वैश्विक आपदाओं का दौर और एड्स : हंसराज ठाकुर, लेखक मंडी से हैं

By: हंसराज ठाकुर, लेखक मंडी से हैं Dec 1st, 2020 12:04 am

हिमाचल प्रदेश में भी वर्ष 1992 में पहला मामला आने के बाद आज 5700 से अधिक एचआईवी पॉजि़टिव केस सामने आ चुके हैं, जिसमें 1538 की मौत व 4162 जीवित हैं। वर्ष 2003-04 तक हमीरपुर, कांगड़ा व बिलासपुर एचआईवी पॉजि़टिव के मामले में पहले तीन स्थानों पर थे। तब हिमाचल प्रदेश में स्वैच्छिक जांच व परामर्श केंद्रों की संख्या 12 थी। आज प्रदेश में 47 इंटेग्रेटेड काउंसिलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर तथा 2 मोबाइल वैन हैं। कोरोना व एड्स अभी तक लाइलाज बीमारियां हैं, अतः जागरूकता व सावधानियों द्वारा ही इनसे बचा जा सकता है…

बेशक आजकल पूरा विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है और हमारे देश में भी यह कहर ढा रही है। हिमाचल प्रदेश में भी प्रतिदिन कोविड-19 के मामलों में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिल रही है और आश्चर्य की बात यह है कि कोरोना महामारी के सामने आने के बाद स्वाभाविक रूप से मरने वालों का आंकड़ा शून्य की तरफ  जा रहा है। आज जहां से भी जिस किसी की मौत का समाचार आता है, उसकी वजह कोरोना ही सामने आ रही है। ऐसा पहली बार नहीं है कि विश्व किसी महामारी से गुजर रहा हो। पहले भी निश्चित समयांतराल पर वैश्विक महामारियों ने मानव समुदाय में अपने पैर पसारे हैं, चाहे वह स्पेनिश फ्लू हो, एड्स हो अथवा 1855 में फैली प्लेग महामारी हो। ये प्लेग भी चीन से ही विश्व में फैलना शुरू हुआ था। एक दिसंबर को विश्व एड्स नियंत्रण दिवस है, तो इसी की बात करेंगे। 1981 में पहचाने जाने के बाद से अब तक 3.5 करोड़ लोग एड्स का शिकार हो चुके हैं। एड्स का वायरस एचआईवी संक्रमित शख्स की प्रतिरोधक क्षमता को पूरी तरह नष्ट कर देता है। वह सामान्य बीमारियों से लड़ने के काबिल भी नहीं रह पाता और अभी तक इसकी भी वैक्सीन नहीं बन सकी है।

एड्स को पहली बार अमरीका के समलैंगिक समुदाय में पाया गया, लेकिन माना जाता है कि यह 1920 के दशक में पश्चिम अफ्रीका के किसी चिम्पेंजी वायरस से निकला है और यह केवल शरीर के तरल पदार्थों के जरिये ही फैलता है। विश्व एड्स दिवस पूरी दुनिया में एक दिसंबर को हर साल एक नए थीम के साथ मनाया जाता है और वर्ष 2020 का थीम है ः ‘एंडिंग दि एचआईवी’। विश्व एड्स दिवस स्वास्थ्य संगठनों के लिए लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने, इलाज के लिए संभव पहुंच के साथ-साथ रोकथाम के उपायों पर चर्चा करने के लिए महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। इस दिवस की कल्पना पहली बार अगस्त 1987 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सूचना अधिकारियों थॉमस नेट्टर और जेम्स डब्ल्यू बन्न द्वारा की गई व एक दिसंबर 1988 को पहली बार यह दिवस मनाया गया।

एड्स पर संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम वर्ष 1996 से प्रभाव में आया और दुनिया भर में इसे बढ़ावा देना शुरू कर दिया गया। एक दिन मनाए जाने के बजाय पूरे वर्ष बेहतर संचार, बीमारी की रोकथाम और रोग के प्रति जागरूकता के लिए 1997 में यूएन एड्स अभियान शुरू किया गया। शुरू के सालों में विश्व एड्स दिवस के विषयों (थीम) का ध्यान बच्चों व युवाओं पर केंद्रित था, जो बाद में परिवार के रोग के रूप में पहचाना गया। भारत में चेन्नई के सेक्स वर्कर में एड्स का पहला केस वर्ष 1986 में आया था, जहां 200 में से 6 सैंपल में एचआईवी की पुष्टि हुए थी। आज भारत में 21.40 लाख एचआईवी पॉजि़टिव हैं और दुनिया में एड्स मरीजों की संख्या में तीसरा सबसे बड़ा देश बना हुआ है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक यह आंकड़ा 30 लाख होना मुमकिन है। पिछले कुछ सालों में एड्स के प्रति जागरूकता अभियानों के चलते इस संक्रमण पर काबू पाया गया है। वर्ष 2018 के आंकड़ों के मुताबिक हर वर्ष एड्स से 69 हजार मौतें व इतने ही नए मरीज जुड़ रहे हैं। यूएन एड्स 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक 3 में से 2 एचआईवी पॉजि़टिव बच्चे बिना इलाज के ही जी रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में भी वर्ष 1992 में पहला मामला आने के बाद आज 5700 से अधिक एचआईवी पॉजि़टिव केस सामने आ चुके हैं, जिसमें 1538 की मौत व 4162 जीवित हैं। वर्ष 2003-04 तक हमीरपुर, कांगड़ा व बिलासपुर एचआईवी पॉजि़टिव के मामले में पहले तीन स्थानों पर थे। तब हिमाचल प्रदेश में स्वैच्छिक जांच व परामर्श केंद्रों की संख्या 12 थी। आज प्रदेश में 47 इंटेग्रेटेड काउंसिलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर तथा 2 मोबाइल वैन हैं। संभावना जताई जा सकती है कि आने वाले समय में एड्स दिवस की तरह कोरोना दिवस भी मनाया जाए। दोनों अभी तक लाइलाज बीमारियां हैं, अतः जागरूकता व सावधानियों द्वारा ही इनसे बचा जा सकता है। एड्स दिवस पर विभिन्न संस्थानों द्वारा कुछ विशेष क्रियाकलाप भी किए जाते हैं, जैसे वक्ताओं और प्रदर्शकों द्वारा एकल कार्यक्रम या स्वतंत्र कार्यक्रमों का आयोजन आदि। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य मानव कल्याण का ही है, चाहे योजनाओं को लागू करने के संदर्भ में, देखरेख में, एंटिरेट्रोवाइरल थेरेपी सहित धार्मिक समूहों, स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संगठनों से अधिक छात्रों को प्रोत्साहित करना। एड्स बहुत डरावना है।

हम सभी यही उम्मीद करते हैं कि यह मुझे नहीं है, जैसे आजकल सब कोरोना के बारे में ऐसी उम्मीद करते हैं। एड्स ह्यूमन इम्मयूनो वायरस की वजह से होता है जो मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पर हमला करता है। यह शारीरिक द्रव या श्लेषा झिल्ली के माध्यम से दूसरे व्यक्ति में प्रेषित हो जाता है। अतः बुखार, ठंड लगना, गले में खराश, रात को पसीना, बढ़ी हुई ग्रंथियां, वज़न घटना, दस्त, थकान, दुर्बलता, जोड़ों व मांसपेशियों का दर्द, लाल चकते जैसे लक्षणों पर चिकित्सक की सलाह व जांच आवश्यक है। इसके आखिरी चरण में धुंधली दृष्टि, स्थायी थकान, बुखार, सूखी खांसी, जीभ पर सफेद धब्बे, सांसों में कमी सहित अनेक गंभीर बीमारियों के साथ पता चलता है। हमें यह याद रखना होगा कि एड्स हाथ मिलाने, गले लगने, छींकने, अटूट त्वचा को छूने या एक ही शौचालय के उपयोग के माध्यम से कभी नहीं फैलता है। संक्रमित व्यक्ति की ब्लेड या सिरिंज का पुनः इस्तेमाल इसके फैलने का एक कारक है। हमें अपने परिवार और जीवन साथी के प्रति अधिक वफादार होने की जरूरत है, तभी हम ऐसे दिवसों की सार्थकता सिद्ध कर पाएंगे।

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