श्री ललिता जयंती

By: Feb 27th, 2021 12:25 am

मां ललिता दस महाविद्याओं में से एक हैं। ललिता जयंती का व्रत भक्तजनों के लिए बहुत ही फलदायक होता है। श्री ललिता जयंती इस बार 27 फरवरी को मनाई जा रही है। भक्तों में मान्यता है कि यदि कोई इस दिन मां ललिता देवी की पूजा भक्तिभाव सहित करता है, तो उसे देवी मां की कृपा अवश्य प्राप्त होती है और जीवन में हमेशा सुख शांति एवं समृद्धि बनी रहती है। मां ललिता मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। पुराणों के अनुसार आदिशक्ति त्रिपुर सुंदरी जगत जननी ललिता माता के मंदिर में दर्शनों एवं पूजन हेतु हजारों श्रद्धालु यहां आते हैं।

श्री ललिता जयंती कथा- देवी ललिता आदि शक्ति का वर्णन देवी पुराण में प्राप्त होता है। जिसके अनुसार पिता दक्ष द्वारा अपमान से आहत होकर जब दक्ष पुत्री सती ने अपने प्राण उत्सर्ग कर दिए, तो सती के वियोग में भगवान शिव उनका पार्थिव शव अपने कंधों में उठाए चारों दिशाओं में घूमने लगते हैं। इस महाविपत्ति को देख भगवान विष्णु चक्र द्वारा सती के शव को 108 भागों में विभाजित कर देते हैं। इस प्रकार शव के टूकडे़ होने पर सती के शव के अंश जहां गिरे, वहीं शक्तिपीठ की स्थापना हुई। उसी में एक मां ललिता का स्थान भी है। भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर सती नैमिष में लिंगधारिणी नाम से विख्यात हुईं इन्हें ललिता देवी के नाम से पुकारा जाने लगा। एक अन्य कथा अनुसार ललिता देवी का प्रादुर्भाव तब होता है जब ब्रह्मा जी द्वारा छोड़े गए चक्र से पाताल समाप्त होने लगा। इस स्थिति से विचलित होकर ऋषि-मुनि भी घबरा जाते हैं और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगती है। तब सभी ऋषि माता ललिता देवी की उपासना करने लगते हैं। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी प्रकट होती है तथा इस विनाशकारी चक्र को थाम लेती है। सृष्टि पुनःनवजीवन को पाती है।

श्री ललिता जयंती महत्त्व – माता ललिता जयंती के उपलक्ष्य पर अनेक जगहों भव्य मेलों का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु श्रद्धा और हर्षोल्लासपूर्वक भाग लेते हैं। मां ललिता देवी मंदिर में हमेशा ही भक्तों का तांता लगा रहता है, परंतु जयंती के अवसर पर मां की पूजा-आराधना का कुछ विशेष ही महत्त्व होता है। यह पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यतानुसार इस दिन देवी ललिता भांडा नामक राक्षस को मारने के लिए अवतार लेती हैं। राक्षस भांडा कामदेव के शरीर की राख से उत्पन्न होता है। इस दिन भक्तगण षोडषोपचार विधि से मां ललिता का पूजन करते है। इस दिन मां ललिता के साथ-साथ स्कंदमाता और शिव शंकर की भी शास्त्रानुसार पूजा की जाती है।

श्री ललिता पूजा-अर्चना – शक्तिस्वरूपा देवी ललिता को समर्पित ललिता जयंती आश्विन मास के शुक्ल पक्ष को पांचवें नवरात्र के दिन मनाई जाती है। इस शुभ दिन भक्तगण व्रत एवं उपवास का पालन करते हैं यह दिन ललिता जयंती व्रत के नाम से जाना जाता है। देवी ललिता जी का ध्यान रूप बहुत ही उज्ज्वल व प्रकाश मान है। माता की पूजा श्रद्धा एवं सच्चे मन से की जाती है। शुक्ल पक्ष के समय प्रातःकाल  माता की पूजा उपासना करनी चाहिए। कालिकापुराण के अनुसार देवी की दो भुजाएं हैं यह गौर वर्ण की, रक्तिम कमल पर विराजित हैं। ललिता देवी की पूजा से समृद्धि की प्राप्त होती है। दक्षिणमार्गी शाक्तों के मतानुसार देवी ललिता को चंडी का स्थान प्राप्त है।  इनकी पूजा पद्धति देवी चंडी के समान ही है तथा ललितोपाख्यान, ललिता सहस्रनाम, ललितात्रिशती का पाठ किया जाता है। दुर्गा का एक रूप भी ललिता के नाम से जाना गया है।

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