किसकी थाली में छेद

By: Sep 17th, 2020 12:06 am

राज्यसभा सांसद एवं अपने दौर की प्रख्यात अभिनेत्री जया बच्चन नशे के सिंडिकेट और तस्करी के मुद्दे पर परेशान क्यों हैं? वह संपूर्ण बॉलीवुड को बदनाम करने की कोशिशों पर शर्मिंदा क्यों महसूस कर रही हैं? उन्होंने तो कुछ गलत नहीं किया। युवा स्टार सुशांत सिंह राजपूत की अप्राकृतिक मौत हुई, तो जांच का दायरा बढ़ता गया और एनसीबी को भी शामिल किया गया। कुछ दिनों की जांच में ही इतने खुलासे हुए हैं कि डेढ़ दर्जन ‘नशेबाज’ जेल की सलाखों के पीछे हैं। अभिनेत्रियों में रिया चक्रवर्ती भी जेल में है और सारा अली खान, कुलप्रीत सिंह सरीखे लिपे-पुते चेहरों पर भी नशे की लकीरें गहरी होती जा रही हैं। अंततः जो मासूम होगा, वह सजा-मुक्त, आरोप-मुक्त हो सकता है। घटनाक्रम को कुछ अतीत की तरफ  ले जाएं, तो संजय दत्त, फरदीन खान और विजय राज सरीखे फिल्मी चेहरों की ड्रग्स के कारण, खरीदते या इस्तेमाल करते, गिरफ्तारियां हुई थीं। ममता कुलकर्णी की संलिप्तता वाला नशे का सिंडिकेट आज भी रहस्य बना है, क्योंकि अभिनेत्री फरार है। शायद विदेश में कहीं है! युवा पीढ़ी के आकर्षक और आदर्शरूप कुछ चेहरे ऐसे हैं, जिन्होंने विभिन्न साक्षात्कारों के दौरान ड्रग्स लेना कबूल किया था।

 दोषी वे भी हैं। सुशांत केस के मद्देनजर जो नाम उभर कर सतह पर आए हैं और ड्रग्स सिंडिकेट के सदस्य के तौर पर उनकी पहचान स्थापित हो रही है, लग रहा है मानो मुंबई की गली-गली में नशे का माफिया मुस्तैद है और वह फिल्मों की मौजूदा और खूबसूरत पीढ़ी को नशे के गर्त में धकेल कर, उन्हें बर्बाद करने पर आमादा है! क्या यह छोटा संकट है? जया बच्चन इससे चिंतित क्यों नहीं हैं? यदि इन नापाक गठजोड़ों के ढक्कन खुलते हैं और बॉलीवुड के चेहरों पर कालिख की कुछ लकीरें खिंचती हैं, तो जया बच्चन जैसी संजीदा शख्सियत को ताली बजाकर स्वागत करना चाहिए। उन्हें ध्यान रहे कि ये नशेड़ी, दीवाने, अर्द्धविक्षिप्त चेहरे ही बॉलीवुड नहीं हैं। बॉलीवुड की परिभाषा और दुनिया बेहद व्यापक है। उसमें दादा फाल्के, व्ही शांताराम, बिमल रॉय, सत्यजीत रॉय, महबूब, ऋषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य और गुलजार सरीखे महान फिल्मकार हैं, तो पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, राजकपूर, देवानंद, राजकुमार से लेकर सुनील दत्त, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और नसीरुद्दीन शाह तक विश्वस्तरीय अदाकारों की भरी-पूरी जमात भी रही है। कुछ नाम छूट भी गए होंगे, लेकिन इस जमात ने ही बॉलीवुड को परिभाषित किया है। नए दौर के ‘सुपर स्टारों’ की चर्चा से हम बच रहे हैं, क्योंकि उन पर नशे की परछाइयां हैं। समय उनका अपराध या मासूमियत तय करेगा।

 जया बच्चन की पैरोकारी अपनी जगह है और लोकसभा सांसद रविकिशन की पीढ़ीगत पीड़ा अपनी जगह महत्त्वपूर्ण है। रविकिशन ने भी करीब 650 फिल्मों में काम किया है और वह भोजपुरी सिनेमा के ‘सुपर स्टार’ भी रहे। क्या बच्चन परिवार या किसी अन्य ने उनके लिए ‘थाली’ सजाई और परोसी थी? जया बच्चन ने किस थाली और छेद की बात की है? बॉलीवुड की प्रख्यात ‘ड्रीम गर्ल’ रहीं और लोकसभा सांसद हेमामालिनी का मानना है कि फिल्म इंडस्ट्री में सभी अपनी नियति के साथ आते हैं। फिर मेहनत और प्रतिभा के बल पर ‘सुपर स्टार’ भी बनते हैं। चूंकि मौजूदा दौर के कुछ नेता-सांसद बॉलीवुड की पृष्ठभूमि के हैं, तो क्या इसी आधार पर ‘मायानगरी’ के पापों और अपराधों को छिपा कर रखा जाए? बॉलीवुड देश को सबसे अधिक टैक्स देने वालों में एक है, तो क्या ‘मौत की पार्टियां’ सजाने की छूट दे दी जाए? जया बच्चन गलत पैरोकारी कर रही हैं। युवा पीढ़ी के अधिकांश अदाकारों ने टीवी चैनलों पर सरेआम खुलासा किया है कि बॉलीवुड पर ड्रग्स के अंधेरे साये मंडराते रहे हैं। यदि कोई चेहरा उनकी संगत को नकारता है, तो उसे स्वीकृति नहीं मिलती। इन काले अंधेरों को खंगालना बहुत जरूरी है। बॉलीवुड से पांच लाख से ज्यादा लोग जुड़े हैं, जिनमें औसतन मजदूर और कार्यकर्ता स्तर के कर्मचारी हैं। देश के करोड़ों नागरिक टिकट खरीद कर बॉलीवुड की ‘अमीरी’ तय करते हैं। मुंबई का एक पार्टीदार समूह ही बॉलीवुड नहीं है। ड्रग्स सिंडिकेट और उसका सपनों का संसार दोनों ही आपराधिक हैं, लिहाजा सजा जरूर मिलनी चाहिए। इससे किसी की थाली में छेद नहीं होगा।

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