आत्मा के कारण

By: Feb 27th, 2021 12:20 am

बाबा हरदेव

इस आत्मा के कारण ही इस शरीर का चलना फिरना है, यही जीवन है। इसी की वास्तव में हमने पहचान करनी है कि हम यह शरीर नहीं, बल्कि एक आत्मा हैं। आत्मा की ही महत्ता है। अगर परमात्मा को हमने पाया नहीं और सभी काम हम करते रहे, शरीर को सजाते रहे, शृंगारते रहे, इसको हृष्ट-पुष्ट करते रहे, लेकिन इस आत्मा का हमने कुछ नहीं किया, इस मन को हमने प्रभु के साथ नहीं जोड़ा तो हमारा इस संसार में आना व्यर्थ ही चला जाएगा। तभी तो महापुरुषों ने कहा है।

रैणि गवाई सोई कै दिवसु गवाइआ खाइ।

हीरे जैसा जन्मु है कउड़ी बदले जाइ।।

ये हीरे जैसा अमोलक जन्म भी कौडि़यों के भाव चला जाता है। महापुरुषों ने जो भी इस प्रभु के बारे में कहा है, इस पर हमें विचार करना है। इसे अपनाना है। परमात्मा का केवल नाम ही नहीं लेना है। जैसे कुछ तोते कहीं से सीख गए कि शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, हमें फंसाना चाहेगा, हम नहीं फसेंगे। ऐसी बातें वे बोलते थे, तो शिकारी ने समझा कि मैं तो इनको अब नहीं पकड़ पाऊंगा। शिकारी बहुत उदास हो गया। सोचने लगा कि तोते बेचकर ही तो मैं अपने परिवार का गुजारा करता हूं, परंतु अब तो ये समझ गए हैं, अब मैं भूखा मरूंगा। वह उदास होकर बैठ गया। जब शाम होने लगी, तो उसने सोचा कि मेरे पास जाल भी है, मेरे पास दाने भी हैं, मैं बिछाकर तो देखूं।

उसने जाल बिछा दिया और दाने वहां बिखेर दिए। तोते आए और जाल के ऊपर बैठ गए और दाने चुगने लगे। वो तब भी यही बोल रहे थे कि शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, हमें फंसाना चाहेगा, हम नहीं फसेंगे। शिकारी ने उन सभी को लपेट अपने कंधे पर रख लिया। बाजार में बेचने के लिए जा रहा था। फिर भी तोते यही कहे जा रहे थे। कहने का भाव है कि तोतों ने उस सुनी सुनाई बात को रट लिया, उसको बोलना तो शुरू कर दिया, लेकिन उसके मायने नहीं जानते थे। उसका मतलब नहीं जानते थे। उसका अर्थ नहीं समझ रहे थे कि क्या कहा जा रहा था? इसी तरह से प्रभु परमात्मा के बारे में हम अज्ञानता में हैं, तो हमारा काम नहीं बन सकता। हम आवागमन के चक्कर से तभी छुटकारा पा सकते हैं, जब हम इस परम पदार्थ को जान लें।

 जिस परमात्मा का हम नाम लेते हैं, जिसके बारे में हम सुनते हैं कि इस परमात्मा के साथ नाता जुड़ने से हम यम की मार से छूट सकते हैं,हम आवामगन के बंधन से छुटकारा प्राप्त कर सकते हैं। अगर प्रभु की केवल बातें ही कीं, इसकी सार को नहीं जाना, सहज अवस्था को प्राप्त नहीं किया, तो हमारा कुछ भी बनने वाला नहीं। राम-राम कहने मात्र से कोई लाभ नहीं होने वाला, जब तक हम राम की पहचान न कर सकें। साबुन और जल की चर्चा करने से क्या मैला कपड़ा धुल जाएगा? मैला कपड़ा मैला ही रहेगा, जब तक पानी की संगति नहीं होती। इसी तरह से इस निर्मल सत्ता के साथ जब तक हमारा नाता नहीं जुड़ता, तब तक हमारा यह मन भी निर्मल होने वाला नहीं। उतनी देर हमारे भ्रम भी दूर होने वाले नहीं और ये आवागमन का बंधन भी समाप्त होने वाला नहीं।

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