रजिस्टर में कैद होगा हर जंतु

By: संयोजन जीवन ऋषि Nov 8th, 2020 12:10 am

अगर हमें सभी पौधों की जानकारी एक जगह मिल जाए, तो कितना मजा आएगा। घंटों का काम मिनटों में हो जाएगा। प्रदेश के कुछ जिलों नौणी यूनिवर्सिटी ऐसे प्रयास शुरू कर रही है। देखते हैं यह रिपोर्ट…

सोलन हिमाचल के चार जिलों में पेड़, पौधों और जीव जंतुओं के लिए खास तरह के रजिस्टर बनाए जा रहे हैं। इन पीबीआर  में 32 तरह के प्रारूप शामिल किए गए हैं। इनमें  पशुधन संसाधन, आजीविका पैटर्न आदि शामिल हैं। इसके अलावा कृषि, चारा फसलों, फल, औषधीय, सजावटी व जंगली पौधों की कई कैटेगरी शामिल हैं। नौणी यूनिवर्सिटी मे तहत नेरी कालेज में अभी चार जिलों ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर व चंबा के रजिस्टर बन रहे हैं।  इन रजिस्टरों के बन जाने से पेड़ों और जीवों की सारी जानकारियां हर जगह मिल जाएंगी, जिससे भविष्य में हम वैज्ञानिक ढंग से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर पाएंगे।

नेरी कालेज में कार्यरत सहायक प्रोफेसर डा. दुष्यंत शर्मा को यूनिवर्सिटी ने नोडल अधिकारी नियुक्त किया है। इसके अलावा डा. संजीव बन्याल, डा. दीपा शर्मा, डा. रवि भारद्वाज और डा. ऋचा सलवान भी परियोजना का हिस्सा होंगे। जैविक विविधता के संरक्षण, स्थायी उपयोग और इससे उत्पन्न होने वाले लाभों के समान बंटवारे के लिए भारत की संसद द्वारा जैविक विविधता अधिनियम 2002 लागू किया गया है।

इस अधिनियम के तहत, राज्य में सभी 3371 स्थानीय निकाय स्तरों पर जैव विविधता प्रबंधन समितियों का गठन किया गया है। इन पीबीआर में जैव विविधता प्रबंधन समितियों क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों द्वारा पौधों, जानवरों, रोगाणुओं, कीड़े और उनके संभावित उपयोग जैसे जैव विविधता घटकों पर व्यापक जानकारी शामिल है। नौणी विवि के कुलपति डा. परविंदर कौशल ने बताया कि यह पीबीआर तैयार हो जाने के बाद, जैव विविधता बोर्ड, विश्वविद्यालय और संबंधित बीएमसी को विभिन्न ब्लॉकों में पाए जाने वाले जैविक संसाधनों, उनके टिकाऊ उपयोग, खतरे में प्रजातियां, आदि के बारे में पूरी जानकारी होगी।

हल्दून वैली के किसान ने उगाया ड्रैगन फ्रूट

नगरोटा सूरियां कांगड़ा जिला में पौंग झील से सटे इलाकों में  कई ऐसे किसान हैं, जो स्मार्ट खेती को तवज्जो देते हैं। इन्हीं किसानों में से एक हैं नगरोटा सूरियां विकास खंड के तहत आने वाली घाड़जरोट पंचायत के रहने वाले युवा आशीष सिंह राणा।   आशीष ने सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक की है । बचपन से खेती का शौक रखने वाले आशीष ने पढ़ाई खत्म होने के बाद नौकरी करने की बजाय खेती में कुछ नया करने की सोची। उन्होंने अपनी माता कुंता राणा से प्रेरणा पाकर दिन-रात कड़ी मेहनत से चार कनाल के प्लाट पर ड्रैगन फ्रूट तैयार कर डाला है। आशीष के इस कारनामे से हर कोई दंग है। उन्होंने ड्रैगन फ्रूट के 500 पौधे तैयार कर लिए हैं।

ड्रैगन फ्रूट का पौधा छह महीने में तीन-चार बार फसल देता है । अमूमन जून से नवंबर तक इस पौधे पर फल लगते हैं। वह  पंजाब के बरनाला से ये पौधे लाए हैं। वह इसमें देशी खाद का इस्तेमाल करते हैं। गौर रहे कि मार्केट में काफी महंगा मिलने वाला ड्रैगन फ्रूट हार्ट, शुगर, कैंसर और पेट के कई विकारों को ठीक करने में सहायक माना जाता है। इसके अलावा इम्युनिटी को भी बढ़ाता है। फिलहाल आशीष राणा का ये प्रयोग भविष्य में बागबानों के लिए बड़ा मददगार साबित हो सकता है।

इंजीनियर आशीष राणा ने तैयार किए 500 से ज्यादा बूटे

सोना उगलने वाली हल्दून वैली का ज्यादातर हिस्सा पौंग झील में समा चुका है।  लेकिन घाटी से सटे इलाकों के किसान अपनी मेहनत के दम पर लगातार खेती में नए-नए कमाल करते रहते हैं। कुछ ऐसा ही कमाल किया है इंजीनियर आशीष राणा ने। पेश है यह रिपोर्ट…

गुजरात में सबसे ज्यादा पैदावार

भारत में इस ड्रैगन फ्रूट की पैदावार सबसे अधिक गुजरात में होती है उसके बाद आंध्र प्रदेश महाराष्ट्र तथा तेलगांना में अब हमने हिमाचल में भी इसकी शुरुआत की है देखना है कि यहां पर इसका कैसा उत्पादन रहता है इस खेती के लिए दो से 40 डिग्री तक टेंपरेचर चाहिए और यह ड्रैगन फ्रूट 200 से ढाई सौ रुपए किलो बिकता है।

सीड सेंटर निहाल में बदलेगा दशकों पुराना सीड ग्रेडर

करीब तीन दशक बाद बदला जाएगा सीड ग्रेडर, विभाग ने केंद्र से मांगी 35 लाख रुपए की राशि

रिपोर्टः कार्यालय संवाददाता, बिलासपुर

कृषि विभाग बिलासपुर के निहाल सेक्टर स्थित सीड सेंटर में जल्द ही नया सीड ग्रेडर (बीजों की ग्रेडिंग) मशीन स्थापित किया जाएगा। इस पर करीब 35 लाख रुपए की राशि खर्च की जाएगी, जिससे किसानों को और अधिक बेहतर बीज भविष्य में मिलेगा। हालांकि अभी तक कृषि विभाग की ओर से कृषि विभाग के उच्च अधिकारियों को अवगत करवाया गया है।

इसके लिए सरकार से करीब 35 लाख रुपए की राशि मांगी है, ताकि दशकों पुराने इस सीड ग्रेडर को बदला जा सके। वहीं, सीड ग्रेडर नई मशीन यहां स्थापित होने के बाद किसानों को उन्नत किस्म का बीज मिलेगा। जानकारी के अनुसार निहाल सेक्टर स्थित सीड सेंटर में कृषि विभाग का सीड ग्रेडर करीब 30 साल पुराना है। इतने लंबे समय तक सीड ग्रेडर को बदलने के लिए किसी ने भी जहमत नहीं उठाई।

 बताया जा रहा है कि इस सीड ग्रेडर की हालत दयनीय हो चुकी है। यदि इस सीड ग्रेडर को प्रयोग किया जाता है तो इसका नुकसान ही विभाग को झेलना पड़ता है। इस सीड ग्रेडर के कलपुर्जे पुरी तरह से खराब हो चुके हैं, जिसके चलते अब विभाग ने इस सीड ग्रेडर को बदलने की प्रक्रिया शुरू की है। ताकि किसानों को सुविधा मिल सके।

बता दें कि सीड ग्रेडर द्वारा तैयार किया गया बीज किसानों को वितरित किया जाता है। यहां पर किसान भी आ सकते हैं। विभाग द्वारा तैयार किया गया सीड किसानों तक पहुंचाया जाता है, लेकिन वर्तमान में अब यहां पर स्थापित सीड ग्रेडर दम तोड़ता ही नजर आ रहा है, जिसके चलते विभाग की ओर से यहां पर स्थित सीड ग्रेडर को बदलने की कवायद शुरू की है। जल्द ही यहां पर नया सीड ग्रेडर स्थापित किया जाएगा। उधर, इस बारे में कृषि विभाग के उपनिदेशक केएस पटियाल ने बताया कि विभागीय उच्च अधिकारियों को 35 लाख रुपए प्रस्ताव तैयार स्वीकृति के लिए भेजा है। विभाग की स्वीकृति मिलने के बाद यहां पर नया सीड ग्रेडर स्थापित कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि नया सीड ग्रेडर स्थापित होने के बाद किसानों को भी लाभ मिलेगा।

सी-बक्थोर्न मूल्यवान औषधीय पौधा

माइनस 40 से प्लस 40  डिग्री सेल्सियस के कठोरतम तापमान को सहन करने वाला यह पौधा उत्तरी हिमालय में पाया जाता है। सी-बक्थोर्न का पौधा हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में पाया जाता है। हमारे प्रदेश में यह किन्नौर, लाहुल-स्पीति में पाया जाता है। लेह में भी यह खूब होता है। इसे लेह बेरी, छरमा सुरच, लद्दाख गोल्ड व सी बेरी आदि नाम से जाना जाता है। इस पौधे का हरेक भाग खाने योग्य और औषधीय गुणों से भरपूर होता है।  इस पौधे के इतिहास पर गौर करें, तो आठवीं शताब्दी में तिब्बती साहित्य में इसके अनूठे गुणों का उल्लेख है। इसमें 3, 6, 7 व 9 ओमेगा फैटी एसिड पाया जाता है। यह दुनिया में इकलौता पौधा है, जिसमें ओमेगा-7 फैटी एसिड पाया जाता है। इसका फल बेहद रसीला, खट्टा और स्वादिष्ट होता है। इसके पत्तों को सुखाकर पाउडर के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटी आक्सीडेंट्स पाए जाते हैं। अमीनो एसिड, प्रो-विटामिन भी खूब होते हैं। इसका इस्तेमाल कैप्सूल बनाने, हर्बल टी,जैम, हैल्थ ड्रिंक में होता है।

अन्य उपयोग

80 के दशक में रूसी अंतरिक्ष विभाग ने इसका इस्तेमाल अंतरिक्ष यात्रियों को पोषण और विकिरण से लड़ने के लिए सप्लीमेंट के तौर पर किया था। इसका जूस सैनिकों की खुराक का एक हिस्सा भी है। एक शोध के अनुसार इस पौधे में पूरी मानव जाति को विटामिन सी पूरी करने की क्षमता है।

लेखिका मंजू लता सिसोदिया, सहायक प्राध्यापक, वनस्पति विज्ञान, एमएलएसएम कालेज, सुंदरनगर

बिन बारिश क्या होगा फसलों का

नमी न होने से बिजाई का काम रुका, बरसात के बाद नहीं हो पाई भरपूर बारिश

हिमाचल प्रदेश सूखे की चपेट में आने लग गया है। राज्य में बरसात के बाद बारिश न होने से खेत-खलिहानों में सूखे की मार पड़ने लगी है। मौसम विभाग की मानें, तो राज्य में नवंबर महीने के दौरान भी बारिश के कम ही आसार जताए जा रहे हैं, जो प्रदेश के किसानों-बागबानों के लिए चिंता का विषय बन गया है। कोरोना काल में प्रदेश में मानसून सीजन के दौरान भी सामान्य से कम बारिश रिकार्ड की गई थी। प्रदेश में मानसून सीजन के बाद राज्य के दो-तीन जिलों को छोड़ कर शेष जिलों में बारिश की एक बूंद तक नहीं बरसी है, जिस कारण खेतों में नमी खत्म हो गई है। इसके चलते किसान खेतों में नई फसलों की बिजाई नहीं कर पा रहे हैं, वहीं खेतों में उगाई गई सब्जियों पर भी बारिश न होने से सूखे की मार पड़ने लगी है। यही आलम बागीचों में बना हुआ है। राज्य के निचले और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब सीजन खत्म हो चुका है और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यह आखिरी चरण में है। सेब सीजन समाप्ति के बाद बागबानों द्वारा बागीचों में सुधार कार्य आरंभ कर दिया जाता है, मगर बिन बारिश यह काम भी लटके पडे़ हैं। मौसम विभाग के निदेशक डा. मनमोहन सिंह ने बताया अक्तूबर व नवंबर में कम बारिश होती है, मगर इस साल बरसात के दौरान भी कम बारिश हुई है, वहीं अक्तूबर माह के दौरान भी 0.4 फीसदी बारिश हुई है। नवंबर माह के दौरान भी कम ही बारिश होने का पूर्वानुमान लगाया जा रहा है, जिससे राज्य की कृषि व बागबानी पर भारी असर पड़
सकता है।

 रिपोर्टः कार्यालय संवाददाता—शिमला

तो क्या मिट जाएगा गिरि नदी का वजूद

पिछले कुछ महीनों से बारिश न होने और अत्याधिक पानी को लिफ्टों के माध्यम से उठाए जाने के कारण गिरि नदी इन दिनों सूखने के कगार पर है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार गिरि नदी का जल स्तर केवल 45 सेंटीमीटर रह चुका है जो कि पिछले तीन दशकों में सबसे कम आंका गया है। जल स्तर घटने से गिरि नदी पर बने हाइडल प्रोजेक्ट में भी विद्युत उत्पादन 50 प्रतिशत रह गया है। नदी में  पहली बार इतना कम पानी देखा गया है जोकि भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।

शिमला जिला के खड़ा पत्थर से निकलने वाली गिरि नदी के दोनों ओर असंख्य पानी की लिफ्टें लगाकर पानी उठाया गया है। सूत्रों के अनुसार वर्तमान में 50 से अधिक क्रियाशील है जिसमें कुछेक सरकारी और सबसे ज्यादा समृद्ध व्यक्तियों द्वारा लगाई गई हैं। सबसे अहम बात यह है कि प्राइवेट लिफ्टों को स्थापित करने के लिए सरकार से कोई अनुमति नहीं ली गई है।

बुद्धिजीवी वर्ग का कहना है कि निजी लिफ्टें स्थापित करने के लिए मापदंड निर्धारित किए जाने चाहिए। मरयोग स्थित केंद्रीय जल आयोग के प्रभारी जसवंत सिंह का कहना है कि इस वर्ष बरसात के दौरान बहुत कम बारिश हुई है और बरसात में गिरि नदी का जल स्तर केवल 1.35 मीटर बढ़ा है जो कि पिछले कई वर्षों की तुलना में बहुत कम है। यशवंतनगर की समुद्र तल से ऊंचाई को मध्यनजर रखते हुए जल आयोग द्वारा जीरो मानक गेज 895 मीटर निर्धारित किया गया है और इस मानक गेज के आधार पर जल स्तर मापा जाता है।

उन्होंने कहा कि गिरि नदी में 20 सितंबर, 2008 को सबसे ज्यादा बाढ़ 903.80 मीटर रिकार्ड की गई थी, जबकि पांच मई, 1995 को सबसे ज्यादा डिस्चार्ज स्तर 1787.59 क्यूमैक रिकार्ड किया गया था। उन्होंने कहा कि गिरि नदी का कैचमैंट एरिया 1349 किलोमीटर है।                                                                                                रिपोर्ट: निजी संवाददाता, यशवंतनगर

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