आईसी इंजनों की निगरानी करेगा एल्गोरिदम, आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने तैयार की नई तकनीक

By: Apr 6th, 2021 12:06 am

कार्यालय संवाददाता— मंडी

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कमांद (मंडी) के शोधकर्ताओं ने बंगलूर के रॉबर्ट बॉश इंजीनियरिंग एंड बिजनेस सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक एल्गोरिथम का विकास किया है। यह वाहन के इंटर्नल कम्बशन (आईसी) इंजन के कार्यों की रीयल टाइम जानकारी देगा, ताकि उनके परिचालन को अधिक अनुकूल बनाकर अधिक से अधिक इंधन सक्षम बनाया जाए और न्यूनतम उत्सर्जन का लक्ष्य भी पूरा हो। आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ कम्प्यूटिंग एवं इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. तुषार जैन ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ सिस्टम्स साइंस, टेलर एंड फ्रांसिस में यह शोध कार्य प्रकाशित किया है। डा. जैन और उनकी रिसर्च स्कॉलर व्योमा सिंह के साथ बंगलूर के रॉबर्ट बॉश इंजीनियरिंग एंड बिजनेस सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के डाक्टर विरुपाक्ष पाल इस शोधपत्र के सह-लेखक हैं। आमतौर पर पूरी दुनिया के 99.8 प्रतिशत वाहन पेट्रोल और डीजल से चलते हैं और इस तरह दुनिया का करीब 10 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन करते हैं।

 हालांकि इनके विकल्प जैसे बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन (बीवी) और अर्न्य इंधन जैसे बायोफ्यूल और हाइड्रोजन का भी चलन हो रहा है, लेकिन उनका इस्तेमाल अक्सर पारंपरिक आई सी इंजनों के साथ होता है। इसलिए आईसी इंजन के डिजाइन का इस तरह अनुकूलन जरूरी है कि इंजन के पूरे लाइफस्पैन में यह सबसे अधिक ईंधन सक्षम हो और कम से कम उत्सर्जन करे। डा. जैन ने बताया, ‘इंजन के काम और वाहन के अंदर अन्य डिवाइस/सिस्टम के काम की रीयल-टाइम सटीक जानकारी आवश्यक है। इसके लिए हमें इंजन के कई महत्त्वपूर्ण मानकों पर सूचना चाहिए।  यदि सभी मानकों की सूचना मिलती रहे तो निरंतर निगरानी और आकलन से ड्राइवर के वाहन परिचालन में सुधार होगा, जैसे गियर सही से बदलना और इस तरह वाहन का प्रदर्शन बेहतर होगा। तकनीकी दृष्टिकोण से इंजन डिजाइन करना और उसका अनुकूल प्रदर्शन सुनिश्चित करना सिस्टम की स्थितियों और इंजन के मानकों की सटीक जानकारी पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए पेट्रोल इंजन में एयर फ्यूल रेशियो (एएफआर) 14.67 हो तो इंधन का संपूर्ण दहन (कंबशन) होगा और इसके परिणामस्वरूप न्यूनतम उत्सर्जन और अधिकतम पावर सुनिश्चित होगा। असेंबली लाइन से निकलने वाले नए वाहन इन मानकों को पूरा करते हैं, लेकिन पुराने होने पर परिचालन के मानक बदल जाते हैं और वाहन का परिचालन कम अनुकूल होता है।