देशभर में छाया किन्नौरी सेब

By: Oct 25th, 2020 12:06 am

शिमला में जहां सेब सीजन सिमटने को है, वहीं किन्नौरी सेब देश भर की मंडियों में छाया हुआ है। पेश है रिकांगपिओ से यह रिपोर्ट …

इन दिनों किन्नौर जिला में सेब का सीजन चरम पर है। जिला की स्पर और रॉयल किस्मों ने फल मंडियों में धमाल मचा रखा है। अपनी माटी टीम ने टापरी फल मार्केट में कुछ बागबानों  से बात की ,तो उन्होंने बताया कि 22 किलो की बड़ी पेटी 2400 रुपए तक में बिक रही है, वहीं गिफ्ट पेटी के 800 से 1100 रुपए तक मिल रहे हैं। गौर रहे किन्नौर का सेब अपनी क्वालिटी के लिए दुनिया में मशहूर है, यही कारण है कि सभी को जिला की खेप का इंतजार रहता है। मौजूदा समय में जिला से अब तक 20 लाख सेब पेटियां विभिन्न मंडियों में जा चुकी हैं, जबकि अभी करीब 13 लाख सेब पेटियों का अनुमान है। दूसरी ओर   डीसी किन्नौर गोपाल चंद ने बताया कि टापरी का बिक्री केंद्र बड़ा मददगार साबित हो रहा है।

आचार्य देवव्रत बोले, प्राकृतिक खेती से बढ़ रही हिमाचल में प्रोडक्शन

सोलन। आचार्य देवव्रत इन दिनों गुजरात के राज्यपाल हैं। वह प्राकृतिक खेती के बड़े पैरोकार हैं। हाल ही में सोलन के बड़ोग में हिमाचल के किसानों के लिए राज्य स्तरीय वर्कशॉप लगी, जिसमें वह चीफ गेस्ट थे। उन्होंने एक बार फिर कहा कि प्रदेश के हजारों किसान प्राकृ तिक खेती से अपनी प्रोडक्शन बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बाकी किसानों से भी जीरो बजट खेती से जुड़ने का आग्रह किया।  इस मौके पर कृषि मंत्री वीरेंद्र कंवर ने प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए देवव्रत का आभार व्यक्त किया। वीरेंद्र कंवर ने कहा कि आचार्य की पहल पर ही हिमाचल में जीरो बजट खेती को बड़ी कामयाबी मिल रही है।.

कब बहुरेंगे नगरोटा के फल विधायन केंद्र के दिन

वर्ष 1974 में नगरोटा बगवां में कई जिलों के किसानों-बागबानों की सुविधा के लिए स्थापित प्रदेश सरकार का फल विधायन केंद्र अपनी दुर्दशा पर आज भी आंसू बहा रहा है। किसानों की बिक्री न हो सकी हो या किन्ही कारणों से बेकार हो चुकी पैदावार को उचित मूल्य पर खरीदकर उनके हर साल होने वाले करीब 25 फीसदी घाटे को  कम करने के उद्देश्य से इस केंद्र की आधारशिला तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. यशवंत सिंह परमार ने रखी थी। सरकार की उदासीनता का ही नतीजा है कि 15 मीट्रिक टन लक्ष्य को लेकर स्थापित केंद्र को  फलों से तैयार उत्पाद को बेचना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। आलम यह है कि उक्त केंद्र मौजूदा समय में सालाना 10 से 11 लाख ही आमदन जुटा पा रहा है, जबकि केंद्र का सालाना बजट या यूं कहें कि कुल खर्चा डेढ़ से दो करोड़ के बीच है।

कहने को तो केंद्र का दायरा कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर तथा चंबा तक फैला है, जिसके अंतर्गत पांच स्थानों पर विधायन एवं प्रशिक्षण इकाइयां तथा हटवास, नगरोटा बगवां, चंबा, धर्मशाला, ऊना, पालमपुर, कांगड़ा, सुजानपुर तथा मुबारिकपुर में आठ बिक्री केंद्र भी काम कर रहे हैं,० लेकिन विभाग आज भी अपने उत्पादों की सौ फीसदी  बिक्री सुनिश्चित कर पाने में नाकाम रहा है। नतीजतन किसानों और बागबानों को विभाग के माध्यम से उपयुक्त बाजार नहीं   मिल रहा है । सूत्र बताते हैं कि बाजार न मिल पाने की वजह से विधायन केंद्र में आज भी करीब 10 मीट्रिक टन कच्चा माल टैंकरों में भरा पड़ा है, जो मौजूदा हालात के मुताबिक अगले दो सालों के लिए पर्याप्त है। खैर, उम्मीद है कि अपनी माटी के जरिए प्रदेश सरकार की आंखें खुलेंगी।

कैसे सुधरेगी हालत : केंद्र के  वर्तमान फल प्रौद्योगिकी विद्  ने अब ऊक्त विधायन केंद्र के जीर्णोद्धार के लिए एक प्लान तैयार कर सरकार को भेजा है, जिसमें समूचे ढांचे की जर्जर हालत को बयां करते हुए सुधार की मांग की गई है। जहां समूचे भवन में छत टपकती है, प्लास्टर आए दिन कर्मचारियों को जख्म देता है।  इसके साथ  नूरपुर, देहरा, नादौन, टौणीदेवी तथा किन्नू स्थित पीटीसी इकाइयों तथा फैक्टरी  बिक्री आउटलेट का पुनर्निर्माण, भंडारण की व्यबस्था की भी बात कही गई है।

मार्केटिंग प्लान : विशेषज्ञों की राय में उत्पादों की बिक्री का जिम्मा आउटसोर्स करना आवश्यक है तथा इसके लिए अधिकतम होल सेलरों और डिस्ट्रीब्यूटरों की शिनाख्त आवश्यक है ।

सरकार से उम्मीद : स्थानीय विधायक अरुण मैहरा ने एसडीएम शशिपाल नेगी व अन्य अधिकारियों से मिलकर केंद्र का दौरा किया तथा फल विशेषज्ञों से चर्चा की, जिसमें विभाग के फल प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ डा. नरोत्तम कौशल भी शामिल रहे । इस दौरान केंद्र की खामियों और सुधारों पर विस्तृत रिपोर्ट भी तैयार कर प्रदेश सरकार को भेजी गई । अरुण मेहरा ने भरोसा दिलाया है कि केंद्र की हालत को सुधारा जाएगा। रिपोर्टः कार्यालय संवाददाता, नगरोटा बगवां

हिमाचल में तैयार हींग से आत्मनिर्भर बनेगा भारत

बहुत कम लोगों को पता होगा कि दुनिया में हींग की सबसे ज्यादा खपत भारत में  होती है, पर इसकी पैदावार यहां नहीं होती, लेकिन अब हिमाचल में हींग उगाने की अनूठी कवायद शुरू हुई, जिससे पूरा देश हिमाचल पर फख्र करेगा। पेश है यह रिपोर्ट

हिमाचल में पहली बार हींग की खेती शुरू हुई है। यह अनूठी पहल आईएचबीटी पालमपुर और कृषि विभाग के प्रयासों से लाहुल स्पीति जिला में हो रही है। आईएचबीटी के निदेशक डा. संजय कुमार ने  शीत मरुस्थल लाहुल में इस मुहिम को शुरू करवा दिया है। सब ठीक रहा, तो आने वाले समय में पूरे देश को हींग ही सप्लाई हिमाचल के हो सकती है।

संस्थान के वैज्ञानिक डा. अशोक कुमार तथा डा. रमेश ने लाहुल स्पीति के मडग्रां, बीलिंग, केलांग तथा कवारिंग क्षेत्रों में किसानों को  प्रशिक्षण भी दिया है। डा. अशोक कुमार ने बताया कि हींग एक बहुवर्षीय पौधा है तथा पांच वर्ष के उपरांत इसकी जड़ों से ओलिओ गम रेजिन निकलता है, जिसे शुद्ध हींग कहते है । इसकी खेती के लिए यहां की जलवायु उपयुक्त है तथा इसकी खेती आसानी से की जा सकती है। गौर रहे कि पूरे विश्व में हींग की सबसे ज्यादा खपत भारत में होती है, लेकिन भारत में इसका उत्पादन नहीं होता।  वर्तमान में 600 करोड़ रुपए का 1200 मीट्रिक टन कच्चा हींग अफ्गानिस्तान,  ईरान, उज्बेकिस्तान से आयात किया जाता है। ऐसे में हिमाचल आने वाले बरसों में हींग की खेती का नया इतिहास रचने को तैयार है।

रिपोर्ट :  कार्यालय संवाददाता, पालमपुर

पहाड़ी फ्रांसबीन को लगी बीमारी, किसानों में मायूसी

प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में इन दिनों फ्रांसबीन की फसल यौवन पर होती है, लेकिन इस बार फ्र ांसबीन को बीमारी ने जकड़ लिया है। किसानों की शिकायत है कि पत्ते से लेकर फली तक बीमारी पहुंच गई है। देखते हैं यह रिपोर्ट

हिमाचल में इन दिनों फ्रांसबीन की फसल खूब लहलहाती है, लेकिन इस बार  फसल में बीमारी की शिकायतें आ रही हैं। इससे किसानों का दिल बैठने लगा है। पहाड़ी इलाकों के कई किसानों की शिकायत है कि फ्रांसबीन की फली धीरे-धीरे भूरी हो रही है, वहीं पत्ते भी पीले पड़ रहे हैं। इसकी रोकथाम न हुई, तो फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी। किसानों की यह बड़ी समस्या अपनी माटी के पास पहुंची,तो हमने नौणी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों से इसके कारण खोजने का प्रयास किया।

 पता चला कि यह बीमारी असल में जड़ों से फै ल रही है। नौणी विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक मोनिका तोमर ने बताया कि यह एक तरह का सड़न रोग है, जिससे फसल पूरी तरह से खराब हो सकती है। मोनिका तोमर ने किसानों को सुझाव दिया है कि वे खेतों में मैलाथयोन का छिड़काव करें। इससे बीमारी खत्म हो जाएगी।

रिपोर्ट : निजी संवाददाता, नौणी

शाबाश रविंद्र, 13 वर्ष की नौकरी छोड़ पोलीहाउस से कमा रहे लाखों

कहते हैं हिम्मत-ए-मर्दा, मदद-ए-खुदा। ऐसा ही एक उदाहरण है, ऊना जि़ला पाके कुठार कलां के रहने वाले रविंद्र शर्मा का। कोरोना संकटकाल के चलते 13 वर्ष तक नौकरी करने के उपरांत अपने घर लौटे रविंद्र शर्मा ने हताश होने की बजाए पोलीहाउस लगाने का निर्णय लिया। वह पोलीहाउस में जरबेरा फूलों की खेती करना चाहते थे, लेकिन कोरोना संकट के मद्देनजर बागबानी अधिकारियों ने उन्हें खीरे की खेती करने की सलाह दी।

 उनकी सलाह मानते हुए उन्होंने 2,000 वर्ग मीटर पोलीहाउस में 5,000 खीरे के पौधे लगाए और अब उनकी हिम्मत, जुनून और मेहनत की फसल लहलहा रही है। पोलीहाउस लगाने के लिए बागबानी विभाग ने उन्हें कुल लागत की 85 प्रतिशत सबसिडी मुहैया करवाई। पोलीहाउस के निर्माण पर कुल 22 लाख रुपए खर्च हुए, जिस पर विभाग ने उन्हें 17 लाख रुपए का अनुदान दिया। विभाग ने पोलीहाउस लगाने से पूर्व रविंद्र शर्मा को पुणे में संरक्षित खेती का प्रशिक्षण प्रदान किया। रविंद्र शर्मा पोलीहाउस में टपक सिंचाई का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे न सिर्फ पानी की बचत होती है, बल्कि पौधों को आवश्यक्तानुसार, सही समय पर पानी उपलब्ध होता है।

रिपोर्टः नगर संवाददाता,ऊना

तो क्या चीन से आ रहा है…

चीन से चोरी-छिपे आ रहे लहसुन को रोकने के लिए जिला सिरमौर व सोलन का एक प्रतिनिधिमंडल मंगलवार को केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर से चंडीगढ़ में मिला। प्रतिबंध के बावजूद चीन का लहसुन भारत में चोरी-छिपे आने से लहसुन के दामों में भारी गिरावट आ गई है, जिससे किसानों व लहसुन के खरीददार आढ़तियों को करोड़ों रुपए के नुकसान का अंदेशा बना हुआ है। जिला सिरमौर के रेणुका क्षेत्र में लहसुन मुख्य रूप से उगाया जाता है और लहसुन गिरिपार क्षेत्र के तीन विधानसभा क्षेत्रों पच्छाद, रेणुका व शिलाई की लगभग 130 पंचायत के किसानों की प्रमुख नकदी फसल है और यहां की आर्थिकी काफी हद तक लहसुन की फसल पर टिकी है और अब तो सरकार की एक जिला एक फसल के तहत जिला सिरमौर को लहसुन की फसल के लिए चुना गया है।

इस बार किसानों को लहसुन के अच्छे दाम मिल रहे थे। पहली बार किसानों को लहसुन के दाम 170-190 रुपए प्रतिकिलो तक मिले, लेकिन इसी दौरान चीन का प्रतिबंधित लहसुन ईरान व अफगानिस्तान के रास्ते चोरी-छिपे दिल्ली, तमिलनाडु व पंजाब के मलेरकोटला मंडी में पहुंच रहा है। जिस कारण लहसुन के दाम 50-60 रुपए किलो तक गिरकर 120-130 रुपए प्रतिकिलो रह गए हैं। विकास खंड संगड़ाह की ग्राम पंचायत घंडूरी, नौहराधार, चाड़ना व राजगढ़ विकास खंड की ठौड़ निवाड़, जदोल टपरोली, दीदग व दाहन पंचायतों ने इस आशय का प्रस्ताव पारित करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चीनी लहसुन के देश में चोरी-छिपे आने को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की गुहार लगाई है।  प्रतिनिधिमंडल में पद्म पुंडीर, हेम चंद, विजय सूद, भगत सिंह, सतीश ठाकुर, सुनील ठाकुर, पृथ्वीराज, यशपाल चौहान व संदीप सहित काफी लोग शामिल थे।

रिपोर्टः  निजी संवाददाता, नौहराधार 

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