हे फेसबुक, कोटिशः प्रणाम : अशोक गौतम, [email protected]

By: अशोक गौतम Dec 2nd, 2020 12:04 am

उनका फेसबुक अकाउंट सिद्ध करता है कि वे उम्दा किस्म के कलाकार टाइप के राइटर हैं। कारण, ऐसा कोई पल नहीं जाता जिस पल वे अपने फेसबुक अकाउंट पर कुछ न कुछ नहीं चेपते। वह मतलब का हो या न, इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं। इस जन्म में उनकी बस एक ही आखिरी तमन्ना है कि सोए सोए भी फेसबुक पर उनकी प्रेजंस बनी रहे। इसलिए सारी ईमानदारियां त्याग वे पूरी ईमानदारी से अपना फेसबुकी दायित्व पूरा करते रहते हैं। आज के समय में सबसे महत्त्वपूर्ण कोई दायित्व है तो बस, फेसबुकी दायित्व। फेसबुकी पुराण में फेसबुकी दायित्व जीवन के सभी दायित्व में सबसे ऊंचा माना जाता है। जिसने फेसबुकी दायित्व का पालन कर लिया, समझो उसके शेष सारे सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय दायित्व अपने आप ही सिद्ध हो गए। पता नहीं फेसबुक पर कुछ न कुछ डालने की इतनी शक्ति उन्हें मिलती कहां से होगी? फेसबुक कहती है कि वे इतना लिखते हैं कि… इतनी अपनी हर हरकत की जिंदा तस्वीरें फेसबुक के मुंह पर चिपकाते हैं कि कई बार तो उनकी लिखी इबारतों को, चिपकी तस्वीरों को देखकर उनको भी समझना मुश्किल हो जाता है कि वे आखिर ये सब कर किस लिए रहे हैं? कर रहे हैं तो क्यों कर रहें हैं? कर रहे हैं तो क्या कर रहे हैं? पर जो कोई स्वयंभू कोटि अथवा उच्चकोटि का फेसबुकी मारक विचारक अपने लिखे को लिखने के बाद समझने की कोशिश करने लग जाए तो सच  मानों, दूसरे दिन फेसबुक पर सार्थक लेशमात्र ही बचे। वह लेखक विहीन हो जाए, वह आत्ममुग्ध साहित्य विहीन हो जाए। वह तस्वीरहीन हो जाए। फेसबुक हितार्थ वे सोए सोए भी जो बोलते हैं, अकालजयी साहित्य हो जाता है।

उनके बोले को लपकने के लिए फेसबुक मुंह खोले सोए सोए भी तैयार रहती है। या कि न चाहते हुए भी उनके डर से उसे मुंह खुला रखना पड़ता है। कि वे किसी भी वक्त कुछ भी बकें, बोलें, तो वह उसे अपने माथे पर चिपका उसे अमर कर दे। उनके इधर-उधर बिखरे फेसबुकिया प्रशंसक उनके फेसबुक पर लिखे को बटोरने के लिए हरदम दिमाग बंद किए कमर कसे रहते हैं। या कि उन्होंने उन्हें स्टैंडिंग हिदायत दे रखी है कि…। मेरे ये फेसबुक प्रिय लेखक लिखते कम हैं, चर्चा में अधिक रहते हैं। कई बार तो उनके लिखे को न देखने के बाद भी लगता है कि वे लिखते ही चर्चा में रहने के लिए हैं। चर्चा में रहना हर किस्म के लेखक की लाइलाज बीमारी होती है। इस बीमारी को पालने के लिए वह अपने प्राणों तक का उत्सर्ग हंसते-हंसते कर जाता है। अपने प्रिय लेखक के बारे में मैंने महसूस न करने के बाद भी महसूस किया है कि उनके लिखने पर जो उनकी चर्चा न हो तो उन्हें बहुत बुरा लगता है। और जब उन्हें बहुत बुरा लगता है तो लगता है ज्यों वे अपने लिखे पर खुद ही चर्चा करवा रहे हों असली लगने वाले छद्म नामों से। इसीलिए वे मेरे फेसबुक के सबसे चर्चित लेखक हैं। अज्ञेय से बड़े , बहुत बड़े।  मेरे लिए वे प्रख्यात, प्रसिद्ध, विख्यात और भी न जाने क्या क्या साहित्यकार हैं। मां सरस्वती इन्हें ऐसे ही फेसबुक पर निर्बाध लिखने की शक्ति देती रहें। जय हो हे फेसबुक तेरी! तू कलियुग की हम जैसों को संजीवनी से भी बढ़कर है। तू है तो हम हैं। तू है तो फिर क्या गम है। तेरे पीछे तो हम जन्नत भी छोड़ दें जो वहां इंटरनेट, फेसबुक न हो तो।

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