पैकेज के साए में आत्मनिर्भर हिमाचल

May 26th, 2020 12:04 am

प्रवीण कुमार शर्मा

सतत विकास चिंतक

यह पैकेज प्रदेश में उद्योगों को दशा और दिशा बदलने में कारगर साबित हो सकता है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम स्तर के  उद्योगों के लिए इस पैकेज में तीन लाख करोड़ रुपए का प्रावधान है। इससे  बीबीएन में एशिया के सबसे बड़े दवा उद्योग को और अधिक मजबूत करने के साथ ही हम प्रदेश में कृषि व बागबानी से संबंधित फूड प्रोसेसिंग यूनिट खोलकर देश के एक बड़े केंद्र के रूप में उभर  सकते हैं। बिजली वितरण में घाटे से जूझ रही कंपनियों के लिए 90000 करोड़ रुपए का प्रावधान भी सराहनीय है…

संकट अकसर अवसर लेकर आते हैं और महान वही है जो  सम्मुख आए संकटों को अवसरों में परिवर्तित करके इतिहास में अपना स्थान बना ले। कोविड-19 महामारी के कारण आर्थिक मंदी की शिकार वैश्विक अर्थव्यवस्था के इतर भारत सरकार ने इस  अभूतपूर्व आर्थिक मंदी में भी  देश को  आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में जो कदम उठाए हैं, उसके परिणाम निश्चित रूप से दूरगामी होंगे। सदियों से देश की आर्थिकी का सबसे मजबूत पक्ष,  अर्थव्यवस्था की सबसे छोटी इकाई अर्थात ग्राम स्तर पर  आत्मनिर्भरता रही है। अंग्रेजों ने अपने शासन के दौरान आर्थिकी के  इसी ढांचे को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमने पूंजीवाद, साम्यवाद व समाजवाद जैसे आर्थिक मॉडलों में उलझकर सदियों से हर कसौटी पर खरे उतरे विशुद्ध भारतीय ग्रामीण आत्मनिर्भरता के मॉडल को ही नकार दिया। परिणाम यह है कि मात्र दो महीनों में ही करोड़ों देशवासियों को अपने कार्यस्थलों से पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है। केंद्र सरकार द्वारा 2097053 करोड़ रुपए के ‘आत्मनिर्भर भारत पैकेज’ का विश्लेषण किया जाए तो इस प्रोत्साहन राशि के माध्यम से  सूक्ष्म, लघु व मध्यम स्तर के उद्योगों के साथ-साथ कृषि व गैर कृषक स्थानीय रोजगार के ढांचे को आत्मनिर्भर बनाने के प्रति सरकार की मंशा स्पष्ट नजर आ रही है। परंतु सरकार का यह सपना तभी साकार हो पाएगा जब सभी राज्य सामूहिक रूप से इस योजना का लाभ उठा पाएंगे। क्योंकि एक क्षेत्र का विकास और दूसरे का पिछड़ना सिर्फ  और सिर्फ  पलायन की समस्या को बढ़ाता है।

हिमाचल के संदर्भ में इस आर्थिक पैकेज का मूल्यांकन किया जाए तो इसे हम ‘गोल्डन चांस’ कह सकते हैं, पर देखना यह होगा कि अब तक के सबसे बड़े आर्थिक पैकेज में से हिमाचल प्रदेश अपना हिस्सा कैसे निकाल पाता है। यह केवल और केवल प्रदेश सरकार की कार्यकुशलता पर निर्भर करेगा। संत कबीर का यह दोहा इस आर्थिक पैकेज के संदर्भ में बिलकुल सटीक बैठता है ‘जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।’

हिमाचल के परिपे्रक्ष्य में इस पैकेज का दो भागों में वर्गीकरण कर सकते हैं। एक तात्कालिक लाभ और दूसरा दूरगामी लाभ। इस पैकेज में राज्य द्वारा ऋण लेने की सीमा को कुल जीडीपी का तीन फीसदी से बढ़ाकर पांच फीसदी कर दिया है। पहले हिमाचल प्रदेश इस वर्ष 4964 करोड़ रुपए का ऋण ले सकता था, परंतु इस सीमा को बढ़ाए जाने से अब प्रदेश 8273 करोड़ रुपए का ऋण ले सकता है। इससे वित्तीय तरलता तो बढ़ेगी, पर ज्यादा ऋण प्रदेश के लिए आत्मघाती साबित होगा। इसी के साथ मनरेगा मजदूरों की दिहाड़ी में 40 रुपए की वृद्धि, प्रवासी मजदूरों के लिए दो महीने तक मुफ्त राशन, किसानों को डीबीटी ट्रांसफर, महिला जनधन खातों में 500 रुपए प्रति माह, उज्ज्वला योजना के तहत तीन गैस सिलेंडर मुफ्त, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने हेतु केंद्रीय आर्थिक सहायता जैसे कदम तात्कालिक लाभों की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योग, बुनियादी ढांचे के विकास और कृषि व गैर कृषक ढांचे को आत्मनिर्भर बनाने हेतु पैकेज में उठाए गए कदम दूरगामी लाभों की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

यह पैकेज प्रदेश में उद्योगों को दशा और दिशा बदलने में कारगर साबित हो सकता है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम स्तर के  उद्योगों के लिए इस पैकेज में तीन लाख करोड़ रुपए का प्रावधान है। इससे  बीबीएन में एशिया के सबसे बड़े दवा उद्योग को और अधिक मजबूत करने के साथ ही हम प्रदेश में कृषि व बागबानी से संबंधित फूड प्रोसेसिंग यूनिट खोलकर  देश के एक बड़े केंद्र के रूप में उभर  सकते हैं। बिजली वितरण में घाटे से जूझ रही कंपनियों के लिए 90000 करोड़ रुपए का प्रावधान प्रदेश विद्युत विभाग के लिए घाटे से उबरने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

मनरेगा में 40000 करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि प्रदेश के ग्रामीण इलाकों के लिए विकास का बेहतर अवसर साबित होगी। इसी तरह कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर, औषधीय खेती, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, सेल्फ हेल्प ग्रुप की लोन सीमा में वृद्धि, केंपा के तहत अधिक राशि प्रदेश के समग्र विकास और उसे आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अत्यधिक सहायक साबित हो सकते हैं। हिमाचल  को पूर्व में भी ऐसे अवसरों का लाभ उठाने का अनुभव  है। वर्ष 2000 में जब प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का शुभारंभ हुआ था तो प्रो. प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में समय गंवाए बिना लोक निर्माण विभाग के इंजीनियरों ने शीघ्रता से डीपीआर  बनाना शुरू कर दी थी। इसका परिणाम यह हुआ कि जब तक अन्य राज्य कुछ कर पाते, हमने बढ़त बना ली थी, जिससे हम पूरे प्रदेश में गांवों को सड़क से जोड़ने में कामयाब हुए। बाद में अन्य राज्यों को भी हिमाचल द्वारा बनाई गई डीपीआर का ही अनुसरण करना पड़ा। इसी तरह वर्ष 2010 में केंद्रीय मंत्री ऑस्कर फर्नांडीज ने ईएसआईसी के मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा की तो हमने बिना समय गंवाए एक रुपए की लीज पर नेरचौक में भूमि उपलब्ध करवा दी। बेहतर समन्वय की बदौलत ही प्रदेश आईआईटी व एनआईएफडी जैसे संस्थान हासिल कर पाया था।

अब तो डबल इंजन वाली सरकार है। इसलिए प्रदेश सरकार को चाहिए कि इस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाने के लिए  काबिल अफसरों की एक कमेटी बनाकर इस आर्थिक पैकेज से हिमाचल को मिलने वाले  लाभों को प्राप्त करने के लिए व्यापक कार्य योजना बनाएं जिससे हिमाचल आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर हो सके। ऐसे समय में जबकि पूरा विश्व कोरोना वायरस की चपेट में है, स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देकर आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है। हिमाचल में भी पर्यटन, बागबानी-कृषि, शहद उत्पादन, पुष्पोत्पादन तथा औषधि निर्माण को प्रोत्साहन देकर आत्मनिर्भर हिमाचल का सपना साकार किया जा सकता है। आशा है कि सरकार इस दिशा में तेजी से काम करेगी। दूसरे राज्यों से प्रदेश में लौटने वाले हिमाचलियों के लिए भी सरकार को योजना बनानी होगी।

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