जब संत के अनमोल वचन से चोरी करना भूल गया चोर, आस्था में पढि़ए आंखें खोल देने वाला यह लेख

By: Jul 8th, 2020 11:15 am

श्रीश्री रवि शंकर

एक बार की बात है, एक संत के पास एक चोर आया जो उनके शरणागत होना तो चाहता था, लेकिन साथ ही यह भी चाहता था की अपनी चोरी नहीं छोड़े। संत ने उसे इजाजत दी कि तुम चोरी तो कर सकते हो, लेकिन अगली बार जब तुम चोरी करो, तो पूर्ण सजगता के साथ चोरी करना। उस चोर ने सोचा यह तो बहुत आसान है सजगता के साथ चोरी करना कौन सी बड़ी बात है। लेकिन हुआ यूं कि अगली बार जब वो अपनी अगली चोरी के लिए तैयार हुआ, तो उसे संत की बात याद आ गई और वो अपने कृत के प्रति सजग हो गया और वो चोरी नहीं कर सका।  लेकिन समय बीतने के बाद भी जब वो चोरी के लिए सोचता या किसी घर में चोरी के लिए घुसता उसे संत की वाणी याद आ जाती और वो फिर चोरी नहीं कर पाता था। सजगता में बड़ी शक्ति है। यह आप में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकती है। जब हमें किसी चीज का ज्ञान होता है, तब चीजों को संभालना आसान हो जाता है। जब हम जिंदगी के बारे में थोड़ा बहुत समझ लेते हैं या जान लेते हैं, तो चीजों को संभालना आसान हो जाता है। जब एक शिष्य के जीवन में गुरु का आगमन होता है, तब उसकी परमसत्य के बारे में भी सजगता बढ़ जाती है। गुरु आपको अच्छे से मथते हैं ताकि आपका सर्वांगीण विकास हो सके और आप दिव्यता के साथ एक हो सकें। गुरु तपती धूप में या भयंकर तूफान में घिरे होने पर उस कुटिया की तरह है, जिसके भीतर जाकर आपको सुकून अवश्य प्राप्त होगा। भीतर जाने पर यही तपती धूप या यही भयंकर तूफान आपको सुंदर और आनंदमयी प्रतीत होगा। गुरु ज्ञान का खजाना लिए हुए कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं प्रकाश की तरह है, साधक के लिए गुरु जीवन शक्ति के समान है। गुरु एक तत्त्व है, हमें गुरु को शारीरिक स्तर पर ही महसूस नहीं करना चाहिए। संत कनकदास के बारे में एक बहुत ही सुंदर कहानी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अपने जीवन में गुरु की उपस्थिति को कैसे महसूस किया जाना चाहिए। एक बार कनकदास के गुरु ने उनको और अन्य भक्तों को एकादशी के उपवास को तोड़ने के लिए एक केला दिया, इस शर्त पर कि इसे केवल तभी खाया जाए, जब कोई नहीं देख रहा हो। अगले दिन शिष्यों ने अपने केले खाने के तरीकों का वर्णन किया। लेकिन कनकदास केला लेकर वापस अपने गुरु के पास आ गए। जब उनसे पूछा गया, तो कनकदास ने कहा कि जब भी उन्होंने केले खाने की कोशिश की तो हर वक्त, हर घड़ी और हर जगह उन्हें उनके गुरु की उपस्थिति महसूस हुई और वो इस केले को नहीं खा सके। इस अनुभव को हम सान्निध्य कहते हैं। इस अवस्था में सारे दुःख, सारी शिकायतें दूर हो जाती हैं और हम पूरी सजगता के साथ अपने कार्य में लग जाते हैं। इस विश्वास के साथ की कोई शक्ति है जो हर क्षण, हर घड़ी हमारा ध्यान रख रही है। फिर प्रश्न उठता है कि कैसे हम उस परम शक्ति के साथ जुड़ाव महसूस करें? हम कैसे उन गुरु को ढूंढे, जो हम अंदर उस प्रकाश की अनुभूति करा सके? इस प्रश्न का उत्तर देना बेहद कठिन है आपको अपनी अंतः प्रज्ञा के माध्यम से ही इसका अनुभव करना होगा। अगर आप गुरु की ओर एक कदम बढ़ाते हैं, तो गुरु आपकी और सौ कदम बढ़ाते हैं, लेकिन वो एक कदम का पहला कदम आपको यानी शिष्य को ही उठाना पड़ता है। अपने गुरु के जितने निकट जाएंगे, उतने ही आप खिलते चले जाएंगे। आप में ज्ञान, प्रेम और नयापन बढ़ता ही चला जाएगा। यही गुरु पूर्णिमा का महत्त्व है, अपने गुरु के प्रति कभी न अंत होने वाला और बिना किसी शर्त का संबंध रखना।

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