चुनाव में जरूर आना प्रभु

By: Aug 10th, 2020 12:05 am

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक

मुझे बोलना आ गया या देश ने सुनना छोड़ दिया, इस पर चारों तरफ मुगालता है। कुछ लोग मुगालते में बोल रहे हैं, जबकि अधिकांश मुगालते में ही सुन रहे हैं, बल्कि आजकल वही बोल रहे हैं, जो सुनना नहीं चाहते। भारतवर्ष में सुनते-सुनते पीढि़यां बदल रही हैं, लेकिन बोलना बंद नहीं हो रहा। संदेह अब जुबानी जमा या घटाव में नहीं, बल्कि सुन कर ही हम संदेह के भय से मुक्त हो रहे हैं। कभी कोई बोलता है कि देश बहुत आगे निकल गया, तो यकायक संदेह के पंख टूट जाते हैं। कभी-कभी तो खुद पर ही संदेह हो जाता है कि देश की जनता के लिए देश चल रहा है, जबकि देश चल नहीं रहा, आज तक संदेह नहीं हुआ।

मुझे बोलना क्यों आ गया या मैं बोल क्या रहा हूं, इसके अर्थ पर संदेह हो सकता है, लेकिन यह दौर कुछ न कुछ बोलने का है। कुछ न कहो की स्थिति से बाहर अगर कुछ कहना सार्थक नहीं, फिर भी जोर से कोई न कोई नारा ही लगा दो। हमारे आसपास कुछ हो या न हो, लेकिन नारा लगाया जा सकता है। नारे में जुबान नहीं आदमी बोलता है और इसलिए अब नारों में ही आदमी बचा है। पांच अगस्त को आदमी के नारों ने ही भगवान श्री राम को फिर से अयोध्या में महसूस किया।

इसलिए देश में देश के लिए महसूस करें। महसूस करें कि आपके लिए ही तमाम नेता कोरोना पीडि़त हो रहे हैं। देश कोरोना को इसलिए महसूस करने लगा, क्योंकि देश के सबसे कद्दावर गृह मंत्री अमित शाह को इसकी पीड़ा महसूस हुई। वास्तव में जनता अगर महसूस करने की ठान ले, तो सरकार कुछ भी कर सकती है। अब तो जिस पल भारतीय महसूस करते, उसी समय देश से चीन को घबराहट होती है। परसों मैंने यूं ही पाकिस्तान की दिशा में देख कर महसूस किया ही था कि इमरान खान भयभीत हो गया। बाद में अपने दीपक चौरसिया ने इसकी पुष्टि की और इसलिए जब कभी अर्णब गोस्वामी कहता है, मैं देश को अपने भीतर महसूस कर लेता हूं। दरअसल महसूस करने की मेरी अतिरंजना अब केंद्र सरकार से लेकर इसकी एजेंसियों तक भारी पड़ने लगी है। मेरे महसूस करते ही पीएम से सीएम तक के काफिले निकल पड़ते हैं।

अब तो सियासी काफिलों की तैयारी मात्र से मेरा घर, मेरा वजूद ऋणी हो जाता है, इसलिए देश का कर्जदार हूं। मेरे दिल में बसे राम भी अब महसूस कर रहे हैं और जब से अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण का आगाज हुआ है, भगवान भी मेरी तरह सरकार के कर्जदार हो गए। मेरी तरह भगवान श्री राम भी अगले चुनाव में कर्ज उतारेंगे और अब तो लगने लगा है कि ईश्वर को हर चुनाव में आना पड़ेगा। कभी लगता है ईश्वर बदल गया और मंदिर भी बदल गया। कोरोना काल में हमारी खामोशी पर न जाने भगवान कहां बैठे रहे, लेकिन जैसे ही मंदिर ने हुंकारा भरा, वे पुनः लौट रहे हैं। अब राम बोल रहे हैं, इसलिए देश भी बोलेगा, लेकिन इसके लिए मुझे इस जन्म का कर्ज उतारना पड़ेगा। हे भगवान! इस बार चुनाव बनकर मेरे करीब आना, ताकि उधार चुकाने का बहाना प्रत्यक्ष रूप में मिल सके।

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