गुरु की भक्ति

By: Feb 27th, 2021 12:20 am

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

हम लोग तो ज्योति के तन्य हैं। उनका इस प्रकार प्रत्युत्तर सुनकर मैं समझ गया कि स्वामी जी उक्त ग्रंथ निर्दिष्ट इन प्राथमिक साधन सोपानों को पार कर साधना राज्य की कितनी उच्च भूमि में पहुंच गए हैं। हम लोग यह विशेष रूप से देखते थे कि संसार की अत्यंत सामान्य घटनाएं भी उनकी तीक्ष्ण दृष्टि को धोखा नहीं दे सकती थीं। वे उन घटनाओं की सहायता से उच्च धर्म भाव का प्रचार करने की चेष्टा करते थे। श्री रामकृष्णदेव के भतीजे श्रीयुत रामलाल चट्टोपध्याय दक्षिणेश्वर से एक दिन स्वामी जी से मिलने आए। स्वामी जी ने एक कुर्सी मंगवाई उनसे बैठने के लिए कहा और स्वयं टहलने लगे। श्रद्धाविनम्र दादा इससे कुछ संकुचित होकर कहने लगे, आप बैठें, आप बैठें, पर स्वामी जी उन्हें किसी तरह छोड़ने वाले नहीं थे। बहुत कह सुनकर दादा को कुर्सी पर बिठाया और स्वयं टहलते-टहलते कहने लगे गुरुवत मैंने देखा इतना ऐश्वर्य, इतना मान-सम्मान पाकर भी हमारे स्वामी को थोड़ा सा भी अभिमान नहीं हुआ।  यह भी समझा कि गुरु भक्ति इसी तरह से की जाती है। स्वामी जी के घर के पास ही हम लोगों का घर था। एक मुहल्ले के लड़के होने के कारण हम लोगों ने बचपन में उनके साथ कितने ही खेल खेले थे। उसके बाद उनके जीवन और हम लोगों के बीच में कितना अंतर हो गया। कितने दिन, कितने वर्ष उनके दर्शन नहीं हुए हैं।

 सुनता हूं वे संन्यासी हो गए हैं और देश-विदेश भ्रमण करते रहते हैं। बचपन से ही उनके ऊपर मेरी कुछ विशेष आस्था थी। इसलिए बड़े होने पर भी उनको एक दिन के लिए भी नहीं भूला। मेरा पक्का विश्वास था कि वे एक दिन बहुत बड़े आदमी होंगे। किंतु संन्यासी होकर इस प्रकार जगत के पूज्य हो जाएंगे, इसे भला किसने सोचा था। उसके बाद वे अमरीका गए। शिकागो की धर्मसभा तथा अमरीका के अन्यान्य स्थानों में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनका सारांश थोड़ा संवाद पत्रों में देखने लगा। उनके व्याख्यान का थोड़ा सा विवरण मिलता था, उसी से मैं आश्चर्यचकित हो जाता था। सोचा आग कभी भी कपड़े से ढांकी नहीं जा सकती। इतने दिनों के बाद स्वामी जी की यह शक्ति प्रज्वलित हो उठी थी। बचपन का वही पुण्य इतने दिनों बाद विकसित हुआ है। जितना ही उनकी अद्भुत बातों को संवाद पत्रों में पढ़ने लगा, उतना ही उस बाल्य बंधु को फिर से देखने के लिए मन व्याकुल हो उठा। एक दिन सुना वह मातृभूमि वापस आ रहे हैं। मद्रास में आकर उन्होंने ज्वलंत व ओजस्वी व्याख्यान दिया। उस व्याख्यान को पढ़कर हृदय आनंद से थिरक उठा। सोचा हिंदू धर्म के भीतर ऐसी वस्तु है और इस प्रकार सरलता से धर्म बोधगम्य हो सकता है। इनकी कैसी अद्भुत शक्ति है। ये मुनष्य हैं या देवता?

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