कजरी तीज : अखंड सुहाग के लिए शिव-पार्वती का पूजन

Aug 1st, 2020 12:33 am

कजरी तीज भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला त्योहार है। इस पर्व को हरितालिका तीज भी कहा जाता है। इस अवसर पर सुहागिन महिलाएं कजरी खेलने अपने मायके जाती हैं। इसके एक दिन पूर्व यानी भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया को रतजगा किया जाता है। महिलाएं रात भर कजरी खेलती तथा गाती हैं। कजरी खेलना और कजरी गाना दोनों अलग-अलग बातें हैं। कजरी गीतों में जीवन के विविध पहलुओं का समावेश होता है। इसमें प्रेम, मिलन, विरह, सुख-दुख, समाज की कुरीतियों, विसंगतियों से लेकर जन जागरण के स्वर गुंजित होते हैं।

स्वरूप

कजरी तीज से कुछ दिन पूर्व सुहागिन महिलाएं नदी-तालाब आदि से मिट्टी लाकर उसका पिंड बनाती हैं और उसमें जौ के दाने बोती हैं। रोज इसमें पानी डालने से पौधे निकल आते हैं। इन पौधों को कजरी वाले दिन लड़कियां अपने भाई तथा बुजुर्गों के कान पर रखकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इस प्रक्रिया को ‘जरई खोंसना’ कहते हैं। कजरी का यह स्वरूप केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित है। यह खेल गायन करते हुए किया जाता है, जो देखने और सुनने में अत्यंत मनोरम लगता है। कजरी-गायन की परंपरा बहुत ही प्राचीन है। सूरदास, प्रेमधन आदि कवियों ने भी कजरी के मनोहर गीत रचे थे, जो आज भी गाए जाते हैं। कजरी तीज को सतवा व सातुड़ी तीज भी कहते हैं। यह माहेश्वरी समाज का विशेष पर्व है, जिसमें जौ, गेहूं, चावल और चने के सत्तू में घी, मीठा और मेवा डाल कर पकवान बनाते हैं और चंद्रोदय होने पर उसी का भोजन करते हैं।

महत्त्व

भारतीय संस्कृति में त्योहारों का विशेष महत्त्व है। सुख, सौभाग्य और पराक्रम का बोध कराने वाले त्योहारों का हिंदू जनमानस में हमेशा स्वागत किया जाता है। विशेषकर महिलाओं में गजब का उत्साह दिखाई पड़ता है। ऐसा ही महिलाओं का एक अति विशेष त्योहार है कजरी तीज। यह व्रत भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाने की परंपरा है। शास्त्रों में कहा जाता है कि अखंड सुहाग के लिए इस दिन शिव-पार्वती का विशेष पूजन होता है। शास्त्रों में इसके लिए विधवा-सधवा सभी को व्रत रखने की संपूर्ण छूट है। इस व्रत को हरितालिका इसलिए कहते हैं कि पार्वती की सखी उसे पिता प्रदेश से हरकर घनघोर जंगल में ले गई थी। ‘हरत’ शब्द का अर्थ है हरण करना तथा ‘आलिका’ शब्द का अर्थ है सहेली, सखी आदि, अर्थात सखी हरण करने की प्रक्रिया के कारण ही इस व्रत का नाम हरितालिका तीज व्रत पड़ा। मुख्यतः इस दिन व्रत रखने वाली स्त्रियां संकल्प लेकर घर की साफ-सफाई कर पूजन सामग्री एकत्रित करती हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि इस व्रत को करने वाली सभी स्त्रियां देवी पार्वती के समान सुखपूर्वक पतिरमण करके साक्षात शिवलोक को जाती हैं। इस व्रत में पूर्णतः निराहार निर्जला रहना होता है। सूर्यास्त के समय स्नान करके, शुद्ध तथा श्वेत वस्त्र धारण कर शिव-पार्वती की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजन करना चाहिए। जहां तक संभव हो, प्रातः, दोपहर और सायंकाल की पूजा भी घर पर ही करना श्रेयस्कर होता है।

व्रत विधि

स्त्रियां निराहार निर्जला रहकर व्रत करें। पूजन के पश्चात ब्राह्मण को भोजन के साथ यथाशक्ति दक्षिणा देकर ही व्रत का पारण करें। सुहाग सामग्री किसी गरीब ब्राह्मणी को ही देना चाहिए। सास-ननद आदि को चरण स्पर्श कर यथाचित आशीर्वाद लेना चाहिए। शुद्धता के साथ और शुद्ध मनःस्थिति के साथ ही शिव-पार्वती का पूजन करना चाहिए। सच्ची लगन और निष्ठा के साथ ही गौरी-शंकर का पूजन-भजन करना चाहिए।

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