सफल होने की नई पगडंडी

By: Jan 20th, 2022 12:05 am

लगा था इस बार शायद ऐसा नहीं होगा। पौन सदी कम नहीं होती। आदमी की जि़ंदगी हो तो इसमें लगभग खप ही जाती है। देश की हो तो भी उसे उसका रौशन काल नहीं कह सकते। अव्वल तो इनसे मिलने का मौका ही नहीं मिलता। प्रायः वह अपने हवाई मीनार में रहते हैं, और इस सड़क पर इनके मीनार को देखते हुए कि नहीं इस बार सपनों का शहज़ादा अवश्य अपने घोड़े से उतर आएगा। हमारे गदौ गुब्बार में हमारे अंग-संग चलेगा। हमारे दर्द को अपने गले से लगाएगा। हम इकट्ठे चल कर इन टूटी-फूटी सड़कों या रास्ता भूली पगडंडियों की जगह एक नए जनपथ का निर्माण कर सको। इस पर सबको बराबर-बराबर चलने का हक होगा। इस पौन सदी में हमने हर जनपथ को शार्टकट बना सफलता लेने की पगडंडी में बदलते देखा है। इस पगडंडी का रास्ता कूड़े के उपलों पर नकारने में नहीं, बल्कि उसकी जगह उन पर एक मनभावन कलई करके स्वच्छ भारत सिद्ध कर देने की मुस्कराती घोषणा के साथ होता है।

 इस चुंधयाई हुई आंखों के साथ देखते हैं कि कल जो डम्प था, हम एक किसी चोर गली के रास्ते सिंहासन में तबदील हो गया। उस पर वे जम गए हैं, आवारा सपनों के उस मसीहा की तरह, जिसने पगडंडी बदलते हुए उनके सपने तो किसी भूल-भलैया में खो दिए, और अपने दावों की विजयश्री के साथ अपनी शोभा को हमारी शोभा यात्रा बनाने पर तुला हुआ है। हम उन स्मार्ट शहरों में अपनी बना दी गई इस शोभायात्रा को तलाशते हैं, जो बिन बादल बरसात से उमड़ आए गले-गले पानी में डूबती-उतराती उस जीवन नौका की तलाश करती है जो हमें आदमी, इन्सानियत और पवित्र डुबोती इस जल प्रलय में से निकाल कर किसी सूखी धरती पर खड़ा कर दे। 75 बरस बीत गए, वह सूखी धरती हमें कहीं मिली नहीं। मिले तो बस उसकी प्राप्ति के गुटके। इन नाटकीय भाषणों में मिले वे अपनी चिल्लाहटों को गिनीज़ बुक ऑफ रिकार्ड में तबदील करते देना चाहते थे। यह चिल्लाहट कहती थी कि आपसे जो पौन सदी से नहीं हो सका, वह चंद बरस में कर दिखाया।

 आप बैंकों की ओर देखने की हिम्मत नहीं कर सकते थे, हमने करोड़ों की संख्या में आपके ज़ीरो बैलेंस खाते खोल दिए। वायदा किया आपका भुगतान सीधा अब आपके खाते में जाएगा। बीच के मध्यजनों की धांधली और दलाली खत्म हो जाएगी। लेकिन साहिब, नीचे के ये लोग बड़े शक्तिमान हैं। पांच बरस के बाद आपके पास जब ये अपने दोबारा सिंहासन पर बैठने की मंजूरी लेने आते हैं, तो उन्होंने अपने कन्धों पर हमारी पालकी उठाई होती है। आपके खाली खाते आप से नए युग का वायदा करते रहते हैं, लेकिन सौदों में भुगतान में, बंटवारे में इनकी दलाली का वर्चस्व बना रहता है। नारा समतावादी समाज का लगता है, और नतीजा गरीब के और गरीब और अमीर के और अमीर का आता है। भई, सदियों का अंधेरा है, एक दिन में तो नहीं छंट जाएगा। जो राजा है वह राजा ही रहते हैं, और जो रंक हैं उन्हें अब किसी नई घोषणा से बहलाना है। इसका फैसला तो राजा ही करेगा। इस फैसले पर जनता की तालियों के ज़ामिन यह मध्यजन ही बनते हैं। भला इन्हें अमान्य कैसे किया जा सकता है? आओ, क्यों न इन्हें इस बनते संवरते समाज का ज़रूरी हिस्सा घोषित करके कानूनी मान्यता दे दी जाए। सही भी है, सिंहासन भी भला अपने पायों के बिना टिक सकता है। ये पाये, जिन्हें सभ्य भाषा में आधार स्तम्भ कहते हैं, इनके लिए किराये पर मंच ही नहीं, रैलियां भी जुटाते हैं। क्या कहा आपने ये पुराने तरीके हो गए। आजकल ज़माना सोशल मीडिया से, व्हाटसअप से, फेसबुक से, ट्विटर से जयघोष उठवाने का है। इसमें भी ये सिद्धहस्त कहां पीछे रहते हैं।

सुरेश सेठ

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