हाथ में कटोरा, नाम है रज्जो

Jun 2nd, 2020 12:05 am

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

कई दिनों बाद जब पंडित जॉन अली को सुबह सैर पर जाने का मौका मिला तो खुशी से उनके पैर हवा में तैरने लगे। मुझे लगभग दौड़ते हुए उनकी बराबरी करनी पड़ रही थी। इससे पहले कि मेरा दम फूलता, मैंने उनकी कमज़ोरी का ़फायदा उठाया। उनसे जब भी कोई प्रश्न पूछता है तो वह सारे काम छोड़कर बड़े प्यार से उसकी जिज्ञासा का समाधान करते हैं। ज्ञान के भंडार जॉन अली से मैंने पूछा, ‘‘पंडितजी! क्या नाम में ही दुनिया का सार छिपा है?’’ सुनते ही वह अपनी जगह पर रुक गए। कुछ पल बाद मैं भी उनके बराबर आ खड़ा हुआ। वह बोले, ‘‘नाम ही सब कुछ तो नहीं। लेकिन नाम के बिना भी काम कैसे चलेगा। अब ़खुद ही सोचें कि अगर उसेन बोल्ट का नाम विराट कोहली होता तो क्या वह दौड़ने की बजाय रन बनाता। किसी वस्तु या प्राणी के नैसर्गिक गुण ही उसकी पहचान होते हैं। अगर कुरसी को चारपाई बोलेंगे तो क्या उसके ऊपर लेट सकेंगे? सरकारी कर्मियों के मन की बात और है लेकिन बेचारे चारपाई को कुरसी का नाम देकर द़फ्तर में तो नहीं रख सकते। लेकिन फिर भी जब मन होता है तो वे कुरसी पर ही बैठे-बैठे लेट लगा लेते हैं। लेकिन अक्सर आदमी का स्वभाव उसके नाम के विपरीत ही देखने में आता है।’’ उनकी यह बात सुनकर मैं चौंका तो नहीं लेकिन मेरे ज़हन में आया कि बेहतर है अपना दिमा़ग दौड़ाने की बजाय नेताओं और नौकरशाहों की तरह छोटे बाबुओं का ही सहारा लिया जाए। उनकी तरह अपनी नज़र तो बस माल पर होनी चाहिए। जीवन तो देश की तरह भगवान भरोसे चल ही रहा है। वैसे भी आज के ज़माने में घिसे दिमा़ग की ़कीमत है कहां? दिमा़ग पर मतलब परस्ती की जितनी मोटी परत होगी, जीवन उतना ही सहल होगा। मैंने उनसे पूछा, ‘‘पंडित जी! मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। आप ही मेरे दिमा़ग की शिला पर चंदन घिसें तो कुछ ठंडक पहुंचे।’’ वह बोले, ‘‘अमां यार! हो बड़े चालू। लोमड़ की तरह ऊंट पर चढ़कर बा़ग के अंदर तो पहुंच जाओगे। लेकिन निकलोगे कैसे? कुछ अपना भी इस्तेमाल किया करो। वर्ना देश में लॉकडाउन खुलने के बाद जैसी असमंजस की स्थिति तुम्हारे जीवन में भी बनी रहेगी।’’ मैंने उन्हें मक्खन लगाते हुए कहा, ‘‘पंडित जी! आप हैं न।’’ पंडित जी बोले, ‘‘हां, लेकिन आप कहां हैं? अगर सारे अपनी-अपनी जगह होते तो ़खुद़गरज़ी की टिड्डियों की तरह देश के पत्तों को चटकर, दऱख्त को सूखने नहीं देते। ़खैर! बीन बजाने का ़फायदा भैंस के आगे तो होता नहीं। नेताओं और नौकरशाहों के कान होने के बावजूद उनमें असुरक्षा और स्वार्थों की मैल भरी रहती है। लेकिन चालाक इतने होते हैं कि ़खुद हिलने की बजाय दूसरों को डुलाते रहते हैं। तुमने नाम के विरोधाभासी होने की बात पूछी है न। तो सुनो, पहला उदाहरण है, हाथ में कटोरा, नाम है रज्जो। ऐसे ही नाम जरनैल और बंदा हो गार्ड्। नाम जगजीत और स्वभाव डरपोक। नाम दयावान और काम ज़ालिमों के। इसीलिए नाम पर नहीं गुण पर जाओ। शेक्सपियर के शब्दों में कहें तो गुलाब हमेशा गुलाब की सुगंध ही देगा, चाहे उसका नाम कुछ भी रख दें।’’

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