कोविड से ऐसे बचेगा सेब

Jun 28th, 2020 12:05 am

इस बार ज्यादा सेब खरीदेगी सरकार, डेढ़ लाख टन फ्रूट की स्टोरेज का है इंतजाम

कोविड के खतरे के बीच हिमाचल के सामने इस बार सेब की फसल को बचाने की चुनौती है। प्रदेश सरकार ने लगभग डेढ़ लाख मीट्रिक टन सेब के भंडारण की क्षमता का इंतजाम कर दिया है। इसमें निजी उद्यमियों की भी मदद ली गई है। कोविड की स्थिति  यदि ज्यादा बिगड़ जाती है तो बागबानों के सेब को सरकार उन सीए स्टोर में रखेगी ताकि बाद में स्थिति सामान्य होने पर सेब को बाजार में उतारा जा सके। पहली जुलाई के बाद सेब सीजन शुरू हो जाएगा और इसके बाद लगभग तीन महीने तक चलता रहेगा। विभाग ने हिमाचल से लेकर दिल्ली तक    सीए स्टोर का इंतजाम किया है जहां पर सेब को रखा जा सकता है। निजी उद्यमियों के पास कहां पर कितनी क्षमता है इसका पूरा खाका तैयार हो चुका है  जिसे सरकार को सौंपा जाएगा।

 विशेष संवाददाता, शिमला

ओलों ने उजाड़े बाग, बागबानों का दिल बैठा

हिमाचल में मानसून आने तक ही इस बार कई जगह ओलों ने बागों के तहस नहस कर दिया है। आलम यह है कि सरकार इससे जहां बेखबर है, वहीं बागबानों का दिल पूरी तरह बैठ गया है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आखिर वे अपनी व्यथा कहां और किसे सुनाएं। दूसरी ओर प्रदेश सरकार कोरोना से त्रस्त बागबानों के दर्द से पूरी तरह अनजान हैं। ओलों का आलम यह है कि  बागबानी, खुंब व फ्लोरीकल्चर को 201  करोड़ का नुकसान पहु़ंचा है। इसके फ्रूट को  165  करोड़  और खुंब-फ्लोरिकल्चर को 36 करोड़ का नुकसान  पहुचा है। शिमला जिला में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। शिमला जिला में अकेले बागवानी को 82.22 करोड़ का नुकसान पहुचां  है। मंडी जिला में भी 37.24 करोड़ और कुल्लू में 36.15 करोड से ज्यादा का नुकसान फलों को हुआ है। बागवानी विभाग ने  नुकसान की रिपोर्ट  प्रदेश सरकार के माध्यम से केंद्र को भेज दी ह,ै लेकिन बागबानों को कोरोना के माहौल में भरपाई की उम्मीद कम ही है।बागवानी विभाग के निदेशक  डा. एमएम शर्मा  ने  माना कि ओलो ंसे अब तक फलों को 201 करोड़ का नुकसान हो चुका                                                                     रिपोर्ट: कार्यालय संवाददाता,शिमला

शिमला में पहली जुलाई को पहुंचेंगे सेब कारोबारी

हिमाचल में सेब सीजन का आगाज हो  गया है। सेब की अर्र्ली वैरायटी मार्र्किट में पहुचनी शुरू  हो गई है। हालांकि  मौैजूदा समय  में जिला शिमला के पराला फल मंडी  में ही सेब की पहली फसल ने  दस्तक दी है, मगर जल्द ही  राज्य के कम ऊचांई वाले  क्षेत्रोें से फसल मार्र्किट  में पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। राज्य में सेब की खरीददारी करने आने वाले  खरीददारों  का पहले चिकित्सका जांच होगी। इसके बाद इन्हें क्वांरटाइन किया जाएगा।  एपीएमसी शिमला  किन्नौैर के चैयरमैन नरेश शर्मा ने बताया  कि  सेब खरीददार पहली जुलाईर् तक शिमला पहुंच जाएंगे।                कार्यालय संवाददाता, शिमला

हिमाचल में बढ़ा चैरी का क्रेज, इस बार मिले 300 रुपए तक दाम

हिमाचल के ऊंचाई वाले इलाकों में अब चैरी की फसल ने अपना अहम स्थान बना लिया है। अपनी माटी के इस अंक में इस बार  हम आपको यह बताने की कोशिश करेंगे कि आखिर क्यों बहुत सारे बागबान सेब की जगह चैरी को तवज्जो दे रहे हैं। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने नारकंडा बैल्ट का दौरा किया। हमने पाया कि नारकंडा से निचले इलाकों में चैरी का सीजन निपट चुका है,जबकि ऊपरी क्षेत्रों में सीजन जारी है। आढ़ती और कंपनियां बागबानों से घर द्वार माल उठा रहे हैं। बागबानों ने हमारे संवाददाता सुधीर शर्मा को बताया कि इस बार चैरी के दाम 100 रुपए से लेकर तीन सौ तक रहे हैं।  यह काफी अच्छे रेट हैं। बागबानों ने यह भी बताया कि सरकार ने उन्हें काम में छूट भी दी थी, इस कारण यह सब संभव हो पाया है।  जब हमने यह पूछा कि ज्यादातर बागबान चैरी को क्यों उगाना पसंद करते हैं,तो बताया गया कि सेब के मुकाबले इसे उगाने से लेकर तुड़ान और ट्रांसपोर्ट करना आसान है। यही वजह है कि बागबानों को यह खूब पसंद आ रही है। बताते चले कि विश्व में फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, स्विटजरलैंड, टर्की और अमरीका चैरी पैदा करने वाले प्रमुख देश हैं। भारत में अंग्रेजों ने चैरी की खेती शुरू की थी, लेकिन हिमाचल  में अभी बेहतर तकनीक विकसिन न होने से इसका विकास नहीं हो पाया। खैर, अब बागबान इसे तेजी से अपना रहे हैं।        रिपोर्टः निजी संवाददाता, मतियाना

मधुमक्खी पालना सीखेंगी महिलाएं

स्वयं सहायता समूहों के जरिए अपने स्वरोजगार में लगीं प्रदेश की महिलाओं   के लिए खुशखबरी है। इनके लिए एक नया प्रोजेक्ट आया है जिसमें इन महिलाओं को कृषि क्षेत्र में, पशुपालन में और मधुमक्खी पालन में ट्रेंड किया जाएगा।  इसके लिए बाकायदा केन्द्र सरकार ने हिमाचल को 35 करोड़ 83 लाख रूपए की राशि इस साल के लिए जारी की है। पंचायती राज मंत्री वीरेंद्र कंवर का कहना है कि नेशनल मिशन में 35 करोड़ 83 लाख रूपए की राशि मिली है जिसके जरिए यहां पर 300 महिलाओं को ट्रेंड किया जाएगा।

75 साल के अच्छर ने किया युवाओं को चैलेंज,मेरे बराबर बैलों से हल जोतकर दिखाओ

बेशक हिमाचल में अब बैलों की जगह ट्रैक्टर और पावर टिल्लर से खेती हो रही है। मौजूदा समय में न तो बैलों के गले में बजती घंटियों से दिन की शुरूआत होती है और न ही पुराने हल नजर आते हैं। लेकिन इस सब के बीच भी कुछ होनहार किसान हैं,जो घाटा खाकर भी अपनी विरासत को संजोए हुए हैं। इन्हीं किसानों में से एक हैं  ऊना जिला से भदसाली गांव के रहने वाले अच्छर राम । अच्छर राम आज भी बैलों से खेती कर रहे हैं। अच्छर बताते हैं कि उम्र के 75 साल कब गुजर गए पता ही नहीं चला। अपनी माटी टीम से बातचीत के दौरान अच्छर ने बताया कि आज बैलों की बेकद्री हो रही है,जो उनसे सहन नहीं होती। वह कहते हैं कि 15 साल की उम्र में उन्होंने हल जोतना सीख लिया था।  उन्हें हल चलाने का 60 साल का एक्सपीरियंस है। उम्र के इस पड़ाव में भी अच्छर के बराबर शायद ही कोई हल जोत पाए। वह चाहते हैं कि प्रदेश सरकार कोई ऐसी योजना बनाए,जिससे बैलों का संरक्षण हो, इनकी बेकद्री न हो। अच्छर जैसे होनहार किसानोें को अपनी माटी सलाम करता है। तो किसान भाइयो यह रही माटी के एक और लाल की कहानी, जल्द मिलेंगे नई स्टोरी के साथ।                 रिपोर्ट: कार्यालय संवाददाता, ऊना

कांगड़ा से मंडी तक अब नहीं महकते पुराने धान, परमल-हच्छू की जगह अब हाईब्रिड किस्मों का क्रेज

हिमाचल के मंडी-कांगड़ा और चंबा जिलों में धान की बंपर खेती होती है। इन दिनों मंडी की बल्ह घाटी , कांगड़ा घाटी और चंबा के इलाकों में धान रोपाई तेजी से चल रही है। किसान ज्यादातर हाईब्रिड बीज को तवज्जो दे रहे हैं। कहीं कहीं पारंपरिक किस्में भी हैं,लेकिन वे न के बराबर ही रोपी जा रही हैं। प्रदेश में किसी जमाने में  परमल , सावरमती, चीनू, टाबटा,,अच्छू आदि पुरानी किस्मों का दबदबा था,लेकिन अब इन किस्मों की जगह हाइब्रिड धान ने ले ली है। मसलन श्री राम खुशबू,दावत,100 नंबर ,834,312 आदि किस्में अब किसानों की पसंद हैं। बहरहाल अगर प्रदेश सरकार और कृषि विभाग को चाहिए कि धान की पुरानी किस्मों का भी संरक्षण किया जाए।            रिपोर्ट: टीम, गगल, नेरचौक,पालमपुर

यूं जीता ई पंचायत पुरस्कार

देश के ई पंचायत 2020 पुरस्कार में हिमाचल को पहला स्थान मिला है। भारत सरकार ने राज्य के पंचायती राज विभाग के कार्यो को खुब सराहा है। इसके साथ ही 3, 226 पंचायतो को ऑनलाइन करने के टीप्स दूसरे राज्य भी अब हिमाचल से लेना चाहते है। फिलहाल मुख्यमंत्री ने पंचायती राज विभाग को ई-पंचायत-2020 पुरस्कारों में प्रथम पुरस्कार हासिल करने पर बधाई दी। मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने पंचायती राज विभाग को भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय द्वारा दिए जाने वाले ई-पंचायत पुरस्कार-2020 के अंतर्गत प्रथम पुरस्कार हासिल करने पर बधाई दी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि पंचायती राज मंत्रालय सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से पंचायतों के कामकाज में कुशलता, पारदर्शिता तथा दक्षता लाने के प्रयास कार्य कर रहा है। जय राम ठाकुर ने कहा कि मंत्रालय विभिन्न राज्यों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों में पंचायतों द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी के प्रयासों को मान्यता प्रदान करने में अग्रणी रहा है।                                                                  सिटी रिपोर्टर, शिमला

55 हजार किसानों ने अपनाई जीरो बजट खेती

राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने प्रदेश में प्राकृतिक खेती का विस्तार करने और प्राकृतिक उत्पादों के विपणन को सरल बनाने के लिए प्रशिक्षण केंद्रों को स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। राज्यपाल शिमला में एक कार्यक्रम में सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती परियोजना के अधिकारियों के साथ प्रदेश में कार्यान्यवन रणनीति, लक्ष्य आदि पर विस्तार से बात की। राज्यपाल ने कहा कि प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने के लिए शिक्षित ग्रामीण बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है, ताकि प्रशिक्षित युवा अपने ज्ञान को किसानों तक पहुंचा सकें। उन्होंने कहा कि प्रदेश में अब तक प्राकृतिक खेती से 55 हजार किसान जुड़ चुके हैं,जोकि सुखद बात है।              रिपोर्ट: दिव्य हिमाचल ब्यूरो, शिमला

तुलसी की खेती… एक एकड़ से कमाएं 25 हजार

तुलसी की चर्चा शुरू होते ही हमारे सामने प्रत्येक घर के आंगन में उगने वाले औषधीय पौधे की तस्वीर सामने आ जाती है। तुलसी औषधीय गुणों का खजाना  है,जो विभिन्न कीड़ों व वैक्टीरिया को समाप्त करता है। यदि किसान तुलसी की खेती को बड़े पैमाने पर शुरू करते हैं तो इससे उन्हें आमदनी भी होगी। हिमाचल की बात करें तो इसकी खेती मंडी, ऊना, बिलासपुर, सिरमौर, कांगड़ा और सोलन जिलों के निचले क्षेत्रों में हो सकती है। एक एकड़ भूमि से लगभग पांच क्विंटल सूखा पंचांग प्राप्त किया जा सकता है तथा औसतन 80 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से 40 हजार रूपये तक की सकल जबकि 25 हजार रूपये तक की शुद्ध आय अर्जित की जा सकती है। नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक उत्तर भारत स्थित जोगिंद्रनगर डा. अरूण चंदन का कहना है कि कोरोना संकट के बीच औषधीय पौधों एवं जड़ी बूटियों की मांग में एकाएक बढ़ौतरी दर्ज हुई है। इस क्षेत्र में स्वरोजगार की अपार संभावनाओं को देखते हुए युवा किसान इस ओर आगे बढ़ सकते हैं।

            रिपोर्ट:  कार्यालय संवाददाता, जोगिंद्रनगर

ओलावृष्टि और टफरीना रोग की भेंट चढ़ा आड़ू

पीच वैली राजगढ़ में इस वर्ष हुआ बहुत कम फलोत्पादन

असमय बारिश ओलावृष्टि और टफरीना रोग के कारण इस वर्ष पीच वैली राजगढ़ में बहुत कम फलोत्पादन हुआ है । उद्यान विभाग के सूत्रों के अनुसार इस बार राजगढ़ क्षेत्र में भारी बारिश और ओलावृष्टि के कारण बागवानी का करीब दो करोड़ का नुकसान हुआ है। उप निदेशक उद्यान सिरमौर डॉ0 राजेन्द्र भारद्वाज का कहना है कि राजगढ़ वैली में हर वर्ष करीब 15 हजार मिट्रिक टन फलोत्पादन होता है जिसमें छः हजार मिट्रिक टन आड़ूए 3580 मिट्रिक टन पलमए चार हजार मिट्रिक टन सेब और  12 सौ मि0टन खुमानी का उत्पादन होता है परंतु इस वर्ष काफी वर्षों के उपरांत फलों की पैदावार बहुत कम हुई है। प्रगतिशील बागवान शेरजंग चौहानए अर्जुन मेहताए देशराज सहित अनेक बागवानों के अनुसार  कि इस वर्ष आड़ू, खुमानी और पलम की करीब 30 प्रतिशत पैदावार हुई है। इनका कहना है कि  अप्रैलए मई माह के दौरान  असमय बारिश होनेए ओले गिरने  तथा आड़ू की फसल में टफरीना रोग लगने से आड़ू की अधिकांश फसल तबाह हुई है । इसी प्रकार पलम की केवल एक ही किस्म ब्लैक अंबर को छोड़कर अन्य सेनटारोजाए रेड बीटए परून इत्यादि पलम की किस्म के पौधों में इस बार फल नहीं लग पाए हैं।

निजी संवाददाता यशवंतनगर

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