आत्म बल का अहंकार

By: Jul 18th, 2020 12:20 am

श्रीराम शर्मा

कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिडि़या ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा, तो तेज के प्रभाव से चिडि़या जल कर नीचे गिर पड़ी। ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया। दूसरे दिन वह एक सद् गृहस्थ के यहां भिक्षा मांगने गया। गृहिणी पति को भोजन परोसने में लगी थी।

उसने कहा, भगवान थोड़ी देर ठहरें अभी आपको भिक्षा दूंगी। इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति सेवा को अधिक महत्त्व दे रही है। गृह स्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा, क्रोध न कीजिए मैं चिडि़या नहीं हूं। अपना नियत कर्त्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूंगी।  ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिडि़या वाली बात इसे कैसे मालूम हुई? ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिला पुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे। भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुंचा। वह तौल नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया ओर कहा, तपोधन कौशिक देव! आपको उस सद्गृहस्थ गृह स्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है।

अपना नियत कर्म कर लूं तब आपकी सेवा करूंगा कृपया थोड़ी देर बैठिए। ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताए ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना? थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ, तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफा लेकर अच्छी चीजें लोकहित की दृष्टि से बेचता हूं। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजात चांडाल के पास जाइए। कौशिक मगध चल दिया और चांडाल के यहां पहुंचा। वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टांग प्रणाम किया और कहा, भगवान आप चिडि़या मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहां होते हुए यहां पधारे यह मेरा सौभाग्य है।  मैं नियत कर्म कर लूं, तब आपसे बात करूंगा तब तक आप विश्राम कीजिए।

चांडाल जब सेवा वृत्ति से निवृत्त हुआ, तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता-पिता को दिखाकर कहा, अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्त्तव्य कर्मों में निरंतर लगा रहता हूं, इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है। तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्त्तव्य कर्म निष्ठा पूर्व करते रहने से भी आध्यात्मिक लक्ष्य पूरा हो सकता है और सिद्धियां मिल सकती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को कभी भी अपने आत्म बल पर अहंकार नहीं करना चाहिए। संत और तपस्वी तो विनम्रता की मूर्त होते हैं।

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