हिंदी मंथ की पुरानी सत्यकथा

By: Sep 16th, 2023 12:05 am

हिंदी मंथ यानी बेचारा सितम्बर, इस बार भी हिंग्लिश की लोकतांत्रिक ज़मीन पर ‘आई लव हिंदी’ करते हुए बीत रहा है। पिछले सालों में लाखों कवि हुए, हज़ारों कवि सम्मेलन, असंख्य वेबिनार, ढेरों ऑनलाइन सम्मान पत्र सौंप दिए गए और हिंदीजी को खुश रखा गया। किसी ज़माने में, जब यह महीना आता तो हिंदी प्रेमियों, कवि, लेखकों, अधिकारियों व राजनीतिज्ञों को अंग्रेजी में पुते साइन बोर्ड बुरे लगने लगते। हिंदी प्रेम दिखाऊ संस्थाएं नींद से जागती। कार्यक्रमों की सुगंधित बारिश में सब मिलकर हिंदी में भीगते। आम तौर पर अंग्रेज़ी में बतियाने वाले, हिंदी में लिखे बैनर उठाए हुए, सुबह सुबह ‘हिंदी वाक’ आयोजित करते। विशाल बोर्ड लगाकर हिंदी में ही हस्ताक्षर करते और समाचार पत्रों में, ‘फोटो विद न्यूज़’ छपवा डालते। अनेक प्रतियोगिताओं में नकद पुरस्कार जीतने वालों की होड़, हिंदी में लगी रहती। असली फायदा दूरदर्शन वालों को होता, वे इस बहाने कवि सम्मेलन मुफ्त में रिकार्ड कर लेते क्योंकि यदि वे कांट्रैक्ट साइन करवाते तो पैसा खर्चना पड़ता जो बिना जान पहचान वाले आम कवियों के लिए उनके पास कभी न होता। कवि सम्मेलन कभी कभार लाइव टेलीकास्ट भी किया जाना होता, यह सुघोषणा सुनकर कविता प्रेम हर तरफ बिखर जाने के कारण, कवियों की तादाद अनायास बढ़ जाया करती। छोटे परदे पर एक झलक दिखा सकने की तमन्ना में कितने ही वरिष्ठ हो चुके कवि भी इनमें शामिल होने को लालायित रहते। टेलीकास्ट करने में प्रबंधन मेहनत मांगता।

मुख्य अतिथि, स्टाफ, कवि, श्रोता और अश्रोताओं सभी को स्टुडियो में मुश्किल से सैट करना पड़ता। स्क्रीन पर खाली कुर्सियां न दिखें, मोबाइल न बजे, कोई सोया न दिख जाए, बीच में न टहले वगैरा वगैरा। स्टुडियो में अगली लाइन में सोफाजी और पिछली लाइनों में प्लास्टिक की कुर्सियां होती। सोफाजी मुख्य अतिथि या गणमान्यों के लिए ही होते, कवि जब यह भूल जाते तो प्रोड्यूसर कहते, कवियों को प्लास्टिक की कुर्सियों पर ही बैठना है। यह समझाने की नहीं, समझने की बात होती। संचालक कह तो देते कि उठते समय खटरपटर न हो, लेकिन उन्हें यह ध्यान न रहता कि कवियों व प्लास्टिक की कुर्सियां, दोनों की खासियत यही है। कार्यक्रम में निर्णायक व गणमान्यों का मोबाइल बज सकता और ज़रूर बजता। बार बार सख्त घोषणा की जाती कि कविता तीन से पांच मिनट की स्वरचित हो, मगर किसी को पता न चलता कि किसने स्वरचित पढी़, किसने चुराकर और समय मानो अंतहीन कविता हो जाता। मुख्य अतिथि हमेशा की तरह जैसे कैसे, देर से पहुंचते तो सोफाजी को भी अपनी शान बढ़ती लगती। सोफाजी पर कोई आम आदमी बैठने की हिम्मत न कर सके,स इसलिए दो रिमूवेबल साधारण कर्मचारी अंत तक उस पर रखे रहते, हालांकि यह सोफाजी को अच्छा नहीं लगता।

संचालक को जब लगने लगता कि कार्यक्रम अस्वादिष्ट होता जा रहा है तो मुख्य अतिथि का कुस्वादिष्ट भाषण परोस दिया जाता। भाषण उच्चकोटि का सूचनाशाली होता कि कवि भी सोने लगते। उसके बाद थके हुए मुख्य अतिथि कार्यक्रम के समापन तक सोफाजी पर ऊंघते रहते। कविता ने उनसे और उन्होंने कविता से कुछ लेना-देना नहीं होता। सिर्फ उन्हें ब्रांडेड कप-प्लेट में चाय पेश की जाती। इसी तरह से हिंदी-हिंदी करते सितंबर समापन की तरफ बढ़ जाता और हिंदी एक माह संजीदा सेवा करवाने के बाद अधिक विकसित होकर, थक कर विश्रामालय चली जाती।

प्रभात कुमार

स्वतंत्र लेखक


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