यत्र तत्र सर्वत्र गर्दभ

By: Mar 2nd, 2021 12:05 am

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

सुबह की सैर के दौरान मैंने पंडित जॉन अली से पूछा, ‘‘क्या काबुल में सचमुच गधे नहीं होते?’’ तो प्रत्युत्तर में नेता प्रति पक्ष की तरह वह प्रति प्रश्न उछालते हुए बोले, ‘क्या रात में अंधेरा नहीं होता?’ उनके आशय को समझने के बावजूद मैं विशुद्ध भारतीय चरित्र की तरह अपने हाथ-पांव पसारते हुए बोला, ‘‘पंडित जी, बेहतर हो यदि आप मेरे ़खाते में जवाब की सबसिडी डाल दें। पहले, जब सबसिडी लेने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटते थे तो हाथ-पांव हिल भी जाते थे। जब से ़खातों में सीधे सबसिडी आने और ऑनलाइन पेमेंट की सुविधा हो गई है; ज़रूरतें, आधी पूरी होने के बावजूद ऐसी हड्डहरामी हो गई है कि सरकार के ऊपर पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गए हैं।’’ पंडित जी दहाड़ते हुए बोले, ‘‘आत्मसम्मान भी कोई चीज़ है कि नहीं?’’ मैं बोला, ‘‘पंडित जी, कम से कम आमों को भी अपने सीज़न में पूरा सम्मान मिलता है। आम आदमी तो साल भर चूसे को, की तरह ज़मीन पर गिरा रहता है और पांच साल में तभी फूटता है जब चुनावों का बोर आना शुरू होता है।’’ मेरी बात सुनकर, जॉन अली रुआंसे होकर बोले, ‘‘मियां, कहते तो तुम सही हो। इधर, सारी उम्र सरकारी नौकरी करने के बाद भी पेंशन की कोई आस नहीं और उधर, कलुआ को देखो। एक बार एमएलए होने के बाद काली राम क्या हुए, ताउम्र पेंशन के ह़कदार हो गए।

 ़खैर, तुमने पूछा है कि क्या काबुल में गधे नहीं होते? तुम्हें पूछना चाहिए था कि गधे कहां नहीं होते? हर आदमी पैदा ही गधा होता है और ताउम्र अपनी ़ख्वाहिशों और ज़रूरतों का बोझ ढोते-ढोते तब तक गधा बना रहता है, जब तक उसे अपने गधा होने की ़खबर नहीं हो जाती। आगे बढ़ने से पहले मुझे महात्मा बुद्ध की एक छोटी सी कहानी याद आ रही है। जब महात्मा बुद्ध से किसी ने पूछा कि आत्म साक्षात्कार से उन्हें क्या हासिल हुआ? तो उन्होंने कहा कि हासिल क्या होना था? जो था, वह पहले ही प्राप्त था। बस अपने वास्तविक स्वरूप का पता चल गया। बंधु, आत्म साक्षात्कार और चुनावी साक्षात्कार में इतना ही ़फ़र्क है कि आत्म साक्षात्कार के बाद आदमी अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। जबकि हर पांच साल बाद लोकतंत्र में आयोजित होने वाले चुनावी साक्षात्कार में उसे इतना ही पता चलता है कि अगर वह चाहे तो आदमी हो सकता है।

 लेकिन चूंकि जन्मों से उसे गर्दभ बना रहने में ही आनंद की अनुभूति होती है, वह हर बार चुनावी झांसे में आने के बाद पुनः गर्दभत्व को प्राप्त होना पसंद करता है और पुनः अगले पांच सालों के लिए ऐसे आदमियों को अपनी पीठ सौंप देता है, जो फिर एक बार उसकी सवारी करते हुए अपनी सात पीढि़यों का बोझ उस पर लाद देते हैं। वह जिन प्रतिनिधियों को चुनता है, वे उसे पहनाते तो आश्वासनों का हरा चश्मा हैं लेकिन खिलाते सूखी घास हैं। चूंकि लोकतंत्र संख्या बल से चलता है। ऐसे में अर्ध घोषित गर्दभों के मतदान में शामिल होने से उनकी सवारी आसान हो जाती है। जो मनुष्य गर्दभ नहीं होना चाहते, वे अपने यूटोपिया के मैदान में चरते रहते हुए कहीं दूर निकल जाते हैं और स्वयं को बुद्धिजीवी कहलाने में गर्व महसूस करते हैं। लेकिन उनकी पीठ पर बोझ ढोने के घाव सा़फ नज़र आते हैं। हाल ही में एक देश के गधों के निर्यात से मालामाल होने की ़खबर आई है। इससे साबित होता है कि यत्र तत्र सर्वत्र गर्दभ।’’ पंडित जी इतना कहने के बाद कहीं गहरे खो गए और मैं अपनी पीठ पर बढ़ते भार को प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए हांफने लगा था।

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