सेना और कत्र्तव्य पथ-2

By: Oct 1st, 2022 12:05 am

नवरात्रों के इन दिनों में हर घर देवमयी हो रखा है। हिंदू परिवारों का हर सदस्य देवी मां के व्रत रखते हुए, नौ दिन पूजा में लीन रहता है। देवी मां के मंदिरों व दरबारों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है। हर आदमी नवरात्रों को शुभ मानते हुए भविष्य के लिए अच्छे कामों की नीव इन्हीं दिनों में रखते हैं। जबकि इस बार यह मानना भी है कि मात्र दो ही नवरात्रि शुभ है। इन नवरात्रों की एक और खास बात है कि इन 9 दिनों में हर गांव और कस्बे के नुक्कड़ पर रामलीला चलती है और हिमाचल प्रदेश विशेषकर कांगड़ा के लोग मक्की की फसल को इक_ा करके सारे दिन की थकान को जैसे पुराने जमाने में है रामलीला देखने का आनंद लेते थे वह चाहे अब कम जरूर हो गया है और रामलीला की जगह टीवी चैनल के नाटकों और खबरों के डिबेट ने ले ली है, पर फिर भी लोगों की आस्था और नवरात्रों के प्रति समर्पण देखा जा सकता है।

राजनीतिक उथल-पुथल में हिमाचल कांग्रेस के बड़े नेता भाजपा में शामिल हुए जिन्हें हिमाचली राजनीति के सिरमौर राजा वीरभद्र सिंह जी का चाणक्य माना जाता था, तो उधर कांग्रेस अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव तथा भारत जोड़ो के बीच में अशोक गहलोत चर्चा का विषय बन गए हैं, जिनके हाथ से राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद तो आते-आते निकल गया, पर हो सकता है अब मुख्यमंत्री की कुर्सी भी न रहे। भारतीय सेना में नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति हुई है जिसमें लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चौहान सेवानिवृत्त को यह जिम्मेदारी दी गई है। जनरल बिपिन रावत के अकस्मात निधन के बाद कई महीनों से खाली पड़े इस पद पर ऐसे समय में नियुक्ति हुई है, जब एशियन महाद्वीप में यूक्रेन और रूस का युद्ध आने वाले समय में भयावह होने वाला है, जबकि चीन का ताइवान पर तथा भारत के लद्दाख में पिछले कुछ समय से जिस तरह का बर्ताव रहा है उस हिसाब से भारतीय सेना का आने वाले समय में विश्व की उभरती हुई इन परिस्थितियों पर क्या स्टैंड या रणनीति होगी, इसमें जनरल अनिल चौहान की भूमिका भी बहुत अहम रहेगी। वैसे सेना का हर सैनिक चाहे वह सेवारत हो या सेवानिवृत्त, वह हमेशा कर्तव्यनिष्ठ रहता है। अगर किसी परिस्थिति के अनुसार सेना को इन सैनिकों की आवश्यकता पड़ती है तो सेवानिवृत्ति के कुछ समय बाद तक भी उनकी सेवाएं लेने के लिए बुलाया जा सकता है। आजादी के बाद से लेकर अब तक लगातार सेना के अधिकारियों के स्टेटस या स्तर को देश की अन्य सेवाओं के अधिकारियों के मुकाबले में लगातार निचले स्तर की तरफ धकेला गया है।

एक समय था जब भारतीय सेना के सेना अध्यक्ष का स्तर देश के पहले 10 लोगों में आता था जो कि समय के साथ पिछले 75 साल में 75 से ज्यादा सीढिय़ां नीचे आ चुका है और आने वाले समय में पहले 100 में बन पाना भी मुश्किल प्रतीत हो रहा है। इसका कारण एक यह भी है कि सैनिक इन सब चीजों पर ध्यान नहीं देता। सेना का कोई भी अधिकारी अपने कर्तव्य की तरफ प्राथमिकता देता है न कि अपने स्तर की तरफ, वह अपने काम से काम रखता है तथा पूरी भावना के साथ देश हित और राष्ट्र हित के लिए काम करने में विश्वास रखता है, जबकि उसके सिविल के काउंटरपार्ट 9 से 5 बजे तक के अपने कर्तव्य को निभाते हुए राजनीतिक आकाओं की शरण में जाकर हैरारिकी में अपने स्तर को ऊपर उठाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं, पर शायद उस सैनिक को इसका फर्क नहीं पड़ता और वह देश की रक्षा के लिए जिस कर्तव्य पथ पर निकला होता है, उस पर हमेशा सच्चे मन से अग्रसर रहता है।

कर्नल (रि.) मनीष

स्वतंत्र लेखक