कातिल नशे का आखेट

By: Jan 25th, 2022 12:05 am

मसला शराब का जहर बनने तक सीमित होता, तो उसके अंजाम में एक घटनाक्रम का अफसोस, आक्रोश और आक्रंदन होता, लेकिन यहां तो पूरी फितरत ही तबाही के आगोश में रची बसी है। यह मसला जहरीली शराब के सरगना, सप्लायर या उपभोक्ता के बीच का तंत्र नहीं, बल्कि अमानवीय कृत्यों की पनाह का बन चुका है। हम चाहें तो पुलिस व्यवस्था की 72 घंटे की कार्रवाई में घटना को सुलझा लें और चाहें तो राजनीति में उलझा लें, लेकिन सत्य यही है कि माफिया अब हमारे जीवन से खिलवाड़ करने में माहिर है। उसेे राजनीतिक शरण, व्यवस्था का अपहरण और पैसों का आवरण हासिल करने के लिए हिमाचल की तमाम पद्धतियां और कायदे-कानून रास आ रहे हैं, वरना हमीरपुर में प्रशासनिक व्यवस्था के बीच बोटलिंग प्लांट किस तरह काम कर पाता। अब हम रिकार्ड के लिए जांच कर सकते हैं, लेकिन इस तरह के संगठित अपराध के लिए खुद को माफ नहीं कर सकते। यानी संुदरनगर में जहरीली शराब से सात लोग न मरते या नकली शराब के फार्मूले में जहर न भरता, तो प्रदेश अमन चैन से शराब गटकता रहता। नशा सिर्फ शराब के नकली होने से पकड़ में आए, तो एक कानूनी मजबूरी की तरह से दिखाई देता है, लेकिन सत्य यह है कि हिमाचल की नसों में जहर भर कर कमाने वालों का एक बड़ा तंत्र सक्रिय है। पड़ोसी राज्यों के साथ और व्यवस्था की शिथिलता के बीच, कातिल नशे के आखेट में कई लोग लगे हैं। भले ही हमीरपुर कांग्रेस ने जिला महासचिव नीरज ठाकुर को पद से हटा दिया, लेकिन इससे राजनीतिक आचरण की गिरावट का अंदेशा कम नहीं होता। माफिया की शक्ति और सामर्थ्य के पीछे राजनीति की चमक रू-ब-रू होती है। उसकी राजनीतिक लंबाई का हिसाब उन पैसों से सुनिश्चित होता है जो आज समाज को भी इसी के पलड़े में तौलता है। हिमाचल में बढ़ती संपत्तियों का ब्यौरा कहीं न कहीं धन की माफियागिरी भी तो है। जहां हर काम राजनीतिक आंख के इशारे से होने लगें, वहां नीरज ठाकुर सरीखा पात्र आगे बढ़ता है और कानून व्यवस्था ऐसे लोगों के पीछे छुप जाती है।

 हमीरपुर में नकली शराब बनाने का ढर्रा बता रहा है कि किस तरह अंतरराज्यीय गिरोह कानून की मांद में जहर भरने के लिए स्वतंत्र रहा। यह एक दिन का खेल नहीं और मौजूदा सरकार इस पाप से किनारे नहीं हो सकती। हम पहले भी कह चुके हैं कि हमारी आबकारी नीति, पुलिस इंतजाम तथा कानूनी सतर्कता इस मामले में कहीं दोषी है या आज भी माफिया के साथ गलबहियां डाले हमारे कानूनी हथियार जंग खा चुके हैं। आश्चर्य तब होता है जब पुलिस की नेक नीयत पर शक करते हुए राजनीतिक दबाव, कर्मठ अधिकारियों को ‘एक्शन मोड’ से हटा कर खुड्डे लाइन लगा देता है। जरा खंगाल कर देखें कि ड्रग माफिया से लड़ते कुछ पुलिस अधिकारी आज कहां हैं। कांगड़ा, ऊना और बिलासपुर में ऐसे पुलिस अधिकारी चर्चाओं में आए जो सर्वप्रथम अपने ही दल को चौकस करते दिखे और साथ ही नशे के सौदागरों की शामत के लिए दिन रात एक करते रहे। जब से सुंदरनगर शराब कांड हुआ है, हिमाचल ने अपने दामन में लगे इसके दाग धोने के लिए पूरी ताकत लगा दी है। धरपकड़ में कई खुलासे हो रहे हैं, अवैध शराब की बोतलें पकड़ी जा रही हैं और दो अवैध फैक्ट्रियां भी सामने आ गई हैं, लेकिन इससे पहले ये शाबाशियां क्यों मौत का खंजर हाथ में लिए पर्दे में थीं। नशा केवल शराब या नकली शराब नहीं, बल्कि उस सारे सामान का जिक्र है जो हमारी बस्तियों में किसी न किसी रूप में आजमाइश कर रहा है। नशे के खिलाफ हल्ला बोलने के लिए सामाजिक, राजनीतिक व सरकार का पक्ष जब तक एक साथ खड़ा नहीं होगा, इक्का-दुक्का उदाहरणों से आगे कुछ नहीं होगा। इससे भी बड़ा प्रश्न माफिया को दंडित करने का है, जिसके लिए राज्य की इच्छा शक्ति सर्वोपरि है, वरना सरकारी पहुंच और राजनीतिक प्रश्रय से पैदा हो रहे ‘नीरज’ की पहचान करना मुश्किल होगा।

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