भी कभी-कभी पुलिस जवानों की कर्त्तव्यनिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लगा देती है। हाल ही में नागरिकता संशोधन बिल के संबंध में दिल्ली के शाहीनबाग में हुए दंगों में पुलिसवालों पर हर दिन पत्थर फेंके गए, कहीं जवानों की वर्दियां फाड़ दी गईं और कुछ जवानों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। आखिर क्या कारण था कि दंगाइयों से सख्ती से नहीं निपटा गया और पुलिस की कार्यप्रणाली क्यों दागदार होती रही? उत्तर स्पष्ट है कि कहीं न कहीं पुलिस नेतृत्व में कमी रही, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस की छवि मटमैली हुई। इसी तरह ऐसी भी घटनाएं हैं जब जवानों को उचित उपकरण नहीं मिले या फिर घटिया किस्म के मिलते रहे हैं। कोरोना की इस संकट की घड़ी में देखा गया है कि बहुत से पुलिसकर्मी इस वजह से भी संक्रमित हुए हैं क्योंकि उनके पास पीपीई किट नहीं थे। पुलिस को आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराए जाने चाहिए। यह भी आवश्यक है कि पुलिस का नेतृत्व एक योग्य, संयमशील व कर्मशील अधिकारी के पास हो जो जवानों का अग्रणी बनकर उन्हें आगे ले जाए और राजनीतिज्ञों के आगे नतमस्तक न होकर एक सिंह की तरह नेतृत्व प्रदान करे। मैं एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी हूं और सेवारत पुलिस कर्मियों से कहना चाहूंगा कि वे कोरोना संकट की घड़ी में अपनी ड्यूटी को कर्त्तव्यनिष्ठा व सक्रियता से निभाएं तथा जिम्मेदाराना मकसद लेकर अपनी वर्दी को दागदार होने से बचाएं। अपने काम से ही पुलिस कर्मी अपना सम्मान बढ़ा सकते हैं।

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