प्रकांड पंडित का पुतला दहन कितना जायज

श्रीराम ने अपने पूर्वजों का आदेश मानकर संपूर्ण वैभव व राजपाट त्याग कर आदर्श चरित्र स्थापित किया था। विजयदशमी के अवसर पर मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के उच्च चरित्र तथा समर्पण, सत्य व त्याग जैसे गुणों को अपनाने की जरूरत है। मगर ब्रह्म के वंशज प्रकांड पंडित रावण का पुतला दहन कितना जायज है, इस पर भी विचार होना चाहिए…

इतिहास साक्षी है कि त्रेतायुग में नारी अस्मिता व स्वाभिमान की रक्षा के लिए रघुकुल श्रेष्ठ क्षत्रिय शिरोमणि प्रभु श्रीराम ने अपने ‘कोदंड’ नामक धनुष की आग उगलती बाण वर्षा से स्वर्णपुरी लंका का दहन करके लंका के आसमान में रघुवंश की पताका फहरा दी थी। सनातन संस्कृति में हजारों वर्षों से ‘विजयदशमी’ उत्सव श्रीराम की उसी लंका विजय का प्रतीक एक स्मृति पर्व के रूप में मनाया जाता है। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी के दिन धर्म की अधर्म पर व दुराचार पर सदाचार की विजय के पर्व विजयदशमी को भारत सहित कई अन्य देशों में रावण का पुतला दहन करके हर्षोल्लास से मनाया जाता है। शक्ति के उत्सव दशहरा पर्व पर शूरवीरता संस्कृति के परिचायक राजपूत समाज व भारतीय सैन्य बलों में शस्त्र पूजन का विधान भी है, निःसंदेह ‘महर्षि पुलस्त्य’ का पौत्र व ‘विश्रवा ऋषि’ का पुत्र तथा वास्तुशास्त्र के ज्ञाता श्रेष्ठ शिल्पी ‘मयासुर’ का दामाद लंकाधिपति रावण शिव भक्त, प्रकांड पंडित, शस्त्र व शास्त्र का प्रखर ज्ञाता था। बेशक दशहरा दिवस के आयोजन पर दशानन को अहंकार व बुराई का प्रतीक मानकर उसका पुतला जलाया जाता है, लेकिन भारत में कई जगहों पर परम शिवभक्त रावण के पुतला दहन की प्रथा नहीं है। इनमें हिमाचल प्रदेश में स्थित प्रसिद्ध ‘बैजनाथ’ शिवधाम भी शामिल है।

 रावण की शिवभक्ति के सम्मान में देश के कई हिस्सों में सदियों से लंका नरेश की पूजा अर्चना की परंपरा भी है। नोएडा के नजदीक ‘विसरख’ कस्बे को रावण का पैतृक गांव तथा मध्य प्रदेश में ‘मंदसौर’ क्षेत्र को रावण का ससुराल माना जाता है। कर्नाटक में मंड्या जिले के ‘मालवल्ली’ व ‘कोलार’ तथा आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में रावण के मंदिर मौजूद हैं। वहीं कानपुर के शिवाला स्थित कैलाश मंदिर में दशहरा पर्व पर रावण की पूजा होती है। उज्जैन के ‘चिखली’ व जोधपुर के ‘मंडोक’ क्षेत्र तथा श्रीलंका में त्रिंकोमाली के ‘कोणेश्वरम’ महादेव मंदिर में महाज्ञानी रावण आज भी पूजनीय है, लेकिन 4 वेद, 6 शास्त्र, 18 पुराण के महाज्ञाता व सामवेद के मर्मज्ञ रावण की शिवभक्ति के पद्चिन्ह देवभूमि हिमाचल के पहाड़ों में आज भी मौजूद हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग में अमरत्व के वरदान की प्राप्ति तथा सम्पूर्ण असुर जाति के उद्धार के लिए लंका नरेश ने घोर तप करने के बाद भगवान शिव के निर्देश पर स्वर्गलोक के लिए एक रात में जिन पांच पौडि़यों का निर्माण शुरू किया था उनमें तीन पौडि़यां हिमाचल में निर्मित हुई थीं। मान्यता है कि हरिद्वार में ‘हर की पौड़ी’ रावण का पहला निर्माण कार्य था। सिरमौर जिले में लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र ‘स्वर्ग की दूसरी पौड़ी’ के नाम से विख्यात ‘पौड़ीवाला शिवधाम’ दूसरा व ‘चुडे़श्वर महादेव’ में तीसरा तथा किन्नौर के ‘किन्नर कैलाश’ पर्वत पर रावण ने चौथी सीढ़ी निर्मित की थी। पांचवीं सीढ़ी का निर्माण अधूरा रहने से अमरत्व का वरदान भी अधूरा रह गया था।

 रणभूमि में मृत्यु शैय्या पर पडे़ रावण ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में लक्ष्मण को इस बात का ज्ञान दिया था कि शुभ कार्य में कभी विलंब नहीं करना चाहिए। महादेव का अनन्य भक्त रावण ‘अर्क प्रकाश’ पुस्तक सहित कई अन्य ग्रंथों तथा ‘शिव तांडव श्रोत्र’ का भी रचयिता था। महादेव द्वारा प्रदान ‘चंद्रहास खड्ग’ से सुसज्जित योद्धा रावण अपने असाधारण ज्ञान व अत्यंत बल से ग्रह नक्षत्रों की चाल बदलने में भी माहिर था। तांत्रिक साधनाओं, योग, वास्त्रुशास्त्र, ज्योतिष, राजनीति, कूटनीति, संगीत, कर्मकांड, उपनिषद, संस्कृत का विद्वान व आयुर्वेद का ज्ञाता रावण तमाम मायावी युद्ध विद्याओं में पारंगत था। मगर महापराक्रमी रावण ने अपनी कठोर तपस्या व कड़ी मेहनत के दम पर अर्जित की गई शक्तियों का दुरुपयोग करके अधर्म की नाव पर सवार होकर सीता जी के हरण की भयंकर भूल करके अपने पूरे कुनबे को युद्ध की ज्वाला में झोंक कर खुद अपने विनाश की पटकथा लिख डाली थी। साथ ही विश्वकर्मा द्वारा निर्मित स्वर्णपुरी लंका की आहुति भी दे डाली थी, लेकिन श्रीराम के बाणों का लक्ष्य बनकर रणक्षेत्र में धराशायी हुए रावण को श्रीराम ने महाविद्वान बताकर लक्ष्मण को रावण के पैरों की तरफ खडे़ होकर राजधर्म का ज्ञान लेने का आदेश दिया था जो कि रावण के महाज्ञानी होने का प्रमाण है। रावण वध के बाद श्रीराम को ‘महर्षि अथर्वा’ जैसे कई ऋषिगणों तथा अपने राजपुरोहितों के अनुरोध पर ब्रह्म हत्या से पापमुक्ति के लिए प्रायश्चित तप करना पड़ा था।

 स्मरण रहे चारों वेदों के एकमात्र परमज्ञानी रावण ने कई धार्मिक स्थल व शिवलिंग स्थापित किए थे। दुर्भाग्य से भारत में उस महापंडित का पुतला दहन किया जाता है, लेकिन जिन विदेशी आक्रांताओं ने भारत में आस्था के प्रतीक हजारों वर्ष पुराने धार्मिक स्थलों को नेस्तानाबूद करके लाखों लोगों की हत्याएं व धर्मांतरण करके सनातन संस्कृति को दूषित किया, नालंदा जैसे जगत प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्रों तथा वहां के पुस्तकालयों में मौजूद वैदिक ज्ञान संपदा की लाखों किताबों को आग के हवाले करके वहां के आचार्यों की हत्याएं की थी, उन विदेशी लुटेरों के नाम आज भी देश की सड़कों व रेलवे स्टेशनों पर अंकित हैं। उन लुटेरों का इतिहास रुखसत करके शिक्षा पाठ्यक्रमों में प्रभु श्रीराम का आदर्श चरित्र व भारत की पुरातन संस्कृति का गौरवशाली इतिहास शामिल होना चाहिए। अतः प्रतिवर्ष दशहरा पर्व के अवसर पर श्रीराम का किरदार अदा करके रावण का पुतला दहन करने वालों को समझना होगा कि मौजूदा दौर में राष्ट्र के समक्ष बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, आरक्षण, नशाखोरी जैसी समस्याओं के साथ मजहबी उन्माद जैसी नकारात्मक सोच का दहन करने की जरूरत है। रावण को उसके अपराध का दंड देने तथा तीनों लोकों में उसकी शक्तिशाली सेना का विध्वंस करके दशानन के पूरे कुनबे की मुक्ति का मार्ग सुनिश्चित करने की क्षमता श्रीराम में ही थी। श्रीराम ने अपने पूर्वजों का आदेश मानकर संपूर्ण वैभव व राजपाट त्याग कर आदर्श चरित्र स्थापित किया था। विजयदशमी के अवसर पर मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के उच्च चरित्र तथा समर्पण, सत्य व त्याग जैसे गुणों को अपनाने की जरूरत है। मगर ब्रह्म के वंशज प्रकांड पंडित रावण का पुतला दहन कितना जायज है, इस पर भी विचार होना चाहिए।

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक बिलासपुर से हैं

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