मंडी के दिवंगत साहित्यकार

By: Oct 2nd, 2022 12:10 am

साहित्य की निगाह और पनाह में परिवेश की व्याख्या सदा हुई, फिर भी लेखन की उर्वरता को किसी भूखंड तक सीमित नहीं किया जा सकता। पर्वतीय राज्य हिमाचल की लेखन परंपराओं ने ऐसे संदर्भ पुष्ट किए हैं, जहां चंद्रधर शर्मा गुलेरी, यशपाल, निर्मल वर्मा या रस्किन बांड सरीखे साहित्यकारों ने साहित्य के कैनवास को बड़ा किया है, तो राहुल सांकृत्यायन ने सांस्कृतिक लेखन की पगडंडियों पर चलते हुए प्रदेश को राष्ट्र की विशालता से जोड़ दिया। हिमाचल में रचित या हिमाचल के लिए रचित साहित्य की खुशबू, तड़प और ऊर्जा को छूने की एक कोशिश वर्तमान शृंाखला में कर रहे हैं। उम्मीद है पूर्व की तरह यह सीरीज भी छात्रों-शोधार्थियों के लिए लाभकारी होगी…

अतिथि संपादक, डा. सुशील कुमार फुल्ल, मो.-9418080088

हिमाचल रचित साहित्य -33

विमर्श के बिंदु
1. साहित्य सृजन की पृष्ठभूमि में हिमाचल
2. ब्रिटिश काल में शिमला ने पैदा किया साहित्य
3. रस्किन बांड के संदर्भों में कसौली ने लिखा
4. लेखक गृहों में रचा गया साहित्य
5. हिमाचल की यादों में रचे-बसे लेखक-साहित्यकार
6. हिमाचल पहुंचे लेखक यात्री
7. हिमाचल में रचित अंग्रेजी साहित्य
8. हिमाचल से जुड़े नामी साहित्यकार
9. यशपाल के साहित्य में हिमाचल के रिश्ते
10. हिमाचल में रचित पंजाबी साहित्य
11. चंद्रधर शर्मा गुलेरी की विरासत में

रेखा वशिष्ठ, मो.-8219084406

मंडी हिमाचल प्रदेश का प्रमुख जिला है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अपने वर्तमान स्वरूप में आने से पहले मंडी एक रियासत था। सेन वंश की कई पीढिय़ों ने यहां शासन किया। हिमाचल की सांस्कृतिक राजधानी मंडी छोटी काशी नाम से जानी जाती है। काशी यानी बनारस से यह तुलना मंदिरों की बहुलता के कारण तो है ही, बनारस की तरह मंडी भी शिक्षा और बौद्धिक उत्कृष्टता का केंद्र रही है। शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। यहां वास्तुकला, चित्रकला, नृत्य, संगीत, पाक कला जैसी कई विधाओं की समृद्ध परंपरा रही है। साहित्य के क्षेत्र में भी मंडी किसी तरह पीछे नहीं है। यहां एकाधिक साहित्यकारों ने जन्म लिया और साहित्य की विविध विधाओं में लेखन किया। इस आलेख में मैं उन लेखकों का उल्लेख करूंगी जो अब हमारे बीच नहीं हैं।

हो सकता है राजाओं के शासनकाल में भी कुछ लोग कलम के धनी रहे हों, परंतु जानकारी के अभाव में उनका उल्लेख नहीं किया जा सकता। मैं अपनी जानकारी की सीमा स्वीकारती हूं। वर्तमान काल खंड में शीर्ष स्थान पर हैं पंडित भवानी दत्त शास्त्री। ये बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे। साहित्य और कला में इनका असाधारण और अनुकरणीय योगदान है। शास्त्री जी का जन्म छह दिसंबर 1911 को पुरोहित श्री धनदेव और माता ठोली देवी के घर मंडी नगर में हुआ। इनके पिता एक पुजारी और संस्कृत के विद्वान थे। इनकी मां का निधन इनके शैशव में ही हो गया था। मातृ स्नेह से वंचित होने की कचोट ताउम्र इनके साथ रही। इनकी पत्नी श्रीमती रूपेश्वरी देवी इनके साथ एक चट्टान की तरह आजीवन खड़ी रहीं। नाती-पोतों से भरी-पूरी गृहस्थी में रहते हुए 26 सितंबर 2008 को ये स्वर्गसिधार गए। 1929 मेें इन्होंने विजय हाई स्कूल मंडी से मैट्रिक की। बीए और शास्त्री तक की पढ़ाई पत्राचार माध्यम से की। 1943 में विजय हाई स्कूल में अध्यापक बनकर आए। फिर मंडी रियासत के धर्मार्थ विभाग प्रबंधक नियुक्त हुए। 1944-1948 तक इसी विभाग के अध्यक्ष पद पर रहे।

1950 से 1969 में सेवानिवृत्ति तक मंडी के अलग-अलग स्कूलों में शास्त्री पद पर रहते हुए पढ़ाते रहे। शास्त्री जी ने संस्कृत, हिंदी और पहाड़ी में कई पुस्तकें लिखी और कई ग्रंथों का संस्कृत से पहाड़ी में अनुवाद किया। ये पुस्तकें इस क्रम में प्रकाशित हुईं- गीतामृतम (श्रीमद्भगवदगीता के 19 श्लोकों का पहाड़ी पद्यानुवाद), कविता संग्रह (हिंदी कविताएं), भज गोविंदम (संस्कृत से पहाडी में पद्यानुवाद), हिम कुसुमांजलि (संस्कृत काव्य), लेरां धारा रही (पहाड़ी गीत और कविताएं), हिम सुमन गुच्छम (संस्कृत काव्य पहाड़ी अनुवाद सहित), श्रीमद्भगवदगीता (पहाड़ी अनुवाद), उपनिषद ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक (पहाड़ी अनुवाद)।

इनकी कुछ पुस्तकें अप्रकाशित रह गई हैं जो इस प्रकार हैं – उपनिषद मांडूक्य, तैतिरीय, एतरेय, श्वेताश्वतर (पहाड़ी अनुवाद), तत्व चिंतन सोपान (संस्कृत खंड काव्य हिंदी अनुवाद सहित), वेदांत दर्शन (ब्रह्मसूत्र, पहाड़ी अनुवाद)। शास्त्री जी को उनके विपुल कार्य के लिए कई सम्मान दिए गए- साहित्यिक गतिविधियों, ललित कला और गीता शिक्षण के उत्थान के लिए 20 जुलाई 1958, साहित्यिक सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए 27 मार्च 1970, तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएस परमार द्वारा। सोपहार मानपत्र, 9 मई 1976, शिक्षा निदेशक, हि. प्र. द्वारा पहाड़ी साहित्य पुरस्कार, 26 मार्च 1988, हि. प्र. संस्कृति और भाषा अकादमी, पहाड़ी साहित्य चूड़ामणि, 1989, अकादमी शिखर सम्मान, 1994, मांडव्य रत्न, 2000, शोभा सिंह अवार्ड (चित्रकला के लिए), भारत ज्योति पुरस्कार (2006)। 20 अगस्त 1948 में शास्त्री जी ने साहित्य सदन की स्थापना की। 1950 में सामूहिक गीता श्रेणी प्रारंभ की।

उनका सर्वाधिक मूल्यवान योगदान यह रहा कि एक कला और साहित्य के गुरु के रूप में उन्होंने कई पीढिय़ों की सृजनशीलता को दिशा दी। स्वयं प्रेरणा बनकर इस शहर की प्रतिभा को साहित्य सदन के रूप में एक मंच प्रदान किया। वह मंडी की सृजन चेतना के प्रणेता थे। वह साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला सभी विधाओं में आजीवन साधना करते रहे और बहुत से अपने शिष्यों और अनुयायिओं को भी प्रेरित करते रहे। उनका दूसरा बड़ा योगदान एक अनुवादक के रूप में और पहाड़ी भाषा के अनवरत प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में रहा। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक पल सरस्वती की साधना करते हुए बिताया। शास्त्री जी के मरणोपरांत भी उनकी ‘गीता श्रेणी’ निरंतर चल रही है। दूसरे दिवंगत साहित्यकार हैं डाक्टर नीलमणि उपाध्याय, जिनका जन्म 7 दिसंबर 1931 को मंडी नगर में हुआ था। वह एक लब्धख्याति, प्रकांड विद्वान थे।

उन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी और हिंदी में एमए, एम. एड. और पीएचडी (पंजाब विवि से) की थी। उन्होंने प्रदेश के शिक्षण संस्थानों में आठ साल बतौर शिक्षक, 24 साल प्रवक्ता और आठ साल प्राचार्य के रूप में काम किया। उन्होंने संस्कृति, लोक संस्कृति और देव संस्कृति के गहन अध्येता और संरक्षक के रूप में अत्यधिक परिश्रम और लगन से काम किया। इसी कार्य के चलते उन्होंने पहाड़ी देवताओं के लोकगीतों और अनुष्ठानों की 29 सीडी बनाईं। हिमाचल प्रदेश के धर्म, संस्कृति और सामाजिक जीवन में उनकी गहरी रुचि थी। इन विषयों पर उनकी कई पुस्तकें और लेख प्रकाशित हुए हैं। मंडी और हिमाचल के मंदिरों पर केंद्रित उनकी पुस्तक उल्लेखनीय शोध कार्य है।
-(शेष भाग अगले अंक में)

हिमाचल में अंग्रेजी भाषा में साहित्य सृजन

डा. कुंवर दिनेश सिंह,  मो.-9418626090

-(पिछले अंक का शेष भाग)
विपिन पब्बी की कृति ‘शिमला : देन एण्ड नाउ’ (1989), पामेला कंवर की पुस्तक ‘इम्पीरियल सिमला’ (1990) तथा राज भसीन की पुस्तक ‘सिमला : दि समर कैपिटल ऑफ ब्रिटिश इण्डिया’ 1992) ब्रिटिश राज में भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी तथा वर्तमान में हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास पर केन्द्रित महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ हैं। हाल ही में के. आर. भारती द्वारा लिखित और हिमाचल अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘हिस्टरी ऑफ हिमाचल प्रदेश’ (2019) भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में हिमाचल के सेनानियों के योगदान तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत प्रदेश के राजनीतिक गतिक्रम पर केन्द्रित अध्यायों सहित प्रदेश के पौराणिक काल से लेकर वर्तमान तक के इतिहास पर उल्लेखनीय कृति है। पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एवं अंग्रेज़ी के जाने-माने लेखक शक्ति सिंह चंदेल की पुस्तक ‘बिलासपुर थ्रू दि सेन्चुरीज़’ (2007) कहलूर रियासत (वर्तमान में बिलासपुर) के इतिहास एवं सांस्कृतिक पक्ष को सशक्त ढंग से प्रस्तुत करती है। प्रदेश संबंधी सांस्कृतिक लेखन में अंग्रेज़ी की कुछ कृतियां उल्लेखनीय हैं : मियां गोवर्धन सिंह की पुस्तकें ‘आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर ऑफ हिमाचल प्रदेश’ (1983), ‘फेस्टिवल्ज़, फेअजऱ् एण्ड कस्टम्ज़ ऑफ हिमाचल प्रदेश’ (1992) तथा ‘वुडन टेम्पल्ज़ ऑफ हिमाचल प्रदेश’ (1999), शांतिलाल नागर कृत ‘दि टेम्पल्ज़ ऑफ हिमाचल प्रदेश’ (1990), कैलाश आहलुवालिया की पुस्तक ‘करयाला : ऐन इम्प्रॉम्प्टु थिएटर ऑफ हिमाचल प्रदेश’ (1995), हरि कृष्ण मिट्टू की पुस्तक ‘हिमाचल प्रदेश’ (1996), मुल्कराज आनंद द्वारा सम्पादित हिमाचल की धरोहर पर केन्द्रित लेख-संग्रह ‘स्प्लैन्डजऱ् ऑफ हिमाचल हैरिटेज’ (1997), नीलमणि उपाध्याय कृत ‘टैम्पल्ज़ ऑफ हिमाचल प्रदेश’ (2008) और डा. बीआर शर्मा की पुस्तक ‘डिवाइन हैड्ज़ : फोकलोर ऑफ महासू रिजन इन दि वैस्टर्न हिमालयाज़’ (2015)। साहित्यिक पत्रकारिता की विधा में पूर्व प्रशासनिक अधिकारी श्रीनिवास जोशी का नाम उल्लेखनीय है जो कई वर्षों से नियमित रूप से अंग्रेज़ी दैनिक ‘दि ट्रिब्यून’ में ‘विनेट्स’ शीर्षक से हिमाचल संबंधी स्तम्भ लिखते रहे हैं।

यात्रा-लेखन में केआर भारती की पुस्तकें उल्लेखनीय हैं : ‘ट्रैवल्ज़ टू हायलैंड्ज़ ऑफ हिमाचल प्रदेश’ (1990), ‘पांगी एण्ड पंगवालाज़’ (1995), ‘चम्बा हिमालय : अमेजि़ंग लैंड, यूनीक़ कल्चर’ (2001) तथा ‘हिमाचल प्रदेश : अ ट्रेजऱ ऑफ टूरिज़्म’ (2021)। मीनाक्षी चौधरी की ‘हिमाचल : अ कम्प्लीट गाइड टू दि लैंड ऑफ गॉड्ज़’ (2006) और अन्य कुछ पुस्तकें हिमाचल के विभिन्न दर्शनीय स्थलों पर केन्द्रित हैं। हिमाचल पर केन्द्रित उषा बंदे की पुस्तक ‘फोक ट्रडिशन्ज़ एण्ड इकॉलजी इन हिमाचल प्रदेश’ (2006) हिमाचल की लोक-परम्पराओं का पारिस्थितिकी के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करती है। उषा बंदे और हिम चैटर्जी की कॉफी-टेबल बुक के आकार में छपी पुस्तक ‘फोट्र्स एण्ड पैलेसिज़ ऑफ हिमाचल प्रदेश’ (2011) रियासत कालीन कि़लों और महलों के वास्तु पर केन्द्रित है। सुमित राज वशिष्ठ की पुस्तकें पर्यटन, इतिहास और सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, जिनमें उल्लेखनीय हैं : ‘शिमला : अ ब्रिटिश हिमालयन टाउन’ (2010) तथा ‘अ जर्नी टू शिमला बाय ट्वाय ट्रेन’ (2015)। अनुवाद के क्षेत्र में ‘शॉर्ट स्टोरीज़ ऑफ हिमाचल प्रदेश’ (2007) में डा. मीनाक्षी फेथ पॉल ने हिमाचल प्रदेश के हिंदी लेखकों की चुनिंदा कहानियों का अंग्रेज़ी में कुशल भाषांतर एवं सम्पादन किया है। डा. कुंवर दिनेश सिंह ने हिंदी की लघुकथा विधा के उन्नीसवीं शताब्दी से वर्तमान तक के 62 प्रतिनिधि लेखकों की रचनाओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है, जो ‘बियॉन्ड सेम्बलैन्सिज़’ शीर्षक से वर्ष 2021 में एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ है। इसके अतिरिक्त डा. कुंवर ने वर्ष 2020 में प्रकाशित संकलन ‘दि फ़्लेम ऑफ दि फॉरेस्ट’ में हिंदी हाइकु का अंग्रेज़ी में काव्यानुवाद भी किया है। आज अंतर्जाल पर भी हिमाचल प्रदेश के कई लेखक एवं पत्रकार ब्लॉग एवं ई-पत्रिकाओं के माध्यम से साहित्यिक अभिव्यक्ति कर रहे हैं। इनमें हिमवाणी, हिलपोस्ट, हिमाचल वॉचर, शिमला वॉक्स इत्यादि लोकप्रिय ब्लॉग हैं। वर्तमान दशक में अंग्रेज़ी में सृजनात्मक लेखन कर रहे कुछ नवोदित लेखक, कवि और कथाकार भी प्रकाश में आ रहे हैं, लेकिन परिपक्वता और मानकता के निकष पर खरा उतरने के बाद ही उन्हें सूचीबद्ध किया जा सकेगा।
अतिथि संपादक की टिप्पणी
डा. कुंवर दिनेश सिंह द्वारा प्रदत्त विस्तृत जानकारी में जोडऩा चाहूंगा कि नगरोटा वासी श्री सोनी का उपन्यास ‘द क्वैस्ट’ अपनी भाषा एवं कथ्य की विशिष्टता के कारण महत्त्वपूर्ण है। हाल ही में प्रकाशित सुमन शर्मा का उपन्यास ‘द शैडोज ऑफ धौलाधार’ राजा संसार चंद की नोखू से प्रेम कहानी पर आधारित है। सुमन शर्मा युवा मेधावी रचनाकार हैं। एक और उल्लेखनीय हस्ताक्षर हैं स्वर्गीय राम स्वरूप शर्मा गंगथ से, जिन्होंने उर्दू, हिंदी तथा अंग्रेजी में भरपूर लिखा, परंतु उनका सही नोटिस नहीं लिया गया। दरअसल वह परवाज नूरपुरी के नाम से भी लिखते थे। सन् 2013 में उनकी अंग्रेजी कविता पुस्तक छपी जिसका नाम है ‘एसेंस ऑफ कैमिस्ट्री’। नाम से लगता है कि यह रसायन शास्त्र की पुस्तक है, परंतु वास्तव में यह बहुत ही रोचक कविता की पुस्तक है। अंग्रेजी में हायकू लिखे एनपी सिंह ने। इनकी भाषा क्लासिकल है। हिंदी में इनका अनुवाद प्रस्तुत पंक्तियों के लेखक ने किया है। कुल 97 हायकू हैं। सुशील कुमार फुल्ल की अंग्रेजी कहानियों की पुस्तक ‘द लैम्ब एण्ड द नूज़’ के उल्लेख के साथ-साथ मिनी करेंट एसेज, जो 1970 में मिनी पब्लिशर्ज अम्बाला कैंट से छपे थे, पर्याप्त चर्चित रहे थे।

कहानी की जमीन पर अजय पाराशर का ‘मुश्तरका खाता’

अजय पाराशर का ‘मुश्तरका खाता’ कहानी संग्रह महज कहानियों का संगम नहीं, बल्कि उनके अपने जीवन के उतार-चढ़ाव की छाया में पलते अनुभवों की दहलीज पर खड़ी दस्तक है। सरकारी कार्य संस्कृति का परिवेश खंगालती हुईं, कथ्य-अकथ्य के बीच सत्य का वर्णन करते-करते कुछ खुद को निर्लिप्त कहानी बना पाईं, कुछ व्यंग्य के सहारे प्रभाव बढ़ा गईं, लेकिन कुछ रिपोर्ताज की शैली में कहानी का वातावरण, कथानक, संवाद व उद्देश्य गढऩे के बजाय कहीं गुस्से के गुबार में छुप गईं। हालांकि लेखक की प्रस्तावना में ही पत्थरों पर अल्$फाज चुनने और सवालों को महसूस करने की बात करते हुए ईमानदारी से हर कहानी की नोक बनाने में सफल रही है। हिंदोस्तानी लह•ो में भाषा, विषय और विविधता लिए पाराशर कभी झील की गहराई तक सोचते हैं, तो कभी रेगिस्तान की तपती बालू को वक्त के हाथों में पकडऩे की कोशिश करते हैं। आप इन्हें आदर्श खोजती मान सकते हैं, लेकिन कहानियों में लेखक का अतिशय निर्णायक होने से कहीं-कहीं पाठकीय पक्ष विचलित हो उठता है। कहानियों के भीतर एक खास तरह की असहजता और आदर्शवाद की तलाश में गुस्से की लहर है, जो समाज की इंद्रियों, प्रशासन की मुद्राओं, मीडिया की मंडियों और पारिवारिक रिश्तों से बहुत कुछ पूछ रही हैं। ‘हड्डी’- व्यंग्य पकड़ती कहानी है और विविधता का आंचल ओढ़े रोचक प्रसंग उठाती है।

माथे की बढ़ी हुई हड्डी के बहाने कहानी डाक्टरी प्रोफेशन की नाफरमान हड्डी से मुकाबला करती है। अस्पतालों के भीतर सवालों के चक्रव्यूह और जीवन की कंदराओं से कहीं उपायों की सुरंग। सरकारी कार्य संस्कृति में सिफारिश, सलाह और सलाहियत के मध्य इनसानी फितरत का परिचय देती कहानी कुछ ‘दूर तलक’ जाती है। ‘रिवर्स गेयर’ में भी व्यंग्य का पुट भरती हुई कहानी वृत्तांतनुमा चित्रण करती है, तो बड़े साहब सारे भ्रम तोड़ते हुए उन्हें प्रतीकात्मक आभास कराते हैं कि सत्य, औचित्य, धर्म और कर्म पर बड़े से बड़े जादू-टोने का असर नहीं होता। नेताओं व माफिया, प्रशासन तथा महकमों की कार्य संस्कृति का गठजोड़ लिए ‘शहादत’ कहानी भी व्यंग्य की ऊर्जा से संदेश की चोट को पुख्ता कर देती है। देश सेवा के इश्क पर $िफदा कहानी खुशी राम शर्मा के हिस्से आई वफादारी का वर्णन करती है, तो ईमानदारी से निभाया सेवा भाव लहूलुहान हो जाता है, लेकिन कहीं उ$फ तक नहीं होती। कहानी सुर्ख होकर मीडिया की उन सुर्खियों को कोसती है, जो अखबारी पन्नों पर सिर्फ नेताओं को सिर पर उठाकर फेरी लगाती हैं। सामान्य जरूरतों के बीच आम आदमी के ‘सुकून’ को तलाशती कहानी में लेखक के तपसरे, शब्दों से खेलने की कला और वाक्य अपने विन्यास के हर लम्हे को मूर्त रूप देने में शरीक रहते हैं। हम सबके भीतर का ‘सुकून’ कहानी का अहम किरदार ‘रमेश’ के साथ अभिव्यक्त होता है। सरकारी नौकरी के पंख कैसे टूटते हैं और सोने के अंडे देने वाली मुर्गी न बनने की सजा क्या हो सकती है, इस कहानी की भूमिका में समय को रुलाती, जिंदगी की नेक नीयत को रौंदती आहें जब उम्र के ठहराव पर आती हैं, तो मालूम होता है कि ‘सुकून’ तो कच्चे घड़े पर उकेरे गए पलों की तरह है। पंडित दीनानाथ के लिए ‘अच्छी बात है’ में दुनियादारी का ऐसा बूचडख़ाना दिखाई देता है, जहां संवेदनाओं की मौत और पारिवारिक रिश्तों की कब्र में जिम्मेदारियों का भूत डराता है और जब जीवन एहसास बनकर देखता है, तो बुढ़ापा कोमल, सद्गुणी होने की मुद्रा में समझौता कर लेता है। बूढ़ी आंत को जब अपने ही कांपते हाथ सहला नहीं सकते, तो भूख-प्यास के बीच मां, पत्नी और बहू के रिश्तों का आसरा चाहिए। कितना कठिन है बूढ़े होने का एहसास या सत्य के मार्ग पर शरीर का त्याग, लेकिन कहानी इसे भी अमृत समझकर पी जाती है। ‘कन्या पूजन’ कहानी में समाज के घटते-बढ़ते दायरे और परिवार के भीतर-बाहर बहते द्वंद्व दिखाई देते हैं। पति-पत्नी के संबंधों की रस्सी पर संतुलन की दरकार और आपसी प्रतीक्षा में परीक्षा के शब्दों की हिफाजत-नफासत का वर्णन होता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच परंपराओं की नकेल पहनकर चुनौतियों का सामना करते सरकारी रुतबों में जीवन मूल्य आदर्शवादी कैसे रहें। पुलिस के आला अफसर का रौब और ठाठ में क्या कन्या पूजन जीत जाता है या इसके बरअक्स सादगी ओढ़े कोई अधिकारी परंपराओं के चरण स्पर्श में परिवार के प्रश्नों, ‘कहीं तो रुतबा काम आए’ के आगे लुढक़ जाता है।

‘कितने कसाब’ में कहानी औरत के वजूद पर टिकी मजबूरियों का हवाला देते हुए, भीगी आंखों से दृढ़ प्रतिज्ञ हो जाती है। औरत बनाम औरत बनाम औरत बनाम…. के अंतहीन सिलसिलों में सवाल मर्यादा या सामाजिक सिद्धांत का नहीं, बल्कि उस परीक्षा का है जो औरत की रीढ़ को मजबूत बनाती है। सामाजिक परतों के अंदर-बाहर कई पुरुष साम्राज्य हैं, लेकिन नारी खुद अपने संसार की रचना करते हुए मुकाबला करती है, तो उसके जीवन के अर्थ बदल जाते हैं। ‘अध्यात्म’ कहानी के भीतर चारित्रिक क्षुद्रता में फंसा एक आदर्श पति किस हद तक बिखर जाता है और ‘तप व ताप’ के अर्थों में मन और देह की संतुष्टि करता-करता इतना लुढक़ जाता है कि बेटी की उम्र पर किया उपकार भी उसे ‘बाप’ से ‘पाप’ का चेहरा पहना देता है। प्रवृत्तियों में शारीरिक मोह किस तरह ‘अध्यात्म’ को परास्त कर सकता है और तमाम प्रवचनों की संगत-अध्यात्म के मूल स्वरूप को शारीरिक संवेग की पिपासा में बदल जाते हैं, इसी को लेकर जीवन में आते अध्यात्म और बिगड़ती फितरत पर सवाल दागती कहानी। ‘एक पापा की मौत’, में रिश्तों में होती सांझ उन सवेरों को नहीं देख पाती जो कभी परिवार की मिलकीयत में किसी के फर्ज की अदायगी थे। सचिन के पिता ने अपने भाइयों-बहिनों को काबिल बनाया, लेकिन देरी से पैदा हुआ सचिन बाप की बूढ़ी रगों में दौड़ती असमर्थता का शिकार हो गया। अपने तीन बच्चों के उत्थान में जारी उसका श्रम अंतत: उसी की मौत को गले लगा लेता है और उसके सपनों की अंत्येष्टि में रह जाती है एक खाली गुल्लक, जो सिर्फ बच्चों और पत्नी की सिसकियों से भरती रहेगी। ‘चार आने की जिंदगी’ में कहानी मां के दामन में यौवन की आग से झुलसते बच्चों के अस्तित्व को निहारती है। औलाद के दर्पण में मां का चरित्र जब आरपार होता है, तो रिश्ते फानूस में जलने लगते हैं। औरत की तरक्की का हिसाब शरीर देने लगेगा तो जीवन की महत्त्वाकांक्षा किसी दौर में दुर्घटनाग्रस्त जरूर होगी। अंतत: मानसिक रूप से दुर्घटनाग्रस्त लाजवंती के पास केवल घायल रिश्ते ही तो बचते हैं, जिन्हें संवारने के लिए पश्चाताप की चिट्ठी केवल सहला सकती है। अजय पाराशर की कहानियों में तीसरा मोड़ उनके अति निकट दिखाई देता है, लेकिन इनके प्रारूप में सत्यता भरते-भरते वह चार कहानियों को रिपोर्ताज जैसी बना देते हैं। ‘राजगायक’ एक सरकारी गायक के संवरते ओहदे के रा•ा खोलते-खोलते कहानी कहीं यह साबित करने में जुट जाती है कि सरकारी गायन से टेलेंट गायब रहता है। ‘जले घर के कोयले’, सिस्टम में पैदा होती कहानी उस ताने-बाने, गलबहियां और भाई-भतीजावाद को उजागर करती है जो किसी भी सरकारी नियुक्ति पत्र के पीछे की नौटंकी है। ‘विंटर कैपिटल’ के बहाने लेखक मीडिया के उस बाजार को खोज रहा है, जो दीमक की तरह सरकारी सुविधाओं से चस्पां है। एक बड़ी रिपोर्ट सरीखी, ‘मुश्तरका खाता’ की शुरुआत जमीनी सौदे पर जबरिया दखल देते माफिया पर प्रश्न उठाती है। कहानीकार सच की अदालत लगाकर खतरे मोल लेता हुआ, भ्रष्टाचार-माफियागिरी की मंडी से टकराते-टकराते भू-राजस्व के मामले में मीडिया को भी पार्टी बना देता है। दफ्तर को शारीरिक चरागाह समझने वाले अधिकारी की भूखी नजरों का सामना करती कोई शेरनी ऐसी भी होती है, जो बड़े साहब को पुन: नारी की ‘इज्जत’ करना सिखा देती है।                                                   -निर्मल असो

कहानी संग्रह : मुश्तरका खाता
लेखक : अजय पाराशर
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
कीमत : 150 रुपए