भारत में भुखमरी!

By: Oct 18th, 2021 12:05 am

क्या भारत में भुखमरी है? क्या निःशुल्क खाद्यान्न बांटने और देश में खाद्य सुरक्षा कानून होने के बावजूद भारत में लोग भूखे सोते हैं? क्या देश के बचपन की नई पीढ़ी अविकसित और बौनी-सी पैदा हो रही है? क्या उनमें खून की कमी है, नतीजतन वे अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं? ये सवाल हमें चौंकाते हैं, क्योंकि कोरोना-काल में भी प्रधानमंत्री मोदी और अन्य सरकारी नेता दावा करते रहे कि किसी को भूखा नहीं सोने दिया गया। तभी प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की शुरुआत की गई, जो फिलहाल दिवाली तक चलेगी। हमें याद आता है कि 2011 में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी की थी कि गोदामों और तंबुओं में अन्न सड़ रहा है। कीड़े और चूहे उसे खा रहे हैं और देश में करोड़ों लोग भूखे हैं। कमोबेश सरकार उस अन्न को गरीबों में बांट दे। आज भी लगभग वही स्थिति है। भारत में खाद्यान्न की फसलें लहलहा कर उग रही हैं। भंडारण में अनाज लबालब भरा है, लेकिन वैश्विक भूख सूचकांक की दृष्टि से भारत का स्थान 116 देशों में 101वां है। इससे पहले 2020 में भी हम 94वें स्थान पर थे। आश्चर्य है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार सरीखे हमारे पड़ोसी देशों की स्थिति बेहतर है, जबकि आर्थिक और कृषि, चिकित्सा और बाल-विकास के मद्देनजर ये देश भारत की तुलना में बेहद पिछड़े हैं।

 हैरानी होती है कि हमारे पड़ोसी देशों-श्रीलंका, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल-में कोरोना वायरस के जानलेवा प्रभाव नहीं पड़े हैं। वहां कोरोना के कारण लोगों की नौकरियां अपेक्षाकृत सुरक्षित रही हैं। व्यापार में अपेक्षाकृत नुकसान नहीं हुए हैं, लिहाजा आमदनी के स्तर में कमी नहीं हुई है। कुपोषित आबादी के संदर्भ में ये देश अपनी स्थिति सुधारने में सफल रहे हैं। दरअसल ऐसा विश्लेषण कैसे संभव है? भारत की तुलना में इन देशों की अर्थव्यवस्था बेहद गौण है, लेकिन यह गैलप और फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) के सर्वे का ही सारांश है। एफएओ संयुक्त राष्ट्र संघ की विशेषज्ञ एजेंसियों में से एक है। इसकी स्थापना 1945 में कृषि उत्पादकता और ग्रामीण आबादी के जीवन-निर्वाह की स्थिति में सुधार करते हुए पोषण तथा जीवन-स्तर को उन्नत बनाने के मकसद से की गई थी। अमरीकी संगठन गैलप भी दुनिया भर में सर्वेक्षण और विश्लेषण करके अपनी रपटें तैयार करता है। उन रपटों को विश्वसनीय भी माना जाता है। भूख सूचकांक वाला सर्वे फोन पर ही चार सवाल पूछकर किया गया है, लिहाजा भारत सरकार ने ऐसी प्रविधि को ‘अवैज्ञानिक’ करार दिया है और सर्वे को सिरे से खारिज कर दिया है। बहरहाल कुपोषण भुखमरी का एक बुनियादी कारक है। भारत में कुपोषण की स्थिति आज भी भयानक है। खुद केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का मानना है कि देश में करीब 9.30 लाख बच्चे आज भी कुपोषित हैं।

 कई दूरदराज के क्षेत्र ऐसे हैं, जहां अस्पताल की व्यवस्था नहीं है। बच्चे कुपोषित ही जन्म लेते हैं। उनमें से ज्यादातर की मौत भी हो जाती है। ऐसा भी नहीं है कि सरकारें बिल्कुल ही निष्क्रिय हैं। गांव के पंच-सरपंच, आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के जरिए कुपोषित बच्चों पर निगाह रखी जाती है। नाजुक मामलों में ऐसे बच्चों को, माता-पिता समेत, अस्पताल में कुछ दिनों के लिए भर्ती किया जाता है। इलाज, भोजन के साथ-साथ कुछ भत्ता भी दिया जाता है, लेकिन कुपोषण पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है, क्योंकि भारत में अकाल बहुत पड़ते रहे हैं। हालांकि शिशु और मां मृत्युदर में बहुत कमी आई है, लेकिन भारत में कुपोषण है, क्योंकि भुखमरी है। एक आकलन के मुताबिक, एक-तिहाई भोजन बर्बाद हो जाता है। घर, बाज़ार, ढाबे, विभिन्न आयोजनों और समारोहों में भोजन बेकार फेंक दिया जाता है। यदि यह ही किसी पेट तक पहुंच सके, तो कुपोषण को पराजित किया जा सकता है। हालांकि इस स्तर पर अब कुछ गैर-सरकारी संगठन व्यापक रूप से काम कर रहे हैं और बर्बाद होने के बजाय भोजन इकट्ठा करते हैं तथा भूखे पेट तक उसकी आपूर्ति करते हैं, लेकिन पुरानी बीमारी है, लिहाजा ठीक होने में वक्त जरूर लगेगा। यूनिसेफ का भी विश्लेषण है कि भारत में कुपोषण का आंकड़ा 10 लाख से भी ज्यादा है। इस तरह भुखमरी और कुपोषण दोनों ही पूरक यथार्थ हैं। विदेशी रपटों को नकारने से सच्चाई को दबाया नहीं जा सकता। सरकार असलियत कबूल करे और भविष्य के लिए योजनाओं का मूल्यांकन करे। ऐसा करना ही सही होगा।

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