चुनाव या त्योहार का मूड

By: Oct 11th, 2021 12:05 am

प्रदेश में कुल चार उपचुनावां की जुगत में राजनीतिक शास्त्र का समाज व अर्थशास्त्र से सीधा मुकाबला भी होगा। जीने-मरने की कसमों में सियासत के दर्पण आखिर ऐसा क्या दिखा पाएंगे, जिसे समाज का त्योहारी मूड कबूल करेगा या कोविड के कवच में फंसा रहा व्यापार उधर भी झांक पाएगा। बाजार अपनी खामोशियां तोड़ने की जंग में इतना उत्साहित है कि उपभोक्ता को बिना मास्क कबूल करके भूल रहा है कि अभी कोविड के खतरे टले नहीं। लंगर लगाकर बैठी राजनीति के लिए इज्जत का सवाल, कोविड संकट से बड़ा हो गया तो कहीं लेने के देने न पड़ जाएं। राजनीतिक तैयारियों के मंच पर सूचनाएं व संदेश थिरक रहे हैं, तो कार्यकर्ता के लिए अग्नि परीक्षा इस बात को लेकर रहेगी कि वह आखिर सत्ता का मसौदा बनता है या मुखौटा। उपचुनावों की ‘शेल्फ लाइफ’ और अगले चुनाव के अंतिम पहर में आखिर समर्थक किस आरजू की तरफदारी करे। उसे मालूम है कि इस बार कोई चांद तोड़ने की सौगंध खा ले, तो भी राजनीतिक खिचड़ी का स्वाद नहीं आएगा। त्योहारों की कूक में ये चार उपचुनाव सत्ता के व्यापार का कितना उद्घोष करेंगे या विपक्ष की सामग्री में भविष्य के मुहावरे कितने गुनगुनाए जाते हैं, यह नवरात्रि के दौरान मापे जा रहे शुभमुहूर्त भी नहीं बता पाएंगे। जनता के सामने उपचुनाव की कसौटियां भी क्या त्योहार बन जाएंगी या पिछले वादों के घाव उभर आएंगे। सत्ता के समक्ष उपचुनाव की कड़ी परीक्षा किसी उपवास से कम नहीं, क्योंकि इस बार मतदाता सीधे ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है।

 वह चाहता है कि नवरात्रि से दिवाली तक उसकी सारी प्रार्थनाएं फलीभूत हों और पिछला सारा शैतानी दौर खत्म हो जाए। कोविड काल के मध्य से गुजरते हर नागरिक के लिए इस बार नवरात्रि से दिवाली तक की मन्नतें, अच्छे दिनांे की फरमाइश करती हैं। यह अलग तरह के ‘अच्छे दिनों’ की कामना है जो सर्वप्रथम यह चाहती है कि इस बार आंगन नकारात्मक सूचनाओं से न भर जाए, बल्कि बेरोजगार हुआ उनका बेटा पुनः बड़े शहर में लौटकर आत्मनिर्भर हो जाए। कोई मां चाहेगी कि इस बार दिवाली का दीया पुराने सारे अंधेरे दूर कर यह संदेश ले आए कि घर में दो सालों से बचपन और स्कूल के बीच अटके छोटे बच्चे फिर से शिक्षक के करीब पहुंच जाएं। ये अच्छे दिन सिर्फ लौटने की प्रतीक्षा में यह चाहते हैं कि तमाम बुरी सूचनाएं बंद हो जाएं, भले ही रसोई गैस का सिलेंडर हजार रुपए और पेट्रोल के दाम प्रति लीटर सौ से ऊपर हो जाएं। यानी महंगाई की बातें अब पुरानी हो गईं, लोकतांत्रिक परिचर्चाएं गौण हो गईं तथा राजनीतिक विचारधारा अब व्यक्तिवाद में सिमट गई। ऐसे में अगर व्यक्तिवाद ही राजनीतिक पार्टियांे का मुखौटा हैं, तो देखना यह होगा कि बड़े पोस्टर पर कौन सा अवतार चल निकलता है।

 हिमाचल में हर प्रधानमंत्री के नाम पर सत्तारूढ़ दल चमकते रहे हैं, तो क्या सबसे बड़ी बाजी में फिर नरेंद्र मोदी उतर आएंगे या इस मुकाबले में भी कांग्रेस के सामने पार्टी आलाकमान की चिंताएं कब्र बन जाएंगी। जो भी हो नागरिक अपनी हस्ती को बचाने के लिए अभी दुआएं मांग रहा है, जबकि राजनीति अपने सफर में सत्ता मांग रही है। अगर चारों सीटें भाजपा ले जाए, तो वर्तमान सत्ता के अति सुरक्षित घर में कई चेहरे आबाद होंगे, वरना ये उपचुनाव ऊंच-नीच की पायदान जैसी स्थिति में भाजपा के कई नेताओं के लिए कलिष्टकारी अध्याय भी लिख सकते हैं। चुनावी टिकट में अछूत घोषित हुए नेताओं का आक्रोश पार्टी की मांसपेशियां ढीली कर सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस के चौबारे पर उपचुनावों की कोयल कूक रही है। आगे के सफर में जो मिल जाए पार्टी को पर्याप्त बना देगा, लेकिन कुछ बड़ा कर दिखाया तो कांग्रेस की चर्चा बदल जाएगी।

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