जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति संवेदना: रोहित पराशर, लेखक शिमला से हैं

रोहित पराशर, लेखक शिमला से हैं By: रोहित पराशर, लेखक शिमला से हैं Oct 28th, 2020 12:06 am

रोहित पराशर

लेखक शिमला से हैं

आईपीसीसी की यह रिपोर्ट भारत और भारत जैसे विकासशील देशों के लिए और चिंताजनक है, क्योंकि इस रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि वैश्विक तापमान में यदि दो डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होती है तो इसका सबसे अधिक असर प्राकृतिक आपदाओं और खाद्य उत्पादन और आजीविका के अवसरों पर पडे़गा। जलवायु परिवर्तन वैश्विक खाद्य उत्पादन को गंभीरता से प्रभावित करेगा, जैसे सूखे के रूप में, वर्षा की वृद्धि की अनिश्चितता होगी और बढ़ते तापमान से वैश्विक फसलों की पैदावार कम होगी, जबकि महासागरों की वार्मिंग और अम्लीकरण समुद्री वन्य जीवन और मत्स्य पालन को प्रभावित करते हैं…

जलवायु परिवर्तन के प्रति जनता और सरकारों का उदासीन रवैया किस हद तक खतरनाक हो सकता है, इसके प्रति अभी तक न ही तो जनता जाग रही है और न ही सरकारें। मानव सभ्यता के विकास के लिए ढाई सौ साल पहले शुरू हुई औद्योगिक क्रांति के कारण जलवायु का संतुलन बिगड़ना शुरू हुआ जो एक गंभीर समस्या का रूप लेता जा रहा है। पिछले कुछ समय में अति वर्षा, लगातार पिघलते ग्लेशियरों के कारण बनती नई झीलों, बाढ़, अधिक गर्मी और समुद्र का स्तर बढ़ने से चक्रवाती गतिविधियों जैसे दर्शनीय तथ्यों ने न सिर्फ  सरकारों,  बल्कि आम जनता का ध्यान भी अपनी ओर आकृष्ट करना शुरू किया है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के इन प्रत्यक्ष परिणामों के बाद भी अभी भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जो जलवायु परिवर्तन या पर्यावरण में आ रहे बदलावों को न ही समझते हैं और न ही इसे समझाने के लिए अभी तक व्यापक स्तर पर कोई जन-जागरण अभियान चलाया गया है।

इसके चलते इतने संजीदा और संवेदनशील विषय के प्रति लोगों में अज्ञानता है। जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए हमें इसे अपने शरीर के साथ जोड़कर देखें तो इसे समझना बेहद आसान होगा। इसे अपने शरीर से जोड़कर देखने से न सिर्फ  हम जलवायु परिवर्तन को समझ सकेंगे, बल्कि इससे बचने के लिए प्रयास भी शुरू कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन भी मानव शरीर में आने वाले ज्वर की तहर है। जैसे कि सभी को ज्ञात है कि सामान्य व्यक्ति जो पूरी तरह स्वस्थ है, उसके शरीर का तापमान 98 डिग्री फारेनहाइट और 37 डिग्री सेल्सियस होता है। यदि इस तापमान में एक या डेढ़ डिग्री का उतार-चढ़ाव हो तो व्यक्ति के शरीर में कोई दिक्कत या बदलाव देखने को नहीं मिलते हैं। लेकिन यदि इस तापमान में डेढ़ डिग्री का उतार-चढ़ाव आ जाए तो दिक्कतें शुरू हो जाती हैं।

जलवायु के साथ भी कुछ ऐसा है। यदि इसमें एक या डेढ़ डिग्री का उतार-चढ़ाव आता है तो बहुत सी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं, जिनका असर एकदम सामने न आकर थोड़े समय के बाद देखने को मिलता है। इसलिए हमें इसके प्रति संजीदा होने की जरूरत बढ़ जाती है। गौर रहे कि पृथ्वी के वातावरण के प्रति अंतरराष्ट्रीय चिंता 1972 में स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से शुरू हुई थी और इसके 10 वर्षों के बाद संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की स्थापना 1982 पर्यावरण संरक्षण के लिए की गई थी। लेकिन पिछले कुछ समय में जलवायु परिवर्तन की स्थिति को लेकर आई महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट ने भविष्य के लिए पर्यावरण को बचाए रखने के लिए चिंताओं को बढ़ा दिया है। पिछले साल जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने पर आधारित रिपोर्ट में तापमान के दो डिग्री सेल्सियस बढ़ जाने पर आने वाले भयावह खतरों के बारे में जिक्र किया है। आईपीसीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि डेढ़ डिग्री के मुकाबले दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर उत्तरी अमरीका के पश्चिमी इलाकों सहित दुनिया के अनेक क्षेत्रों में भारी बारिश होने का खतरा अपेक्षाकृत बढ़ने की आशंका है। भारी बारिश से जुड़े ऊष्णकटिबंधीय चक्रवातों के भी ज्यादा होने का खतरा है।

 इसके अलावा तापमान में दो डिग्री के मुकाबले डेढ़ डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी होने पर जंगलों में आग लगने के दुष्प्रभाव कम होते हैं। आईपीसीसी वर्किंग ग्रुप-1 के सह-अध्यक्ष पनमा झई ने कहा कि हम वैश्विक तापमान में मात्र एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर असहनीय मौसम, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि तथा आर्कटिक में जमी बर्फ  के पिघलने तथा अन्य अनेक नकारात्मक पर्यावरणीय परिवर्तनों का पहले ही सामना कर रहे हैं। आईपीसीसी की यह रिपोर्ट भारत और भारत जैसे विकासशील देशों के लिए और चिंताजनक है, क्योंकि इस रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि वैश्विक तापमान में यदि दो डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होती है तो इसका सबसे अधिक असर प्राकृतिक आपदाओं और खाद्य उत्पादन और आजीविका के अवसरों पर पडे़गा। जलवायु परिवर्तन वैश्विक खाद्य उत्पादन को गंभीरता से प्रभावित करेगा, जैसे सूखे के रूप में, वर्षा की वृद्धि की अनिश्चितता होगी और बढ़ते तापमान से वैश्विक फसलों की पैदावार कम होगी, जबकि महासागरों की वार्मिंग और अम्लीकरण समुद्री वन्य जीवन और मत्स्य पालन को प्रभावित करते हैं। भारत के कुछ हिस्सों में और अधिक अनियमित बारिश से चावल की पैदावार कम होगी और खाद्य कीमतों में, रहने की लागत में वृद्धि होगी, जबकि सूखे से स्वच्छ पीने के पानी और भोजन की कमी होगी।

साथ ही अत्यधिक तापमान से कुपोषण बढ़ने और ग्रामीण गरीब बढ़ सकते हैं। 55 फीसदी से अधिक भारतीय ग्रामीण परिवार कृषि पर निर्भर करते हैं और मत्स्य पालन और वानिकी के साथ, यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद के लिए बड़े योगदानकर्ताओं में हैं। ऐसे में इनके ऊपर पड़ने वाले प्रभावों से देश की जीडीपी पर भी इसका असर देखा जाएगा। इतना ही नहीं, जलवायु परिवर्तन के कारण फसल की पैदावार कम होने से खाद्यान्न समस्या उत्पन्न हो सकती है, जिससे भुखमरी और कुपोषण को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही भूमि निम्नीकरण जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में गेहूं और मकई जैसी फसलों की पैदावार में पहले से ही गिरावट देखी जा रही है। वातावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ने से फसलों की पोषण गुणवत्ता में कमी आ रही है, जिससे भुखमरी और कुपोषण को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा अन्य कई खतरों की भी आशंका है। इसलिए अब पूरे विश्व के जाग जाने का समय आ गया है।

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