हिमाचली महिला किसान का माडल देखकर मोदी के बजीर दंग

By: पृष्ठ संयोजन जीवन ऋषि - 98163-24264 Oct 18th, 2020 12:10 am

हिमाचल में एक से बढ़कर एक किसान हैं, जो देश-दुनिया में अपनी मेहनत के दम पर छाए हुए हैं। इन्हीं में से एक महिला किसान हैं सुनीता देवी, जिनके मॉडल पर मोदी सरकार फिदा है। देखिए यह रिपोर्ट …

 मंडी जिला की सुनीता ने चमकाया हिमाचल

मंडी जिला के सुंदरनगर कृषि विज्ञान केंद्र में चंद रोज पहले महिला किसान दिवस मनाया गया। इस वर्चुअल सम्मेलन में केंद्रीय  कृषि राज्य मंत्री पुरूषोतम नराला चीफ गेस्ट थे। इस कार्यक्त्रम में देशभर से चुनिंदा सफल महिला किसानों ने केंद्रीय मंत्री से अपने मॉडल व अनुभव साझा किए।

इन्हीं किसानों में मंडी जिला से सुनीता देवी ने भी अपना माडल प्रस्तुत किया,जिसकी मंत्री ने खूब सराहना की।  मंत्री ने देश भर के किसानों से इस माडल को अपनाने की अपील की। सुनीता ने बताया कि वह सुंदरनगर के भरजवाणु गांव की निवासी हैं, जिनके पास बहुत ही कम जमीन है, जिसमें वह सब्जियों की पौध उगाती हैं। उनके मॉडल की खास बात यह है कि सीमित जमीन होने के चलते वह पौध को घर की छत पर भी उगाती हैं, जिससे सालाना 60000 रुपए की सालाना आमदनी  होती है। सुनीता लीज पर ली दो बीघा जमीन पर  अलग से खेती  करती हैं । इसमें अलग से आमदनी होती है।  बहरहला सुनीता का माडल उन हजारों किसानों के लिए है,जिनके पास जमीन कम है। आज सारे हिमाचल को सुनीता देवी जैसे किसानों पर फख्र है

सुंदरनगर से जसवीर सिंह की रिपोर्ट

कैप्टन गोविंद ठाकुर के इशारों पर बोलती हैं खेती की मशीनें

कांगड़ा जिला के राजोल गांव में खेतों में कर रहे नए-नए प्रयोग, दुर्गा शक्ति ट्रेडर्ज के नाम से चला रहे शोरूम। अब तक जुड़ चुके हैं हजारों किसान, देसी बासमती और नए नए फूल उगाने का भी है शौक…

अपनी माटी में हम अकसर ऐसे किसानों से मिलाते हैं,जिन्होंने अपनी मेहनत के दम पर खेती को नई दिशा दी है। हिमाचल में कुछ ऐसा ही नाम है कैप्टन गोविंद सिंह ठाकुर का। कैप्टन गोविंद सिंह कांगड़ा जिला में शाहपुर विधानसभा हलके के तहत राजोल गांव के रहने वाले हैं। खेती की हर मशीन चलाने में एक्सपर्ट गोविंद सिंह किसानों को मशीन चलाने का प्रशिक्षण देते हैं, साथ ही वह अपनी जमीन में नए नए प्रयोग भी करते हैं। वह अब तक हजारों किसानों को प्रशिक्षण दे चुके हैें। गोविंद सिंह का जन्म वर्ष 1949 में राजोल गांव में हुआ ।

उन्हें बचपन से ही खेती में गहन रुचि रही। साल 1968 में उन्होंने सेना में ईएमई ज्वाइन की। अपने सेवाकाल के दौरान ही इन्होंने ऑटो मोबाइल में डिप्लोमा कर लिया। साल 1996 में रिटायरमेंट के बाद उन्होंने खेती का दायरा बढ़ाया, तो पाया कि इलाके में मशीनें नहीं थी। वह किसी दूसरे शहर से पावर वीडर लाए, तो छोटे छोटे पुर्जों के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। बस यहीं से कैप्टन गोविंद सिंह ने ठान लिया कि वह खुद खेती से जुड़ी मशीनों का आउटलेट खोलेंगे और किसानों को ट्रेनिंग देकर उनकी मदद करेंगे। काम शुरू किया,तो लगातार किसान जुड़ने लगे,लेकिन यह तो शुरूआत भर थी। इसके बाद उन्होंने कई युवाओं को मेकेनिक की ट्रेनिंग दी,जो दूर-दूर तक खेतों में जाकर किसानों को मशीनें चलाना सिखा रहे हैं। राजोल में इनका दुर्गा शक्ति ट्रेडर्ज के नाम से शोरूम चल रहा है। खास बात यह कि कोई भी किसान एक वीडियो काल पर उनसे टिप्स ले सकता है। कैप्टन कहते हैं कि वह नहीं चाहते कि जो दिक्कत उन्हें हुई है, वह प्रदेश के किसान-बागबान  भाइयों को हो। आज कैप्टन गोविंद का दुर्गा शक्ति ट्रेडर्ज के नाम से राजोल गांव में आउटलेट है,जहां उनके मेकेनिक 24 घंटे किसानों की सेवा में तत्पर रहते हैं। उनका किसानों को यही संदेश कि वे जांच परखकर ही मशीनें खरीदें। कैप्टन गोविंद को किर्लोस्कर कंपनी की मशीनें खूब पसंद हैं। वह कहते हैं कि अपने देश की यह नामी कंपनी जांची परखी है। वह कहते हैं कि मशीन वही लेनी चाहिए,जिसकी रिपेयर तुरंत हो और स्पेयर पार्ट्स आसानी से मिल जाएं।  वह मेक इन इंडिया के बड़े पैरोकार हैं।  किसान भाई उनसे 78760 62647 व 88944 61110 पर संपर्क कर सकते हैं।                                                                  रिसर्च डेस्क

कस्तूरी बासमती और नए नए फूल

कैप्टन गोविंद के अपने दो पोलीहाउस हैं, जहां वह खेती और बागबानी के नए प्रयोग करते हैं, वहीं वह अपने खेतों में कस्तूरी बासमती उगाते हैं। उन्होंने फूलों की कई किस्में अपने पोलीहाउस में लगा रखी हैं।

लाहुल के किसान ने कैसे उगाई 17 किलो की गोभी

केलांग। लाहुल के रलिंग गांव के किसान सुनील कुमार पेशे से किसान और शिक्षा ग्रेजुएट। जैविक खेती के जरिए कुछ नया प्रयोगों की बदौलत सुनील कुमार ने 17.2 किलो का एक गोभी तैयार किया। उनके प्रयोगों से 17 किलो का एक गोभी के खबर ने देश के कृषि विश्वविद्यालय और कृषि अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों को भी हैरान परेशान कर दिया है। किसान कहते हैं की उनके  परिवार ने शुरुआत से ही जैविक खेती पर ध्यान दिया। अमूमन गोभी का फूल दो किलो का होता है, लेकिन उन्होंने इस साल 17.2 किलो का उगाया है।

दूध की पेमेंट नहीं मिलेगी तो गाय को खिलाएंगे क्या

हिमाचल में पहले ही किसानों और पशुपालकों की हालत खराब है। खासकर पशुपालकों से एक मुसीबत जाती है, तो दो नई आन पड़ती हैं। पेश है सोलन से स्टाफ रिपोर्टर की रिपोर्ट

सोलन में दुधारू पशु सुधार सभा चल रही है। इस सभा के पास दूर दूर से पशुपालक दूध लाते हैं, जिससे शहर को स्वादिष्ट दूध मिलता है, लेकिन इन दिनों पशुपालकों पर बड़ा संकट आ गया है। दर्जनों पशुपालकों को तीन माह से दूध की पेमेंट नहीं हुई है।

 अपनी माटी टीम ने इस मसले की गंभीरता को देखते हुए सरकार के सामने लाने का प्रयास किया है।  नम आंखों से एक महिला पशुपालक ने कहा कि वह रोजाना 12 किलोमीटर पैदल चलकर सभा के दुग्ध एकत्र केंद्र में दूध बेचती है। बावजूद उसको पेमेंट नहीं दी जा रही है।  पशुपालकों ने मांग उठाई है कि शीघ्र उन्हें पेमेंट की जाए। दूसरी ओर  सभा के अध्यक्ष रविंद्र परिहार ने दावा किया कि जल्द ही किसानों की पेमेंट उनके खाते में डाल दी जाएगी।

इस बार सेब का टारगेट हासिल नहीं कर पाएगा हिमाचल

मतियाना (शिमला)। हिमाचल ने इस सेब सीजन में सवा दो करोड़ सेबी का टारगेट लिया था। माना जा रहा था कि इसे आसानी से हासिल किया जा सकेगा,लेकिन अब ऐसा होते नहीं दिख रहा है। अभी तक महज एक करोड़ पैंसठ लाख पेटी के करीब मार्केट में आ पाई हैं। शिमला के ऊपरी इलाकों में कारोबार अब सिमटने लगा है, वहीं किन्नौर में सीजन चल रहा है। ऐसे में सेब सीजन का सवा दो करोड़ पेटी का अनुमान पूरा होते नहीं दिख रहा है। जहां तक अपर शिमला की बात है,तो यहां अब कई कारोबारी काम समेटने के लिए तैयार हैं। कुल मिलाकर इस बार सेब की पेटियों का लक्ष्य अधूरा रहने की आशंका है।

रिपोर्ट : निजी संवाददाता, मतियाना

धान बेचने पंजाब नहीं जाना चाहते मंड के किसान

हिमाचल के सबसे बड़े  जिला कांगड़ा में धान की फसल खूब होती है। जिला के पंजाब बार्डर से सटा है खूबसूरत मंड इलाका। खेती के जानकारों का कहना है कि मंड एरिया का धान उतना ही स्वादिष्ट होता है,जितना कभी पौंग में समाई हल्दून घाटी का होता था।

 मंड एरिया में भी धान की फसल खूब होती है,लेकिन इन किसानों की भी मुश्किलें वहीं हैं, जो हिमाचल के अन्य इलाकों में हैं। मंड के किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए पंजाब जाना पड़ता है। किसानों का कहना है कि बड़े शर्म की बात है कि दोगुनी आय और जीरो बजट खेती के नाम पर डींगें हांकने वाली सरकारें हिमाचल में आज तक अपनी धान मंडियां ही नहीं बना पाई हैं। ब्यास दरिया किनारे इन दिनों मंड में धान की करीब 40 फीसदी कटाई पूरी हो चुकी है। किसानों को इस बात की फिक्र है कि आखिर उनकी फसल कहां बिकेगी। नए कृषि कानूनों के विरोध के चलते पंजाब में काफी उथल पुथल चल रही है। इसके अलावा पंजाब में पहले वहां के धान को तवज्जो मिलती है। क्षेत्र के किसानों ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि मंड में जल्द धान मंडी की स्थापना की जाए। अपनी माटी टीम ने इंदौरा में  कृषि अधिकारी विजय लांबा से बात की। उन्होंने बताया कि  धान 40 फीसदी कटाई हो चुकी है, काम तेजी से चल रहा है। बहरहाल सवाल यही है कि आखिर हिमाचल में धान मंडियां क्या सपना ही रहेंगी। आपको यह स्टोरी कैसी लगी, इस पर अपनी राय जरूर दें।

रिपोर्ट : निजी संवाददाता,मीलवां

नौणी — डा. वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी क्षेत्रीय बागबानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, धौलाकुआं को देश में डेहलिया फूल की टेस्टिंग लीड सेंटर के रूप में कार्य कर रहा है।  भारत सरकार के कृषि सहकारिता और किसान कल्याण विभाग के पौधा किस्म और कृषक अधिकार प्राधिकरण ने धौलाकुआं अनुसंधान केंद्र को इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर का ‘लीड सेंटर’ बनाया गया है, जिससे राज्य में डेहलिया की खेती को बढ़ावा मिल रहा है। इस अनुसंधान केंद्र को फूलों पर शोध कार्य करते ज्यादा समय नहीं हुआ है। मुख्य अन्वेषक डा. प्रियंका ठाकुर ने बताया कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य डेहलिया का डीयूएस टेस्टिंग के दिशा-निर्देशों का विकास और फूल कि विभिन्न प्रजातियों और कल्टीवार का मूल्यांकन करना है।

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आपके सुझाव बहुमूल्य हैं। आप अपने सुझाव या विशेष कवरेज के लिए हमसे संपर्क कर सकते हैं। आप हमें व्हाट्सऐप, फोन या ई-मेल कर सकते हैं। आपके सुझावों से अपनी माटी पूरे प्रदेश के किसान-बागबानों की हर बात को सरकार तक पहुंचा रहा है।  इससे सरकार को आपकी सफलताओं और समस्याओं को जानने का मौका मिलेगा।  हम आपकी बात स्पेशल कवरेज के जरिए सरकार तक  ले जाएंगे।

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पृष्ठ संयोजन जीवन ऋषि – 98163-24264

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