रद्द नहीं होगी दो जजों की नियुक्ति; SC का फैसला, नौ साल की सेवाओं को खारिज नहीं किया जा सकता

By: Nov 22nd, 2023 12:07 am

विधि संवाददाता — शिमला

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश ज्यूडिशियल सविर्सेस के तहत चयनित दो सिविल जजों को बड़ी राहत देते हुए उनकी नियुक्तियों को रद्द करने से इनकार कर दिया। प्रदेश हाईकोर्ट ने इनकी नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को स्वीकारते हुए इनके चयन और नियुक्ति को रद्द कर दिया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को कानूनी रूप से सही ठहराया, परंतु इन जजों की नौ साल से अधिक की लंबी सेवा संबंधी तथ्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें न्यायिक सेवा से बाहर करना उचित नहीं समझा। मामले के अनुसार प्रदेश हाई कोर्ट ने दो सिविल जजों की नियुक्तियों को अवैध ठहराते हुए उनकी नियुक्तियां खारिज कर दी थीं। इस फैसले को दोनों प्रार्थियों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सिविल जज विवेक कायथ व आकांक्षा डोगरा की नियुक्तियों को रद्द करने का फैसला सुनाया था। दोनों जज वर्ष 2013 बैच के एचपीजेएस अधिकारी थे। मामलों का निपटारा करते हुए कोर्ट ने पाया था कि दोनों जजों की नियुक्तियां उन पदों के खिलाफ की गई, जिनका कोई विज्ञापन नहीं दिया गया। बिना विज्ञापन के इन पदों को भरने पर कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग को चेताया कि भविष्य में ऐसी लापरवाही न करे।

पहली फरवरी, 2013 को प्रदेश लोक सेवा आयोग ने सिविल जजों के आठ रिक्त पदों को भरने के लिए विज्ञापन के माध्यम से आवेदन आमंत्रित किए। इनमें छह पद पहले से रिक्त थे और दो पद भविष्य में रिक्त होने थे। आयोग ने अंतिम परिणाम निकाल कर कुल आठ अभ्यर्थियों की नियुक्तियों की अनुशंसा सरकार से की व अन्य सफल अभ्यर्थियों की एक लिस्ट भी तैयार की। इस बीच प्रदेश में दो सिविल जजों के अतिरिक्त पद सृजित किए गए। लोक सेवा आयोग ने इन दो पदों को सिलेक्ट लिस्ट से भरने की प्रक्रिया आरंभ की और विवेक कायथ और आकांक्षा डोगरा को नियुक्ति देने की अनुशंसा की। सरकार ने इन्हें नियुक्तियां भी दे दी थी। कोर्ट ने दोनों की नियुक्तियों को रद्द करते हुए कहा कि इन नए सृजित पदों को कानूनन विज्ञापित किया जाना जरूरी था, ताकि अन्य योग्यता रखने वाले अभ्यर्थियों को इन पदों के लिए प्रतिस्पर्धा का मौका भी मिलता। कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया था कि इन जजों की नियुक्तियां रद्द होने से इन पदों को वर्ष 2021 की रिक्तियां माना जाए व इन्हें भरने की प्रक्रिया कानून के अनुसार की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को कानूनन सही ठहराया, परंतु इनकी नौ साल से लंबी सेवा को ध्यान में रखते हुए दोनों जजों की नियुक्तियों को रद्द करने के आदेशों को खारिज कर दिया।

अब 24 को होगी वाइल्ड फ्लावर हॉल केस की सुनवाई

विधि संवाददाता — शिमला

प्रदेश हाई कोर्ट में वाइल्ड फ्लावर हॉल से जुड़े मामले पर सुनवाई 24 नवंबर के लिए टल गई। इस मामले में कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा वाइल्ड फ्लावर हॉल होटल छराबड़ा को अपने कब्जे में लेने के आदेशों पर रोक लगा रखी है। प्रदेश सरकार ने बीते शुक्रवार को वाइल्ड फ्लावर हॉल होटल का प्रबंधन और संपत्ति का कब्जा अपने हाथों में लेने के लिए कार्यकारी आदेश जारी किए थे। ओबेरॉय होटल ग्रुप ईआईएच कंपनी लिमिटेड ने शनिवार को हाई कोर्ट में आवेदन दायर कर कोर्ट से उक्त सरकारी आदेशों पर रोक लगाने की गुहार लगाई थी। सरकार का कहना था कि उसके आदेश हाई कोर्ट द्वारा इसी मुद्दे से जुड़े मामले में पारित आदेशों की अनुपालना में जारी किए गए थे, जबकि कंपनी का कहना था कि हाई कोर्ट ने उक्त होटल की संपत्ति और प्रबंधन को अपने अधीन लेने के कोई आदेश पारित नहीं किए हैं। हाई कोर्ट ने तो होटल की संपत्ति को अपने कब्जे में लेने के बारे मेंसरकार से उसका विकल्प पूछा था।

सरकार को अपना विकल्प 15 दिसंबर को कोर्ट के समक्ष रखना था। इसके बाद हाई कोर्ट ने आर्बिट्रेशन अवार्ड में दिए आदेशों की अनुपालना करवाने बारे वांछित आदेश पारित करने थे। कंपनी की दलील थी कि सरकार ने जल्दबाजी दिखाते हुए हाई कोर्ट के आदेशों को अन्यथा लेते हुए उनकी कंपनी के वाइल्ड फ्लावर हॉल का प्रबंधन और संपत्ति को अपने अधीन लेने के आदेश जारी कर दिए। कोर्ट ने प्रार्थी कंपनी की दलीलों से फिलहाल सहमति जताते हुए कहा कि कोर्ट ने केवल सरकार से उसका विकल्प पूछा था न कि संपत्ति और प्रबंधन को अपने अधीन लेने के आदेश दिए। हाई कोर्ट ने उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए प्रदेश सरकार के आदेशों पर रोक लगाई और आदेश दिए थे कि वह वह होटल के प्रबंधन और संपति के कब्जे में दखल न दे।