दीये की लौ में, नंगे पांव पढ़ाई कर अमरीका में चमकाया नाम

By: Dec 3rd, 2021 12:08 am

राजीव सूद — नगरोटा बगवां

‘कर खुद पे यकीन इतना कि बुलंद हो तेरा हौसला, हर कदम पे तुझे कामयाबी मिले और तू लिखे सफलता की दास्तां’। दीये की लौ में पढ़ाई कर, नंगे पांव स्कूल का सफर तय कर, मुफलिसी के साये में भैंसे चराकर परिवार को सहयोग देने वाले साधारण अशिक्षित परिवार का कोई व्यक्ति विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका में स्वयं को स्थापित कर कइयों के लिए आदर्श बन जाता है, तो उसकी सराहना तो  होगी ही। साथ ही समूचे क्षेत्र का गौरवान्वित होना भी स्वाभाविक ही है। नगरोटा बगवां के छोटे से गांव कोठियां में 1954 में जन्मे डा. चमन सोहल का नाम नगरोटा बगवां में बड़े अदब और एक प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में लिया जाता है। क्षेत्र में बुद्धिजीवी वर्ग की शायद ही कोई महफिल हो, जहां डा. सोहल का नाम न लिया जाता हो । बचपन में भैंस चराने से पूरी तरह ऊब चुके बाल मन पर अपनी दादी से नसीहत में मिले शब्द जीवन की दिशा ही निर्धारित कर देंगे, इतना तो किसी ने सोचा भी नहीं था, लेकिन आत्मविश्वास और दृढ निश्चय का नतीजा यह हुआ कि चमन लाल से डा. चमन सोहल बन कर वह न केवल अमरीका में जाकर कार्डियोलोजिस्ट बन गए, बल्कि  वर्ष 2001 से 2009 तक अमरीका के 43वें राष्ट्रपति रहे जॉर्ज बुश की सर्जरी टीम का हिस्सा बनकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में भी कामयाबी हासिल की। डा. सोहेल ने अपने बौद्धिक कौशल, परिश्रम और लगन का पहला नमूना उस समय प्रस्तुत किया  जब गांव के ही प्राइमरी स्कूल में शिक्षा शुरू करने के बाद वर्ष 1971 में नगरोटा बगवां के सरकारी स्कूल से मैट्रिक परीक्षा मैरिट में उत्तीर्ण की, तो नगरोटा बगवां ने अपने होनहार बालक को कंधों पर उठा कर शहर में घुमाया और असाधारण प्रतिभा को दिल से सलाम किया।

 अपने चाहने वालों के आर्थिक सहयोग से उन्होंने जहां चंडीगढ़ के निजी संस्थान से प्रेप और प्री मेडिकल किया, वहीं तत्कालीन स्नोडन संस्थान शिमला से एमबीबीएस भी टॉपर की श्रेणी में उत्तीर्ण कर विशेषज्ञ शिक्षा के लिए अमरीका का रास्ता भी तय कर लिया, जिसका स्वप्न नवमी कक्षा में रहते हुए ही दिन के उजाले में देख लिया था। अपने प्रवास पर पैतृक गांव आए डा. सोहल ने ‘दिव्य हिमाचल’ से खास बातचीत में सफलता का श्रेय अपनी दादी से मिली नसीहत, गुरुजनों के शिष्य के प्रति समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा के साथ अपने आत्मविशास को देते हुए जहां उन्होंने परिश्रम को सफलता का मूल मंत्र बताया, वहीं किसी भी क्षेत्र में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ् साबित करने से कम पर समझौता न करने की भी सीख दी । विद्यार्थी जीवन के प्रारंभिक काल में गुरुजनों से मिली सीख और उनके गुरुत्व पर आज भी वह कृतज्ञता व्यक्त करते नहीं थकते। आइंस्टाइन और बुद्ध की शिक्षाओं को प्रासंगिक मानने वाले डा. सोहल आज भी उनसे मिलने वालों को सनातन संस्कृति, प्राकृतिक जीवन और सार्थक जीवनचर्या अपना कर रोगमुक्त रहने की सलाह देते हैं। उनका यह भी कहना है कि मनुष्य को हर दिन को अपना नया जन्म समझकर अपने ज्ञानवर्द्धन और कुछ न कुछ नया सीखने की प्रवृत्ति को जिंदा रखना चाहिए, जिसके लिए वह स्वयं भी प्रयासरत रहते हैं। काबिले जिक्र है कि आज भी जब वह यहां आते हैं, तो उनसे मिलने और चिकित्सीय परामर्श पाने वालों का तांता लगा रहता है। (एचडीएम)