अपना धान, बेगाना किसान

By: रिपोर्टः कार्यालय संवाददाता, पांवटा साहिब Oct 11th, 2020 12:08 am

अपनी माटी के सभी दर्शकों का स्वागत है। इस बार का यह कार्यक्रम हिमाचल के उन लाखों किसानों को समर्पित है, जो छह माह कीचड़ में काम करके धान तो उगाते हैं, लेकिन उन्हें मेहनत हासिल नहीं हो पाती। हम आपको बताएंगे कि कैसे हिमाचल की सरकारें आज तक अपने किसानों से धान नहीं खरीद पाई हैं। उसके बाद कई जगह धान में सिल्ला न आने पर चर्चा भी करेंगे और कार्यक्रम का अंत एक गुड न्यूज से करेंगे। तो आइए, सबसे पहले जानते हैं कि आखिर हिमाचली किसानों से धान क्यों नहीं खरीद रही प्रदेश सरकार…

पूरे देश में फसलों के मिनिमम सपोर्ट प्राइस पर चर्चा चल रही है, लेकिन हिमाचल में शायद ऐसी चर्चाओं के कोई मायने नहीं हैं। हिमाचल में सरकारें आज दिन तक अपने किसानों द्वारा पैदा किए जाने वाले धान को खरीदने की ही व्यवस्था नहीं कर पाई हैं। हिमाचल में कोई ऐसी मंडी नहीं है,जहां किसान अपना धान बेच सकें।

हिमाचल के किसानों को पंजाब या हरियाणा में जाकर अपना धान बेचना पड़ता है। कुछ किसानों से बाहरी कारोबारी घर आकर अनाज खरीद कर ले जाते हैं। किसानों के पास धान को स्टोर करने का इंतजाम नहीं होता, ऐसे में उन्हें अपनी फसल कौडि़यों के भाव बेचनी पड़ती है। कांगड़ा के किसान विजय, कुलदीप कहते हैं कि धान की फसल बड़े खर्च के बाद तैयार होती है,जो कि सरकार की अनदेखी के चलते बर्बाद हो रही है। अपनी माटी टीम ने इस मसले पर सिरमौर जिला में ब्लू प्रिंट विजन कमेटी के संयोजक अनिंद्र सिंह नौंटी से बात की। उन्होंने कहा कि प्रदेश की मौजूदा जयराम सरकार और केंद्र की मोदी सरकार किसानों को कुचलने पर तुली हुई हैं। इस सीजन में और भी हाल खराब हैं।

सुखराम चौधरी बोले, बेच सकते हैं धान

ऊर्जा मंत्री सुखराम चौधरी ने कहा है कि पांवटा साहिब सहित जिला सिरमौर के किसान हरियाणा की मंडियों में धान की फसल ‘मेरी फसल मेरा ब्यौरा’ में रजिस्टर कर बेच सकते हैं। उन्होंने कहा कि फोन के माध्यम से हरियाणा सरकार के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर व कैबिनेट मंत्री कंवरपाल सिंह गुर्जर से जिला सिरमौर के किसानों की फसल हरियाणा मंडियों में बेचने हेतु पंजीकरण करने हेतु निवेदन किया था, जिसके उपरांत अब जिला सिरमौर के किसान इस पोर्टल पर अपनी फसल का पंजीकरण कर बेच सकते हैं।

धान में 100 दिन बाद भी नहीं निकला सिल्ला

हिमाचल में इस बार कई जगह धान के पौधे में सिल्ला नहीं आने की शिकायतें आ रही हैं। किसानों का मानना है कि सब स्टैंडर्ड बीजों के चलते ऐसा हुआ है। हालांकि महकमा ऐसे आरोपों को सिरे से खारिज कर रहा है। पेश है सरकाघाट से यह रिपोर्ट …

पहाड़ी चावल को दुनिया भर में पसंद किया जाता है, लेकिन किसानों को कृषि विभाग और सरकार से सहयोग न मिल पाने के चलते इस प्रमुख फसल पर संकट मंडराने लगा है। कांगड़ा, चंबा, मंडी, कुल्लू आदि जिलों से कई किसान इस बार धान में सिल्ला न आने की बात कह रहे हैं। किसानों का आरोप है कि कृषि विभाग उन्हें दोयम दर्जे का बीज मुहैया करवा रहा है। इससे यह सब हुआ है। चंद रोज पहले मंडी जिला के सरकाघाट, धर्मपुर व जोगिंद्र नगर के सैकडों॒ किसानों  ने धान में वलियां यानी सिल्ला न आने की शिकायत की थी। इस पर विभागीय अफसरों ने कई क्षेत्रों का दौरा किया था।

उपनिदेशक कृषि मंडी डा. कुलदीप वर्मा ने उस समय तर्क दिया था कि पानी वाली जमीन में टाइम पर वलियां आई हैं तथा जहां सिंचाई वाली जमीन है, वहां देर से सिल्ला आया है। इस पर अब किसान एक बार फिर विभाग पर मुखर हो गए हैं। हिमाचल किसान सभा की सरकाघाट इकाई के अध्यक्ष तेजनाथ शर्मा ने आरोप लगाया है कि विभागीय अधिकारी उन्हीं खेतों में गए, जहां फसल ठीक है। विभाग ने खराब फसल वाले इलाकों को बिलकुल इगनोर किया है।  बहरहाल अगर प्रदेश सरकार, विभाग और कृषि विश्विद्यालय को धान के बीज पर अपना स्टैंड क्लीयर करना चाहिए। बड़ी बात यह भी है कि हिमाचल में धान के  पुराने बीज अब लगभग खत्म हो गए हैं। ऐसे में हाइब्रिड बीज भी घटिया होगा, तो धान को बर्बादी से कोई नहीं बचा सकेगा।

पड़ोसी प्रदेश में मिल रही दुत्कार

बीबीएन।  एक तरफ केंद्र सरकार जहां किसानों को अपनी फसल कहीं भी किसी भी मंडी में बेचने के फायदे गिना रही है, वहीं दूसरी और हिमाचल के किसानों को हरियाणा में अपनी फसल बेचने पर समर्थन मूल्य से कम कीमत अदा की जा रही है। हालात यह है कि किसानों को हरियाणा की मंडी में फ सल का सर्मथन मूल्य से डेढ़ से दो सौ रुपए कम दाम दिया जा रहा है। दरअसल हिमाचल राज्य में कोई भी धान की मंडी नहीं है और हिमाचल के किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए हरियाणा, पंजाब की मंडियों में जाना पड़ता है, लेकिन वहां के आढ़तियों का कहना है कि हम केवल हरियाणा के किसानों की ही जीरी खरीदेंगे अन्य राज्यों की फसल को कम दाम मिलेंगे। बीबीएन के किसान राजिंद्र, जितेंद्र, रमीत फौजी, राजकुमार, संजीव कुमार आदि का कहना है कि हमारी जमीनें हरियाणा की सीमा के साथ लगती हैं और हिमाचल में कोई भी धान की मंडी न होने की वजह से उन्हें अपनी फसल हरियाणा की मंडी में बेचनी पड़ रही है। लेकिन दुभार्ग्य की बात है कि हरियाणा की मंडियों में हिमाचली किसानों को डेढ़ सौ से दो सौ रुपए कम कीमत पर धान की फसल को खरीदा जा रहा है, जोकि सरासर अन्याय है।

इस बार आधे से भी कम है मक्की का रेट

किसान यूनियन ने सरकार को चेताया

हिमाचल किसान यूनियन ने किसानों से अपील करते हुए कहा है कि मक्की का उचित दाम न मिलने तक वह अपनी फ सल को कम मूल्य में न बेचें। इसके साथ यूनियन ने किसानों के हितों की आवाज उठाते हुए प्रदेश सरकार से मक्की की फसल को सरकारी स्तर पर तुरंत खरीद की जाने की जोरदार वकालत की है तथा इस सबंध में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर व कृषि मंत्री वीरेंद्र कंवर से जरूरी उचित कदम उठाने की मांग की है। यूनियन के प्रदेशाध्यक्ष सुंका राम, महासचिव सीताराम वर्मा व जिला अध्यक्ष भूप सिंह व बल्ह खंड के प्रधान पदम सिंह गुलेरिया सहित यूनियन के अन्य पदाधिकारियों का कहना है कि बाजार में इस समय मक्की का दाम गत वर्ष की तुलना में आधे से भी कम मूल्य पर है, जो बड़ी चिंता का विषय है। इसके चलते किसान वर्ग काफ ी हताश हैं।

महंगे उर्वरक पदार्थ और बीज खरीदने के साथ कड़ी मेहनत के बावजूद फसल का समर्थन मूल्य न मिलने से किसानों के लिए यह स्थिति पीड़ादायक बन गई है। यूनियन का कहना है कि सरकार ने मक्की फसल का समर्थन मूल्य 1725 रुपए प्रति क्विंटल तो तय किया है, लेकिन इस मूल्य पर कौन खरीद करेगा यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। यूनियन ने सरकार से इस विषय में अपनी स्थिति सपष्ट करने की मांग की है, ताकि किसानों को भारी नुकसान से बचाया जा सके।

नए कृषि कानून से बिठाया भट्ठा

मंडी — यहां के प्रगतिशील किसान अमर चंद वर्मा ने प्रशासन से मक्की फ सल की सरकारी खरीद जल्द से जल्द करने की मांग की है। इस बारे में सदर तहसील के रखून गांव निवासी अमर चंद वर्मा ने उपमंडलाधिकारी को ज्ञापन सौंप कर उनकी मक्की की फसल की सरकारी खरीद करने की मांग की है। उनके अनुसार उन्होंने इस साल अपनी खेती की जमीन पर करीब 40 क्विंटल फसल उपजाई है।

वह अपनी इस फ सल को सरकार को या किसी अन्य एजेंसी को सरकार द्वारा तय किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचना चाहता है, लेकिन नए कृषि कानून के अस्तित्व में आने के बाद वह असमंजस में हैं कि अपनी फ सल को वह कहां पर बेचे, जिससे उन्हें एमएसपी मिल सके।  उन्होंने उपमंडलाधिकारी से आग्रह किया है कि वह उनकी फ सल की खरीद करवाएं।

किसान मोर्चा ने रखा सबसिडी का लेखा

केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने सन 2022 तक किसानों-बागबानों की आय दोगुना किए जाने का लक्ष्य रखा हुआ है। प्रदेश भाजपा किसान मोर्चा प्रदेश अध्य्क्ष राकेश शर्मा बबली का कहना कि कृषि बिलों के लागू होने का लाभ किसानों और बागबानों को जल्दी मिलने वाला है।

तोरिया के बीज का दाम 80 रुपए प्रति किलो है और इस पर 40 रुपए की सबसिडी प्रदान की जाती है। बरसीम का बीज 124 रुपए, जिस पर 62 पर सबसिडी, ओट्स 57.50 रुपए, 27.50 सबसिडी, राई घास 300 रुपए, 150 रुपए सबसिडी, गोभी हाइब्रिड बीज 19,500 रुपए प्रति किलो, 9750 रुपए सबसिडी, लहसुन का बीज 200 रुपए प्रति किलो, 100 रुपए सबसिडी, शलगम का बीज 360 रुपए, 180 रुपए सबसिडी, गोभी 2730 रुपए, 1365 रुपए सबसिडी, मेथी 153 रुपए प्रति किलो, 76.50 रुपए सबसिडी दी जा रही है। इसी प्रकार से गाजर का बीज 470 रुपए प्रति किलो, जिस पर 235 रुपए सबसिडी, चुकंदर का बीज 580 रुपए, जिस पर 290 रुपए सबसिडी, पालक का बीज 100 रुपए, 50 रुपए सबसिडी, चीनी सरसों 210 रुपए, 105 रुपए सबसिडी, सरसों 129 रुपए, जिस पर 64.50 रुपए सबसिडी प्रदान की जाती है।

रिपोर्टः निजी संवाददाता, नूरपुर

मिलकर लगाएं बागीचा, सोलर फेंसिंग लगेगी फ्री

हिमाचल के कई जिलों में शिवा प्रोजेक्ट तेज रफ्तार पकड़ने  जा रहा है। इस  प्रोजेक्ट के तहत कई किसान मिलकर पांच हेक्टेयर में बागीचा लगा सकते हैं। पेश है नाहन से नगर संवाददाता की रिपोर्ट

हिमाचल में कम जमीन वाले किसान भी बागीचा लगा सकते हैं, बशर्ते उनके जिला में शिवा प्रोजेक्ट चल रहा हो। अपनी माटी टीम ने शिवा प्रोजेक्ट को लेकर  सिरमौर जिला में पड़ताल की। सिरमौर में खासकर नाहन और पांवटा में सरकार इस प्रोजेक्ट पर ज्यादा फोकस कर रही है। इसके तहत एक क्लस्टर बनाकर कई किसान पांच हेक्टेयर यानी 60 बीघा में अपना बागीचा तैयार कर सकते हैं।

इससे में सोलर फेंसिंग बिलकुल फ्री होगी, वहीं सिंचाई और जमीन विकास के कार्य 80 अनुपात 20 की सबसिडी पर होंगे। यह प्रोजेक्ट एशियन डिवेपमेंट बैंक द्वारा फंडेड है। इसमें जुताई और गड्ढे खोदने जैसे कार्य हो पाएंगे। कुछ दिन पहले नाहन में विधायक राजीव बिंदल ने शिवा प्रोजेक्ट पर संगोष्ठी में किसानों को सारी जानकारी दी थी। इसमें जिला से 200 किसानों ने अपना पंजीकरण करवा लिया है। बिंदल ने अपनी माटी को बताया कि ज्यादा से ज्यादा किसानों को इस परियोजना का फायदा उठाना चाहिए।

सीधे खेत से

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