टीबी उन्मूलन में शानदार है सफलता: सुखदेव सिंह, लेखक नूरपुर से हैं

Jun 30th, 2020 12:06 am

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सुखदेव सिंह

लेखक नूरपुर से हैं

गांवों में लोगों का जीवन स्तर सही न होने की वजह से आज तक टीबी जैसी महामारी पर काबू नहीं कर पाए हैं। गांवों की गलियों में अक्सर गंदगी की भरमार रहती है और कूड़ा-कचरा इधर-उधर बिखरा पड़ा रहना रोजमर्रा की बात है। गांवों की ज्यादातर जनता को अभी भी खाना चूल्हे पर ही लकडि़यों के सहारे पकाना पड़ता है। लकड़ी जलाने से उत्पन्न होने वाला धुआं इस बीमारी का मुख्य कारण माना गया है। टीबी एक ऐसी बीमारी है जिसके कीटाणु दूसरे इनसान को जल्दी प्रभावित करते हैं…

क्षयरोग (टीबी) उन्मूलन कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश को देशभर में बहतरीन राज्य आंका जाना यहां की जनता का जागरूक होना और प्रदेश सरकार की कुशल कार्यप्रणाली का नतीजा है। स्कूल स्तर पर ही छात्रों के स्वास्थ्य की जांच किया जाना एक बेहतरीन पहल है। हिमाचल प्रदेश की सरकार पहाड़ को टीबी मुक्त बनाने के लिए सराहनीय कदम उठाए हुए थी। क्षय रोग एक ऐसी भयानक बीमारी  है जो दीमक की तरह इनसान को अंदर से खोखला कर देती है। यह बीमारी संक्रमण से फैलती है, इसलिए सावधानी बरतना ही सर्वहित में जरूरी है। टीबी जैसी खतरनाक बीमारी का इतिहास बहुत पुराना है। टीबी की बीमारी का इनसान किस तरह शिकार हुआ, अनेक बातें जानने को मिलती हैं। सदियों पहले टीबी बीमारी के लक्षण मिस्र के एक व्यक्ति में पाए जाने की पुष्टि हुई थी। आज यह भारत के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है।

टीबी से पीडि़त मरीज के लक्षण शरीर का वजन अचानक घटना, बुखार से ग्रसित रहना, भूख न लगना, कंधों-पसलियों में दर्द रहना और रात को सोते समय पसीना आना मुख्य हैं। बदलते सामाजिक परिवेश के चलते इनसान इतना व्यस्त हो चुका है कि अपना खानपान सही नहीं रख पा रहा है। इनसान जब अंदर शरीर से कमजोर हो जाए तो उसमें टीबी जैसी कई दूसरी बीमारियों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। यह भी बहुत बड़ा कारण है कि ज्यादातर लोग कई बीमारियों के शिकार होकर अस्पतालों की कतारों में खड़े मिल रहे हैं। कल तक कहा जाता था कि शराब पीने, तंबाकू खाने और दूसरे नशों के सेवन से टीबी की बीमारी तैयार हो रही है। सच्चाई तो यह कि टीबी ने नन्हें बच्चों और महिलाओं तक को भी नहीं छोड़ा है। मगर इस बीमारी के फैलने के बहुत से दूसरे कारण भी हो सकते हैं। इनसान के शरीर में सबसे ज्यादा बैक्टीरिया मांसाहारी खाना खाने से आता है और अकसर इसके बारे में जनता को स्वास्थ्य विभाग जागरूक भी करता आया है। फ्रोजन मांसाहार खाने से यह बैक्टीरिया इनसान को संक्रमित बनाने का काम ज्यादा कर रहा है। मांसाहार के अलावा जो सब्जियां  और फल हम मार्केट से लेकर खा रहे हैं, उस पर भी गौर करना आज के समय की जरूरत है। बाजारों में बकरे का मीट ज्यादातर बिना जांच के बेचा जा रहा है। बकरों में भी संक्रामक रोग पाया जाता है और उसकी हड्डियां अकसर कई तरह की बीमारियों से ग्रसित रहती हैं। समय के अभाव के चलते लोगों ने अब डिब्बाबंद चीजों का उपयोग करना ज्यादा शुरू कर रखा है। सालों से बंद डिब्बे में पैक हुई चीजें खाने से एक इनसान क्या अपनी सेहत बरकरार रख सकता है, शायद नहीं। किसान सब्जियों और फलों पर जहरीली दवाइयों और कीटनाशक स्प्रे का उपयोग आंखें बंद करके ज्यादा मुनाफा कमाने की सोच में कर रहे हैं। सब्जी मंडियों में ऐसी सब्जियां और फल बिना जांच के ही लोगों को खाने के लिए बाजारों में सजाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले वर्ष गली-मोहल्ले में कृषि की दवाइयां नौसिखियों की ओर से बेचने वालों पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था, मगर सरकार की यह योजना भी सिरे चढ़ती नजर नहीं आई। पानी की सही गुणवत्ता न होने की वजह भी लोगों के शरीर में संक्रमण फैलाने का काम करती है। मौसम बदलते ही लोग बुखार, उल्टियों और दस्त से प्रभावित हो जाते हैं।

 डाक्टर मरीज को हल्की दवा और इंजेक्शन लगाकर उसे हिदायत देता आ रहा है कि मामूली-सा अंदर इंफेक्शन है जो जल्द सही हो जाएगा। शरीर के अंदर किसी इंफेक्शन को खत्म करने के लिए ज्यादा एंटीबायोटिक दवाइयां खाना भी किसी खतरे से कम नहीं है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में दूषित जल पीने से कई लोग मौत का ग्रास बन चुके हैं। देश में अधिकांश जनता गांवों पर निर्भर करती है। गांवों में लोगों का जीवन स्तर सही न होने की वजह से आज तक टीबी जैसी महामारी पर काबू नहीं कर पाए हैं। गांवों की गलियों में अकसर गंदगी की भरमार रहती है और कूड़ा-कचरा इधर-उधर बिखरा पड़ा रहना रोजमर्रा की बात है। गांवों की ज्यादातर जनता को अभी भी खाना चूल्हे पर ही लकडि़यों के सहारे पकाना पड़ता है। लकड़ी जलाने से उत्पन्न होने वाला धुआं इस बीमारी का मुख्य कारण माना गया है। टीबी एक ऐसी संक्रमण फैलाने वाली बीमारी है जिसके कीटाणु दूसरे इनसान को भी जल्दी प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि चिकित्सक भी इस बीमारी के मरीज से दूरी बनाकर रखना अपनी मजबूरी बताते हैं। बहरहाल इस बीमारी के उन्मूलन में हिमाचल की सफलता शानदार है, लेकिन फिर भी हमें सचेत रहने की जरूरत है। हिमाचल प्रदेश में टीबी बीमारी से पीडि़त लोगों की संख्या अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा होना स्वास्थ्य विभाग की पोल खोलता है।

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