हिमाचली श्‍वान की बढ़ेगी शान

By: Jan 3rd, 2021 12:10 am

* गद्दी समुदाय के पाले जाने वाले श्वान का होगा संरक्षण

* कृषि विश्वविद्यालय ने की अनूठी पहल

पालमपुर। विलुप्ता के मुहाने पर जा पहुंचे हिमाचली श्वान (गद्दी समुदाय द्वारा पाले जाने वाले श्वान) के संरक्षण व संवर्द्धन के लिए वैज्ञानिक पहल की जाएगी। पहली बार इस दिशा में कार्य किया जा रहा है। हिमाचल की इस प्रजाति के विशुद्ध श्रेणी को संरक्षित करने के लिए वैज्ञानिक आधार पर काम आरंभ किया जा रहा है। इस हेतु कृषि विश्वविद्यालय ने पहल की है। कृषि विश्वविद्यालय में इस हेतु आधारभूत संरचना को विकसित किया जा रहा है तथा इसके साथ ही वैज्ञानिक आधार पर इसकी ब्रीङिंग का कार्य आरंभ कर दिया जाएगा। बताया जा रहा है कि कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय के लाइवस्टॉक फार्म कांप्लेक्स के अंतर्गत टीम इस प्रजाति के श्वान के फेनोटाइपिक तथा मॉलीक्यूलर विशेषताओं पर अध्ययन करेगी, ताकि इस शोध के आधार पर इस प्रजाति की फेनोटाइपिक तथा मॉलीक्यूलर विशेषताओं को सहेजा जा सके। गद्दी समुदाय के घुमंतू भेड़ पालकों द्वारा इस प्रजाति को पाले जाने के कारण इसे इसी समुदाय के नाम से इसे पहचान मिली है। वही तेंदुआ जैसे वन्य प्राणी से लड़ने की क्षमता रखने के कारण ही इसे इंडियन पैंथर हाउंड के नाम से भी जाना जाता है।

ये हैं हिमालयी क्षेत्र की प्रमुख प्रजातियां

हिमालय पर्वत श्रृंखला में कई असामान्य तथा दुर्लभ श्वान की प्रजातियां पाई जाती हैं। ये आकार में बड़े, आक्रामक तथा बुद्धिमान माने जाते हैं। इनके जबड़े चौड़ें तथा थूथन मजबूत होती है, वहीं के बाल भी लंबे होते हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण ये प्रजातियां हिमालय वातावरण के अनुकूल मानी जाती हैं। हिमाचली श्वान की ऊंचाई 20 से 27 सेंटीमीटर होती है, वहीं इसका वजन 35 से 45 किलोग्राम होता है, जबकि इसका लाइफ स्पैन 10 से 13 वर्ष का आंका गया है। हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाले श्वानों में नेपाली शीप डॉग, नेपाली हिल डॉग दोनों नेपाल में पाए जाते हैं, वही हिमालयन गार्ड डॉग, इंडियन लेपर्ड हाउंड हिमाचली श्वान तथा बकरवाल मास्टिफ  यानी कि कश्मीर शीप डॉग, भारत के हिमालय क्षेत्र में पाई जाती है। इसमें इंडियन लेपर्ड हाउंड जाने की हिमाचली श्वान हिमाचल से संबंधित है वहीं भूटान का भुटिया शीप डॉग तथा दामची तथा तिबितयन मास्टिफ प्रमुख हैं

रिपोर्टः जयदीप रिहान, पालमपुर

मन की बात में पीएम ने की चर्चा

30 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में हिमाचली श्वान की इस प्रजाति के बारे में चर्चा की थी तथा लोगों से स्वदेशी प्रजाति के श्वानों को प्रमुखता से पालने का आग्रह भी किया था। घुमंतू जीवन शैली के घटते ट्रेंड के चलते हिमाचली श्वान की संख्या भी कम हो रही है। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि पश्चिमी हिमालय के कुछेक क्षेत्रों में इसकी विशुद्ध नस्ल अब लगभग विलुप्त हो चुकी है।

सेब-प्लम और आड़ू के बूटे हुए महंगे, कीवी के दाम हुए कम

प्रदेश में सर्द ऋतु में उगाए जाने वाले फलदार पौधे बिकने लगे हैं। इस बार कई पौधों के दाम बढ़े हैं,तो कइयों के दामों में कमी आई है। प्रदेश में सर्द ऋतु में उगाए जाने वाले फलदार पौधों में इस बार कीवी पौधे सस्ते हुए हैं, जबकि सेब प्लम और आडू के दाम बढ़े हैं। अपनी माटी टीम ने इन दामों को खंगालने के लिए  हमीरपुर ब्लॉक का दौरा किया। इस ब्लॉक में सेब, आडू व प्लम के सैकड़ों पौधे पहुंचे हैं। विभाग में सेब, आडू व प्लम के पौधों में जहां 10 से 15 रुपए की बढ़ोतरी हुई है। वहीं कीवी के पौधों के रेट में 30 रुपए की कमी आई है। बागबान अपनी डिमांड के मुताबिक पौधे खरीद सकते हैं।  हमीरपुर जिला मुख्यालय स्थित डांगक्वाली में उद्यान विभाग के सेल सेंटर में ये पौधे मिल रहे हैं। यहां प्लम और आडू का पौधा भी 55-55 रुपए में बिक रहे हैं। कीवी के पौधे भी जल्द ही पहुंचे वाले हैं। 100 रुपए के हिसाब से बिकने वाला कीवी का पौधा इस बार 70 रुपए तक रहा है।

 रिपोर्टः कार्यालय संवाददाता, हमीरपुर

इन किसानों को मिली खाद

नाहन । सिरमौर जिला के किसानों को खाद की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध करवा दी गई है। जिला के सभी क्षेत्रों में किसानों की मांग के अनुरूप जिला प्रशासन ने हिमफेड व इफ्को को संपर्क कर जिला सिरमौर के सभी खंड स्तर के गोदामों में खाद की पर्याप्त खेप पहुंचा दी है। ‘दिव्य हिमाचल’ ने किसानों को जिला के कुछ हिस्सों में खाद न मिलने को लेकर समाचार प्रकाशित किया था। उपायुक्त सिरमौर डा. आरके परुथी ने बताया कि जिला में हिमफेड के अंतर्गत गिरिपुल में 1723 बैग, धामला में 1420, सराहां में 1805, टिंबी में 2982, जमटा में 180, संगड़ाह में 58 और पांवटा साहिब में 300 बैग उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त इफ्को के अंतर्गत पांवटा में 760 बैग यूरिया उपलब्ध है।

इस योजना ने मंडी के किसानों को कर दिया मालामाल

मंडी जिला के तहत उठाऊ सिंचाई परियोजना खनोट में हिमाचल फसल विविधिकरण परियोजना के खंड परियोजना प्रबंधक इकाई सरकाघाट के अंतर्गत वर्ष 2017 में कुल लागत 67.80 लाख से बनाई गई है। इस परियोजना के अंतर्गत कुल 20.57 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा को सुनिश्चित किया गया है। इस उपपरियोजना के विकासशील किसानों में से एक किसान सुनील कुमार भी सब्जी उत्पादन करने वाले किसानों में से एक है। इस समय के दौरान किसान ने अपने एक बीघा क्षेत्र से अगेती फुल गोभी के उत्पादन से करीब 36 हजार रुपए की कुल आमदनी की है। इसके साथ ही किसान द्वारा 150 मशरूम बैग से करीब 3.75 क्विंटल मशरूम उत्पादन किया गया, जिससे उन्हें लगभग रुपए 170 प्रति किलो के दाम से करीब 62 हजार रुपए की कुल आमदनी हुई। इस उपपरियोजना में कुल 64 लाभार्थी परिवार हैं, जिनके लिए 20.57 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवाई गई है। रिपोर्टः कार्यालय संवाददाता, मंडी

भुंतर में आलू के दाम घटे, 45 रुपए में बिकने वाली फसल अब मार्केट में 15 रुपए किलो

रसोई में हर सब्जी के साथ पकने वाले आलू का नखरा अब शांत होने लगा है। पिछले माह तक 40-45 रुपए प्रति किलो में बिकने वाला और गृहिणियों को परेशान करने वाला आलू अब बाजार में 15 रुपए प्रति किलो पर पहुंच गया है। इसके अलावा पंजाब, हरियाणा जैसी बाहरी राज्यों से जिला में आने वाला हरा मटर भी 30 रुपए प्रति किलो में मिलने लगा है और प्याज भी इसी कीमत पर मिल रहा है। लिहाजा, गृहिणियों को सर्दी के मौसम में बड़ी राहत मिलने लगी है। जानकारी के अनुसार कोरोना संक्रमण के संकट के बहाने जिला कुल्लू में लोगों की रसोई की महक को फीका करने वाली सब्जियां अब राहत देने लगी है। पिछले माह के अंत तक गृहिणियों के लिए रसोई में ताजा सब्जी की जो रैसिपी बनानी मुश्किल हो रही थी, उसमें अब मार्केट से अच्छी खबर आने लगी है। जानकारी के अनुसार मार्केट में मटर अब 30 रुपए प्रति किलो में मिल रहा है तो फूलगोभी 15 व बंदगोभी दस रुपए प्रति किलो पहुंच गई है। इसके अलावा शिमला मिर्च 40 रुपए, गाजर 16 रुपए, बैंगन 16 रुपए, पालक दस रुपए, घीया 20 रुपए, मशरूम पैकेट 20 रुपए, भिंडी 60 रुपए, मूली 15 रुपए व धनिया 25 रुपए प्रति किलो की दर में मिल रहा है। सबसे ज्यादा राहत आलू व प्याज से मिली है। आलू के दाम एक माह में 25 रुपए कम होकर 16 रुपए और प्याज के दाम 15 रुपए गिरकर 30 रुपए प्रति किलो हो गए हैं।                                                                         रिपोर्टः स्टाफ रिपोर्टर, भुंतर

सिरमौर और कांगड़ा में अब भी बांस की टोकरियां दे रहीं रोजगार

हिमाचल में आज से 15 साल पहले बांस की टोकरियों और किलटों का खूब क्रेज था। वक्त के साथ सब खत्म हो गया,लेकिन कुछ इलाकों में अब भी यह परंपरा कायम है

प्रदेश के सिरमौर और कांगड़ा जिलों में अब भी बांस से बनी टोकरियों का क्रेज है, वहीं बांस के किलटे भी अभी तक इन जिलों के गांवों बन रहे हैं। इन टोकरियों का  अलग-अलग डिजाइन होता है। किसी में रोटी डाली जाती है, तो किसी में चावल। किलटों में गोबर के अलावा खेती के अन्य उत्पाद होते हैं। सिरमौर जिला में मुख्यतः संगड़ाह, शिलाई क्षेत्रों में आज भी बांस से बना सामान कई लोगों की आजीविका का साधन है। खास बात यह कि बांस से सामान बनाने के दौरान इसके तीखे तिनके कारीगरों को जख्मी भी कर देते हैं, लेकिन वे इस परंपरा को बचाने की खातिर अब भी जुटे हुए हैं। कारीगरों ने बताया कि वे इस सामान को किसानों को बेचते हैं, लेकिन आज दिन तक सरकार या उसके किसी विभाग ने उनकी सुध नहीं ली। इन कारीगरों ने अपनी माटी के जरिए प्रदेश की जयराम सरकार से गुहार लगाई है कि उनकी भी सुध ली जाए।

रिपोर्टः निजी संवाददाता, नौहराधार

ऐसे लगाएं नींबू का बागीचा

हिमाचल प्रदेश के आठ जिला जो गर्म क्षेत्र हैं, वहां पर नींबू वर्गीय फलों की खेती के बारे में नौणी विवि के वैज्ञानिक द्वारा किसानों को जागरूक किया गया। उन्होंने कहा कि बागीचा लगाने के दौरान तीन भाग होते हैं, जिसमें बीज, भूमि व पानी शामिल हैं। अगर इन तीनों में से कोई भी एक न हो तो खेती असफल होती है। इसके साथ ही वातावरण भी प्रतिकूल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नींबू प्रजाति के लिए सैंडीलोम भूमि की जरूरत है। इस तरह की भूमि में नमी बनी रहती है। नई टैक्नॉलजी के हिसाब से रखी गई सपेसिंग के बीच में बीज लगाना चाहिए।  रिपोर्टः निजी संवाददाता, नौणी

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