क्या 100 करोड़ से बनेगा फल राज्य

By: Aug 2nd, 2020 12:06 am

यूं तो हिमाचल को फल राज्य का तमगा मिला है, लेकिन सेब और अन्य फलों को उगाने की पुरानी विधियों से अकसर इस पहाड़ी राज्य की आलोचना होती है। मसलन अब हिमाचल में खेती और बागबानी की नई तकनीकों के इस्तेमाल की मांग उठ रही है,ताकि यह प्रदेश दूसरों को कड़ा कंपीटीशन दे सके। अब प्रदेश को एक नई योजना के तहत फल राज्य बनाने पर 100 करोड़ और खर्च होंगे। योजना यह भी है कि 170 हेक्टेयर क्षेत्र मेें फलदार पौधे लगाए जाएंगे।

एचपी शिवा पायलट परियोजना म 2 5 हजार परिवारों को जोड़ा जाएगा बागबानी से, हिमाचल के निचले क्षेत्रों में 17 समूह गठित किए जाएंगे, लेकिन सवाल यही है कि आखिर इन परिवारों और समूहों  के काम की धरातल पर मानीटरिंग कैसे होगी। आखिर कैसे दर्जनोें हेक्टेयर पर लगने वाले पौधों की दरख्त बनने तक देखभाल होगी। यह भी सच है कि प्रदेश में हर साल पौधारोपण अभियान चलते हैं। इन अभियानों में ज्यादातर बूटे रोपने से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। खैर अब  राज्य सरकार ने एशियन विकास बैंक द्वारा वित्त पोषित एचपी शिवा परियोजना तैयार की है।

जहां तक इस प्रोजेक्ट की बात है,तो इसे सबसे पहले  निचले हिमाचल के चार जिलों में लागू किया जा रहा है, जिनमें बिलासपुर, मंडी, कांगड़ा और हमीरपुर जिले शामिल हैं। चयनित जिलों में परियोजना को लागू करने के लिए 17 समूह गठित किए गए हैं, जिनके अंतर्गत बिलासपुर में चार, मंडी में छह, कांगड़ा में पांच व हमीरपुर जिला में दो समूह गठित किए गए हैं।

रिपोर्टः विशेष संवाददाता, शिमला

फिर वही सवाल,लंबे समय तक कैसे होगी देखभाल

शुरू में चार जिलों मे दो साल चलने वाले इस पायलट प्रोजेक्ट के माध्यम से लगभग 500 परिवारों को बागबानी गतिविधियों से जोड़ा जाएगा। परियोजना के अंतर्गत लगभग 2.50 लाख फलदार पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इनमें संतरा, लीची, अमरूद, अनार इत्यादि फलदार पौधे शामिल हैं। सवाल फिर वही है कि आखिर लंबे समय तक इस योजना की मॉनीटरिंग कौन और कैसे करेगा।

2021-22 में शुरू होगा काम

एशियन विकास बैंक द्वारा वित्त पोषित एचपी शिवा परियोजना के पायलट प्रोजेक्ट के सफल कार्यन्वयन के बाद परियोजना का मुख्य प्रोजेक्ट वर्ष 2021-22 में आरंभ किया जाएगा, जिस पर लगभग 1000 करोड़ रुपये खर्च किए जाने प्रस्तावित हैं। परियोजना के प्रथम चरण में प्रदेश के लगभग 25 हजार परिवारों को बागबानी गतिविधियों से जोड़ा जाएगा।

ऊना के बागबान ने मेहनत के बूते उगाए 52 हजार पौधे

कहते हैं ढंग से सहेजना हो तो एक ही बूटा काफी होता है। सोचिए, जिसने  52 हजार पौधे सहेजें  हों, उसने कितनी मेहनत की होगी। जी हां, हम आपको ऐसे ही किसान से मिलाने जा रहे हैं,जो एक भी  बूटे को मरने नहीं देता। इस किसान का नाम है बेल सिंह संधू। संधू ऊना जिला के  संजोट गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने अपनी नर्सरी में विभिन्न किस्मों के 52000 पौधे सहेजे हैं।  उनकी नर्सरी में फल सब्जियों की एक से बढ़कर एक किस्म है।  उनकी नर्सरी में  आम की अलफांसो , आम्रपाली ,  मलिका, दशहरी , लंगडा से लेकर   केसर ओर नीलम जैसी कई उन्नत किस्में हैं । इसके अलावा थाईलैंड जामुन , एवाकैडो , ड्रैगन फ्रूट, जादू फ्ल , अमरूद,  नींबू  जैसे फल भी हैं। यही नहीं इमारती लकड़ी के लिए सांगवान , चन्दन ,  तुन  व औषधीय बूटों में  हरड़, बेहड़ा, तुलसी ,परिजात जैसे पौधे भी हैं।

रिपोर्टः स्टाफ रिपोर्टर, ऊना

पद्धर के रमेश से लें देसी शहद  किलो के लगेंगे 700 रुपए

मंडी जिला के  पद्धर उपमंडल की  डलाह पंचायत निवासी रमेश चंद की गिनती आज सफल किसानों में होती है। रमेश के पास मधुमक्खियों के तीन सौ बाक्स हैं। इनमें से 70 बाक्स तो मौन तैयार करने में लगे हैं।  एक बार में दो क् िवंटल शहद निकालने वाले रमेश कहते हैं कि इटैलियन शहद जहां साढे चार सौ रुपए किलो बिकता है, वहीं देसी शहद 700 रुपए किलो बिकता है। रमेश कहते हैं कि कुछ साल पहले वह गरीबी का जीवन जी रहे थे। चमाह गांव निवासी रमेश चंद ने बताया कि उनके जीवन में टर्निंग प्वाइंट उस समय आया जब साल 2019 में उन्होंने  कृषि विज्ञान केंद्र सुंदरनगर से मौनपालन की सात दिन की ट्रेनिंग ली। उसके बाद पद्धर में मुख्यमंत्री मधु विकास योजना  के लिए आवेदन किया। इस पर उन्हें पहले 50 बक्से  80 फीसदी अनुदान पर मिले। फ्रेम और मौनपालन के लिए भी सबसिडी मिली।  खैर कड़ी मेहनत से आज रमश्े के पास 300 बाक्स हैं। इनसे ठीक ठाक कमाई हो जाती है।  उधर पद्धर से उद्यान विकास अधिकारी डॉक्टर किरण  ठाकुर ने बताया कि  मौनपालकों को औजारों पर भी सबसिडी दी जाती है। बी कीपर्ज को इन योजनाओं का लाभ उठाना चाहिए।

रिपोर्टः स्टाफ रिपोर्ट, पद्धर

गिरिपार में सेब का लो हाइट बगीचा तैयार

शिलाई— गिरिपार क्षेत्र के शरली गांव के प्रगतिशील व उन्नत्त बागबान कुंदन सिंह शास्त्री ने लो हाइट में सेब का  बागीचा तैयार कर बड़ी कामयाबी हासिल की है। इन दिनों सेब से लदे पेड़ों से फसल की तूड़ान हो रही है जो एक सप्ताह के भीतर मंडी में चला जाएगा। इस बागबान को यदि वैज्ञानिक बागबान का नाम दिया जाए तो गलत नहीं होगा। कुंदन सिंह शास्त्री ने दिव्य हिमाचल को बताया कि उन्होंने ट्रायल के तौर पर सेब के बागीचे लगाने की ठानी। इससे उनको कामयाबी मिली है। उनकी आगे की योजना है कि  वह इस वर्ष आर्गेनिक विधि से सेब के पौधे लगाने जा रहे हैं।

मान गए गुरूजी, सलापड़ के शिक्षक ने उगाई 35 सेंटीमीटर लंबी लौकी

कोरोना ने सारे विश्व में तबाही मचा रखी है। हर कोई ज्यादा वक्त घर में बिता रहा है। लेकिन हिमाचल के लोग ज्यादा समय खाली नहीं बैठ सकते । यही कारण है कि घरों में लोगों ने सब्जियां उगाना शुरू कर दी हैं। मेहनतकश लोगों की बदौलत घरों के आसपास अब झाडि़यों की जगह सब्जियां नजर आ रही हैं। कुछ ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है मंडी जिला के सलापड़ निवासी शिक्षक कृष्ण लाल ने। कृष्ण ने अपने  गार्डन में 35 सेंटीमीटर लंबी लौकी उगाकर लोगों को हैरान कर दिया है।  कृष्ण लाल को उम्मीद है कि इस लौकी का साइज अभी और बढ़ेगा। तो किसान भाइयो कैसी लगी यह स्टोरी । कमेंट बाक्स में जरूर अपनी राय दें। जल्द मिलेगे नई कहानी के साथ।

रिपोर्टः निजी संवाददाता, डैहर

80 से ज्यादा फसलों को चट कर जाता है फाल आर्मी वार्म

जिला सिरमौर के किसान फाल आर्मी वोर्म कीड़े से मक्की की फसल को बचाने के लिए सावधानी बरतें। यह जानकारी कृषि उपनिदेशक सिरमौर डा. बलदेव पराशर ने दी। उन्होंने बताया कि सिरमौर में लगभग 24000 हेक्टेयर भूमि पर मक्का की खेती की जाती है जिससे लगभग 58750 मीट्रिक टन उत्पादन प्राप्त होता है। इस वर्ष फाल वोर्म नामक कीड़े के प्रकोप के कारण जिला सिरमौर में मक्की की खेती करने वाले किसान दिक्कत का सामना कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि विशेषज्ञों के अनुसार जिला सिरमौर के निचले इलाकों में तथा गिरिपार वाले क्षेत्र में इस कीट का अधिक प्रकोप देखने को मिल रहा  है और अभी तक लगभग 4000 हेक्टेयर मक्की की फसल में खेत के बीच में ही स्थानीय पैच के रूप में 10 से 15 प्रतिशत पौधे इस कीड़े से ग्रसित पाए गए हैं। उन्होंने कहा कि  यह कीड़ा 80 से ज्यादा फसलों को नुकसान पहुंचता है। इसी से इस कीड़े के खतरों को भांपा जा सकता है।

रिपोर्टः दिव्य हिमाचल ब्यूरो, नाहन

मक्की का काल बना खतरनाक कीड़ा

मक्की की फसल के लिए आर्मी वर्म कीड़ा काल बन गया है। हिमाचल में जहां भी मक्की उगाई जाती है, करीब सभी इलाकों में इस कीड़े ने अपने पांव पसार लिए हैं। यह कीड़ा कुछ पल में ही पौधे को गरक कर  देता है। अपनी माटी टीम ने इस मसले को लेकर कांगड़ा जिला की रक्कड तहसील के गांवों का दौरा किया। यहां  कुडना-सलेटी, सरड-डोगरी, पुनणी, कटोह-टिक्कर,  कौलापुर, रक्कड, शांतला व भरोली-जदीद  हालात खराब हैं। किसानों ने बताया कि अगर समय रहते इस कीड़े को न मारा गया, तो पूरे प्रदेश में मक्की खराब हो जाएगा। दूसरी ओर कृषि विभाग परागपुर के एग्रीकल्चर ऑफिसर मदन मोहन शर्मा ने किसानों से कहा है कि इस कीड़े को रोकने के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट कीटनाशक दवाई का छिड़काव करें। उन्होंने बताया कि इस कीड़े को फॉल आर्मी वर्म के नाम से जाना जाता है, इसे भारत में करीब दो साल पहले कर्नाटक में मक्के की फसल में देखा गया था।ं हिमाचल  में  इसका पाया जाना एक बहुत ही गंभीर चिंता का विषय है।

रिपोर्टः निजी संवाददाता, रक्कड़

दाड़लाघाट की मक्की पर टिड्डी का हमला

दाड़लाघाट  – दाड़लाघाट सब उपमंडल के तहत गांव मांगू सोरिया व त्यांबला में टिड्डियों ने किसानों की मक्की की फसल पर हमला बोल दिया है। मक्की की फसल पर टिड्डियों के हमले से ग्रामीण सकते में आ गए हैं। टिड्डियों के दल किसानों के खेतों में खड़ी मक्की की फसल को नुकसान पहुंचा रहीं है। ग्रामीणों में महेंद्र और घन श्याम ने बताया कि रविवार को टिड्डियां बड़ी संख्या में उनके खेत में दिखी जिसकी सूचना उन्होंने प्रशासन को दी है और इससे पहले कि वो फसल का अधिक नुकसान न कर दें। उन टिड्डियों पर नियंत्रण पाने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि लगभग दस दिनों पहले ये टिड्डियां दिखनी शुरू हुई थी। दिनों दिन इनकी संख्या में भारी बढ़ोतरी हो रही है। टिड्डियों का दल मक्की के पत्तों को अपना शिकार बना रहा है, जिसकी वजह से फसल तबाह हो रही है। टिड्डियों ने त्यांबला गांव में तो किसानों के दो तीन बीघा मक्की के खेत तबाह कर दिए है। भारी संख्या में टिड्डियों के हमले ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। उधर मौके पर पहुंचे बंदोबस्त पटवारी सुरेश का कहना था कि उन्हें ग्रामीण महेंद्र कुमार द्वारा सूचना दी गई कि उनके गांव में टिड्डी दल ने मक्की की फसल को उजाड़ना शरू कर दिया है। मौके पर जाकर उन्होंने टिड्डी दल जैसे प्रतीत होने वाले कीट मक्की के खेतों में देखे हैं। ये कीट एक बीघा खेत के कुछ हिस्सों में मक्की के पौधों पर मौजूद थे और मक्की की पत्तियों को खा रहे है। नुकसान का आंकलन कर लिया गया है। एसडीएम अर्की विकास शुक्ला का कहना था कि ये कीट टिड्डियां ही हैं पक्का नहीं कहा जा सकता है। कीटनाशक का छिड़काव कर कीटों पर नियंत्रण पा लिया जाएगा।

राजगढ़ में इटली का सेब तैयार, पिता-पुत्र का कमाल

नगर पंचायत राजगढ़ के वार्ड नंबर-6 में इटली का सेब तैयार किया गया है और अच्छे परिणाम मिलने भी आरंभ हो गए हैं। यहां बागबान सूरत सिंह व उनके पुत्र विक्रम ठाकुर ने लगभग एक हजार सेब के पौधे लगाए हैं और चार वर्ष में बागीचा सेब की नई-नई किस्मों से लहरा रहा है। एक समय पीच वैली के नाम से विख्यात राजगढ़ का आड़ू लगभग अपना अस्तित्त्व खो चुका है। बीमारियों की जद में आए आड़ू का उपचार वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के वैज्ञानिक भी ढूंढ नहीं पाए हैं और राजगढ़ के आसपास तो आड़ू का अस्तित्त्व समाप्त ही हो चुका है। आड़ू के विकल्प पर बागबानों का रूझान सेब की ओर बढ़ना शुरू हुआ और सूरत सिंह व विक्रम ठाकुर ने भी अपने बागीचे में जेरोमाईन, गेल व रेडगम गाला, सुपर चीफ, स्कारलेट 2 अदि स्पर किस्में लगाई और इस वर्ष 100 से अधिक बाक्स इनके बागीचे से दिल्ली मंडी भेजे जा चुके हैं। सूरत सिंह ने बताया कि उनके स्पर किस्म के सेब का बाक्स दिल्ली मंडी में अढ़ाई से तीन हजार रुपए बिका है।

रिपोर्टः नगर संवाददाता,राजगढ़

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