ईवीएम और ‘गौमूत्र’ राजनीति

By: Dec 7th, 2023 12:05 am

ये कुंठित और घिसे-पिटे आरोप हैं। चुनावी जनादेश के बाद मतदान की ईवीएम को कोसना विपक्ष की फितरत रही है। उसके आरोप रहे हैं कि ईवीएम में चिप का इस्तेमाल किया जाता है, लिहाजा उसे ‘हैक’ किया जा सकता है। ऐसी दलीलें दी जाती रही हैं मानो देश भर की ईवीएम में भाजपा घुस कर बैठी है और वह जनादेश को पलट देती है। यह हमारे लोकतंत्र और करोड़ों मतदाताओं का अपमान भी है। दिसंबर, 1998 में ‘जनप्रतिनिधित्व कानून’ में संशोधन किया गया था और बैलेट पेपर के स्थान पर ईवीएम के जरिए मतदान करने की व्यवस्था लागू की गई थी। उसके बाद 2004 का लोकसभा चुनाव सबसे महत्वपूर्ण था, जिसमें करीब 17.5 लाख ईवीएम का इस्तेमाल किया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के ‘भारत उदय’ नारे के बावजूद भाजपा चुनाव हार गई और कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष का गठबंधन बना-यूपीए। मई, 2014 तक उसने दो सत्ता-काल देखे। उस दौरान ईवीएम से ही मतदान कराए गए। कहीं विपक्ष जीता, तो कहीं भाजपा की सत्ता आई। आज भी देश के 18 राज्यों में भाजपा-एनडीए और 13 राज्यों में कांग्रेस, वाममोर्चा और साथी दलों की सरकारें हैं। हाल ही में तेलंगाना में कांग्रेस को जनादेश ईवीएम के जरिए ही प्राप्त हुआ है। राज्य के नए, कांग्रेसी मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी बने हैं। इसके पहले कर्नाटक और हिमाचल में कांग्रेस जीती थी और वहां उसकी सरकारें काम कर रही हैं। जिन राज्यों-मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान-में कांग्रेस अब पराजित हुई है, वहां 2018 में उसे ही, ईवीएम के जरिए, जनादेश हासिल हुए थे। अब कांग्रेस नेताओं के अलावा, सपा, बसपा और नेशनल कॉन्फ्रेंस आदि विपक्षी दलों ने भी ईवीएम में ‘भाजपा के भूत’ होने की कुंठित दलीलें दी हैं। विरोध सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि द्रमुक सांसद सेंथिल कुमार ने लोकसभा में ही बयान देकर जनादेश को ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ करने की मंशा जाहिर की है। उन्होंने कहा कि भाजपा हिंदी पट्टी के ‘गौमूत्र’ वाले राज्यों में ही चुनाव जीतती है।

हालांकि इस कथन को लोकसभा की कार्यवाही के रिकॉर्ड से बाहर कर दिया गया है, लेकिन यह अपमान कौन सहेगा? द्रमुक के नेताओं ने ही ‘सनातन’ के समूल नाश की बात कही थी और उसकी तुलना एड्स और कोढ़ जैसी बीमारियों से की थी। क्या ऐसी गालियां देना राजनीति के लिए जरूरी है? द्रमुक विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का ही घटक-दल है। कांग्रेस के कई नेताओं ने द्रमुक सांसद के ऐसे बयान की भत्र्सना की है। माफी मांगने के आग्रह भी किए गए। अंतत: सांसद को माफी मांगनी पड़ी, लेकिन ऐसा भाजपा-विरोध देश की ‘विविधता में एकता’ संस्कृति का अपमान और उल्लंघन है। सवाल है कि क्या ऐसी विभाजक राजनीति के जरिए ही 2024 का आम चुनाव जीता जा सकता है? क्या यह विभाजनकारी मानसिकता ही विपक्ष का नया राजनीतिक एजेंडा है? क्या देश में गौ, गंगा, गायत्री, गीता का अपमान बर्दाश्त किया जा सकता है? लोकतंत्र में जनादेश ही अंतिम निर्णय है। वह जनता का निर्णायक रुख है। उसी के आधार पर देश में, राज्यों में, उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम में सत्ताएं तय होती रही हैं। जहां तक ईवीएम का प्रश्न है, तो उससे जुड़े विवाद सर्वोच्च अदालत तक जा चुके हैं। चुनाव आयोग ने भी सर्वदलीय निमंत्रण दिया था और मशीन में गड़बड़ी निकालने की चुनौती दी थी। उसे विपक्ष ने स्वीकार क्यों नहीं किया? अब भी संशय में डूबा विपक्ष या उनका कोई भी प्रतिनिधि उचित मंच में ईवीएम को चुनौती दे सकता है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लिहाजा विपक्ष की गुत्थियों को सुलझाया जाएगा। ऐसे हर पराजित जनादेश के बाद अनर्गल अलाप करना व्यर्थ और बेमानी है।


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