हिमाचली हिंदी कहानी : विकास यात्रा-34

By: Dec 9th, 2023 7:23 pm

कहानी के प्रभाव क्षेत्र में उभरा हिमाचली सृजन, अब अपनी प्रासंगिकता और पुरुषार्थ के साथ परिवेश का प्रतिनिधित्व भी कर रहा है। गद्य साहित्य के गंतव्य को छूते संदर्भों में हिमाचल के घटनाक्रम, जीवन शैली, सामाजिक विडंबनाओं, चीखते पहाड़ों का दर्द, विस्थापन की पीड़ा और आर्थिक अपराधों को समेटती कहानी की कथावस्तु, चरित्र चित्रण, भाषा शैली व उद्देश्यों की समीक्षा करती यह शृंखला। कहानी का यह संसार कल्पना-परिकल्पना और यथार्थ की मिट्टी को विविध सांचों में कितना ढाल पाया। कहानी की यात्रा के मार्मिक, भावनात्मक और कलात्मक पहलुओं पर एक विस्तृत दृष्टि डाल रहे हैं वरिष्ठ समीक्षक एवं मर्मज्ञ साहित्यकार डा. हेमराज कौशिक, आरंभिक विवेचन के साथ किस्त-34

हिमाचल का कहानी संसार

विमर्श के बिंदु

1. हिमाचल की कहानी यात्रा
2. कहानीकारों का विश्लेषण
3. कहानी की जगह, जिरह और परिवेश
4. राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचली कहानी की गूंज
5. हिमाचल के आलोचना पक्ष में कहानी
6. हिमाचल के कहानीकारों का बौद्धिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक व राजनीतिक पक्ष

लेखक का परिचय

नाम : डॉ. हेमराज कौशिक, जन्म : 9 दिसम्बर 1949 को जिला सोलन के अंतर्गत अर्की तहसील के बातल गांव में। पिता का नाम : श्री जयानंद कौशिक, माता का नाम : श्रीमती चिन्तामणि कौशिक, शिक्षा : एमए, एमएड, एम. फिल, पीएचडी (हिन्दी), व्यवसाय : हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग में सैंतीस वर्षों तक हिन्दी प्राध्यापक का कार्य करते हुए प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त। कुल प्रकाशित पुस्तकें : 17, मुख्य पुस्तकें : अमृतलाल नागर के उपन्यास, मूल्य और हिंदी उपन्यास, कथा की दुनिया : एक प्रत्यवलोकन, साहित्य सेवी राजनेता शांता कुमार, साहित्य के आस्वाद, क्रांतिकारी साहित्यकार यशपाल और कथा समय की गतिशीलता। पुरस्कार एवं सम्मान : 1. वर्ष 1991 के लिए राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से भारत के राष्ट्रपति द्वारा अलंकृत, 2. हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा राष्ट्रभाषा हिन्दी की सतत उत्कृष्ट एवं समर्पित सेवा के लिए सरस्वती सम्मान से 1998 में राष्ट्रभाषा सम्मेलन में अलंकृत, 3. आथर्ज गिल्ड ऑफ हिमाचल (पंजी.) द्वारा साहित्य सृजन में योगदान के लिए 2011 का लेखक सम्मान, भुट्टी वीवर्ज कोआप्रेटिव सोसाइटी लिमिटिड द्वारा वर्ष 2018 के वेदराम राष्ट्रीय पुरस्कार से अलंकृत, कला, भाषा, संस्कृति और समाज के लिए समर्पित संस्था नवल प्रयास द्वारा धर्म प्रकाश साहित्य रतन सम्मान 2018 से अलंकृत, मानव कल्याण समिति अर्की, जिला सोलन, हिमाचल प्रदेश द्वारा साहित्य के लिए अनन्य योगदान के लिए सम्मान, प्रगतिशील साहित्यिक पत्रिका इरावती के द्वितीय इरावती 2018 के सम्मान से अलंकृत, पल्लव काव्य मंच, रामपुर, उत्तर प्रदेश का वर्ष 2019 के लिए ‘डॉ. रामविलास शर्मा’ राष्ट्रीय सम्मान, दिव्य हिमाचल के प्रतिष्ठित सम्मान ‘हिमाचल एक्सीलेंस अवार्ड’ ‘सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार’ सम्मान 2019-2020 के लिए अलंकृत और हिमाचल प्रदेश सिरमौर कला संगम द्वारा डॉ. परमार पुरस्कार।

डा. हेमराज कौशिक
अतिथि संपादक
मो.-9418010646

-(पिछले अंक का शेष भाग)
‘बूचडख़ाना’ में अस्पतालों में डॉक्टर और कमीशन एजेंटों की परस्पर सांठगांठ और रोगियों के प्रति उपेक्षापूर्ण और उत्तरदायित्वविहीन व्यवहार को अंकित किया है। ‘अंधा युग’ में वृद्ध जनों के प्रति घर में और बाहर युवा पीढ़ी के कुव्यवहार को व्यंजित किया है। ‘सियानी अम्मां’ में भी परिवार की नयी पीढ़ी तथा बहू की बूढ़ी दादी के प्रति कृतघ्नता चित्रित की गई है। घर के सात बच्चों का पालन-पोषण करने वाली दादी जीवन के उत्तरार्ध में रुग्ण अवस्था में घर के कोने में रहने के लिए अभिशप्त होती है। ‘बड़े लोग’ संदर्भित संग्रह की शीर्ष कहानी है। इसमें कहानीकार ने विधवा मां के प्रति गांव में रहने वाली बहुओं और शहर में रहने वाली बहू के सास के प्रति दृष्टिकोण को रेखांकित किया है। बीमारी की अवस्था में दमे की मरीज मां शहर में अपने आईएएस बेटे के साथ उपचार के लिए पहुंचती है तो मां के प्रति शहर में रहने वाली बहू का व्यवहार न केवल असम्मानजनक होता है, अपितु पति के साथ भी बीमार मां को शहर लाने पर कलह और बहस करती है। मां इस स्थिति को अनुभव कर तथा बहू की असंवेदनशीलता, उपेक्षा भाव और अपमान की अवस्था में अकेली ही बस में धक्के खाती और भटकती हुई गांव लौटती है। कहानी संग्रह की अंतिम चार कहानियां पिंजरा खोलो, आंख मिचौली, छोटू की चाल और सच्चा प्रेम बाल कहानियां हैं।

भगवान देव चैतन्य का पहला कहानी संग्रह ‘अपने-अपने इंद्रधनुष’ (1996) शीर्षक से प्रकाशित है। प्रस्तुत संग्रह में उनकी तेरह कहानियां- बेआवाज चीख, सुशीला, मौसी, खंडहर होता हुआ, वापसी, परिवर्तन, सेंध, अनुताप, सडक़ पर, मर्द, उपलब्धि, हाशिए पर और कटे पंख संगृहीत हैं। संदर्भित संग्रह की कहानियों की संवेदना भूमि वैविध्यपूर्ण है। ‘अपने-अपने इंद्रधनुष’ शीर्षक से इस संग्रह में कोई कहानी नहीं है। परंतु कहानीकार ने कहानियों में सामाजिक और राजनीतिक जीवन की विसंगतियों और विद्रूपताओं का जो चित्रण किया है, उसमें जनजीवन के अपने-अपने इंद्रधनुष व्याप्त हैं जो शीर्षक को सार्थक करते हैं। कहानियों की मूल संवेदना आदर्श मूल्यों की स्थापना पर बल देती है और विविध कथा सूत्र ग्रामीण जीवन के पारिवारिक और सामाजिक यथार्थ को निरूपित करते हैं। ग्रामीणों के दुष्कर जीवन और नारी संघर्ष को चित्रित करते हुए लेखक ने नई पीढ़ी की मूल्यहीनता पर भी चिंता व्यक्त की है। इसे ‘मौसी’ और ‘बेआवाज चीख’ आदि कहानियों में बखूबी देखा जा सकता है। माता-पिता के प्रति संतति की उपेक्षापूर्ण दृष्टि और अवमानना को भी रेखांकित किया है। ‘बेआवाज चीख’ की सुनंदा नारी की त्याग भावना को मूर्तिमान करती है। ग्रामीण जीवन में मूल्य संक्रमण से जिन नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है, उसे भी प्रस्तुत संग्रह की कहानियां रूपायित करती हैं।

गुरमीत बेदी का पहला कहानी संग्रह ‘कुहासे में एक चेहरा’ (1996) शीर्षक से प्रकाशित है। इसमें उनकी दस कहानियां- चेहरे, चिडिय़ा, एक था श्यामलाल, काइयां, बर्फ, कुहासे में एक चेहरा, आतंक, भूरी आंखों वाली लडक़ी, गांव अब उदास नहीं रहेगा और ज्वारभाटा संगृहीत हैं। ‘चेहरे’ में कहानीकार ने मजहब के उन चार चेहरों को अनावृत्त किया है जो समाज सेवक और सहयोगी होने का चेहरा ओढ़ कर समाज में सांप्रदायिकता का जहर ही नहीं फैलाते हैं, अपितु आतंकवादी घटनाओं से लोगों की हत्या भी करते हैं। कहानीकार ने उन चेहरों के रूप और वेशभूषा व्यंग्य के धरातल पर मूर्तिमान किए हैं। ‘चिडिय़ा’ में कैंसर पीडि़त पिता की मृत्यु के अनंतर बेटी करुणामूलक आधार पर विद्यालय में शिक्षिका के रूप में नियुक्त होती है, परंतु उसके प्रति दूसरे शिक्षकों के दृष्टिकोण और उनकी बाज दृष्टि को चिडिय़ा और बाज के बिम्ब के द्वारा कहानीकार ने निरूपित किया है। ‘एक था श्यामलाल’ मार्मिक कहानी है। इसमें श्यामलाल कहानी का केंद्रीय चरित्र है जिसके संघर्षपूर्ण और दुखद जीवन के इर्द-गिर्द कहानी के तंतु निर्मित किए गए हैं। श्यामलाल एक ऐसा चरित्र है जो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के दुख-सुख में सहायक रहता है, परंतु उसका निजी जीवन अनेक आघातों से भरा है। पत्नी की अकाल मृत्यु, बड़े बेटे की बस हादसे में मौत, दूसरे लडक़े का कुसंगति के कारण घर से भागना और छात्र नेता बनकर जेल की सलाखों में पहुंचना और बेटी का भरी जवानी में पति द्वारा घर से निकालना आदि घटनाओं से वह अंदर ही अंदर टूट जाता है। बेटी, उसके नन्हे बेटे को जीवन जीने का आलोक मानकर वह शेष जीवन गुजारना चाहता है, परंतु बेटी को तिरस्कृत करने वाला पति कानून के दांव-पेंचों से उसे मां की गोदी से छीन कर ले जाता है। अपने जीवन के उत्तरार्ध में श्यामलाल को एकाकी बेटी की चिंता होती है, जिसे वह नारी आश्रम में छोडक़र स्वयं घर की चौखट पर मृत्यु को प्राप्त होता है। ‘भूरी आंखों वाली लडक़ी’ में मदिरा व्यसनी पिता अपनी जवान बेटी सेठ को दो हजार रुपए में बेचता है। घर से बेटी गायब होती है, कहीं नहीं मिलती। उसकी मां को तब ज्ञात होता है जब उसका मदिरा व्यसनी पति नशे में धुत होकर लौटता है और बेटी बेचने से प्राप्त रुपयों को पत्नी के आगे फेंकता है।

बेटी को वृद्ध विधुर को बेचने की साजिश का उसे तब पता लगता है, उस समय विवाह के लिए कठिन परिश्रम से जोड़े हुए पैसों को दुख, विवशता और आक्रोश में फर्श पर बिखेर देती है। कहानी में दुव्र्यसनी पति की अमानवीयता, संघर्षशील पत्नी और बेटी की दुखद नियति का चित्रण है। ‘गांव अब उदास नहीं रहेगा’ में कहानीकार ने आतंकवाद के साए में गांव में जीवनयापन करने वाले लोगों की भयाक्रांत मनोस्थिति और पलायन की विवशताओं का निरूपण किया है। जसवीर जैसी युवतियां विवाह के केवल छह महीने के पश्चात ही विधवा हो जाती हैं। पति, जेठ और ससुर आतंकवाद के शिकार होते हैं। ‘आतंक’ में कहानीकार ने भीषण सर्दी की रात में बस में सवार दो सरदारों के प्रति लोगों के भय और दृष्टिकोण को रेखांकित किया है। प्रत्येक यात्री भयभीत होता है कि अभी एके-47 चलाकर हत्या कर देंगे। वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता। वे बीच रास्ते में उतरकर अपने गंतव्य को चले जाते हैं। ड्राइवर उन्हें पूछता है ‘आप कैंटीन में कब मिलोगे?’ वे कहते हैं ‘आपके ही सेवक हैं, जब चाहो तो आ जाओ।’ कहानी किसी के प्रति भ्रामक जड़ धारणाओं को खंडित करती है। ‘कुहासे में एक चेहरा’ संग्रह की शीर्ष कहानी है जिसमें उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाला युवक है जिस पर विधवा मां, भाई और दो बहनों के पालन-पोषण का उत्तरदायित्व भी है। ट्यूशन पढ़ाकर गुजारा करने वाला युवक शहर में धन संपन्न गृह स्वामियों के यहां किराए के कमरे में रहता है। गृह स्वामिनी का पति प्राय: कारोबार के सिलसिले में बाहर रहता है। बैंक में कार्यरत गृह स्वामिनी उस बड़ी कोठी में किराए पर रहने वाले युवक से अर्धरात्रि को देह तृप्ति के लिए आती है। युवक के प्रतिरोध करने पर दूसरे दिन प्रात: उस पर अंगूठी चोरी का आरोप लगाकर घर से बाहर मारपीट कर धकेल दिया जाता है। स्वामिनी का मुस्कुराहट वाला रहस्यमय चेहरा कितना क्रूर हो जाता है, यह कहानी प्रतिपादित करती है। ‘ज्वारभाटा’ में पति वियोग की पीड़ा और प्रेम की टीस है जो एक ज्वारभाटे की भांति युवती के चेतन-अचेतन मन को उद्वेलित करती है।
गुरमीत बेदी का अनुभव लोक बहुमुखी है। उनकी कहानियों का कथ्य घर-परिवार की परिधि से निकलकर सामाजिक-समकालीन सरोकारों से संबद्ध स्थितियों का निरूपण करता है। वैयक्तिक परिधि से निकलकर समाज के बृहत्तर परिप्रेक्ष्यों का परिचय देता है। वे चिर-परिचित कथ्य को अपने भाषा कौशल से नवीन रूप में व्यंजित करते हैं। भाषा की सादगी में पात्रों का चित्रात्मक स्वरूप और व्यंग्य की धार उनकी भाषा को विशिष्ट बनाते हैं। कहानियों की कथन शैली की रोचकता और ताजगी पाठक को बांधे रखती है।

श्रीनिवास जोशी का ‘घुघुतिया’ (1997) शीर्षक से कहानी संग्रह प्रकाशित है। प्रस्तुत संग्रह में उनकी सोलह कहानियां- घुघुतिया, छठा मेज, कालू, ताप, ग्रहण, सीख, अंतिम बाजी, मोक्ष, दहेज, परिंदा, गांव अभी जवान है, अंधेरे में, डग्याली की रात, उल्टी गिनती, कछुआ और खरगोश और बाजी संगृहीत हैं। आत्मकथात्मक शैली में लिखी इन कहानियों में गांव के पर्वतीय क्षेत्र के विश्वासों, आस्थाओं, अंधश्रद्धाओं, रूढिय़ों और परंपराओं की पृष्ठभूमि में कहानियों का सृजन हुआ है। श्रीनिवास जोशी की ये कहानियां किसी स्वप्निल संसार की सृष्टि नहीं करती, अपितु पर्वतीय जीवनयापन करने वाले व्यक्तियों, घटनाओं और पर्वतीय परिवेश के यथार्थ को मूर्तिमान करती हैं। क्योंथली, कुमाउंन, बघाटी और पंजाबी बोली के सार्थक एवं स्वाभाविक प्रयोग से जोशी की कहानियों में जीवंतता आई है। उनकी कहानियों में एक ओर कुमाउंन की पहाडिय़ों की स्मृतियां हैं तो दूसरी ओर शिमला की पहाडिय़ों का परिवेश और जीवन है। कहानीकार ने ‘परिंदा’ और ‘ग्रहण’ जैसी कहानियों के माध्यम से पूर्व स्मृतियों के लोक को पुनर्जीवित किया है। संदर्भित संग्रह की ग्रहण, गांव अभी जवान है, डग्याली की रात और दहेज जैसी कहानियां ग्रामीण जीवन के यथार्थ को सामने लाती हैं। छठा मेज तथा कछुआ और खरगोश प्रशासन तंत्र की विकृतियों पर तीव्र कटाक्ष करती हैं। नाटकीय तत्व से ओतप्रोत इन कहानियों का कथ्य सरस और प्रवहमान है।

श्रीनिवास जोशी कथाकार होने के साथ-साथ रंगकर्मी और नाटककार भी हैं। उनकी इस प्रतिभा और कौशल का प्रतिबिंब उनकी कथा कृतियों में मूर्तिमान है। उनकी कहानियों में नाटकीय तत्व और शैली का सौंदर्य विद्यमान है। यही कारण है कि संदर्भित संग्रह की ‘छठा मेज’ शीर्षक कहानी का नाट्य रूपांतरण पर्याप्त चर्चित और लोकप्रिय रहा है। इसका नाट्य रूपांतरण वीरेंद्र शर्मा ने किया था और देशभर के विभिन्न शहरों में अब तक पैंतालीस बार मंचन हो चुका है। यहां यह भी उल्लेख्य है कि इस कहानी का नाट्य रूपांतरण दूरदर्शन दिल्ली के लिए शैलेश डोभाल ने किया था जो भारत के ख्याति लब्ध कवि हैं। ‘छठा मेज’ शीर्षक इस कहानी में छठा मेज कार्यालय के एक कमरे में लगाया जाना निश्चित हुआ है। कमरे में पांच मेजों का प्रयोग करने वाले सभी दफ्तर कर्मी छठा मेज को लगाने का विरोध करते हैं। यहां तक कि कार्यालय के सुपरिंटेंडेंट से इसकी शिकायत भी की जाती है। परंतु जब उन्हें यह ज्ञात होता है कि एक महिला आ रही है जो इस मेज का प्रयोग करेगी तो पांचों पुरुष कर्मी नितांत प्रसन्न होते हैं और छठे मेज को कमरे में लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं। अगले दिन सभी सुंदर वस्त्र धारण करके समय से पूर्व कार्यालय में उपस्थित हो जाते हैं। तभी जाकर चपरासी सूचना देता है कि सुपरिंटेंडेंट ने उनकी बात स्वीकार कर ली है और इस मेज को वह अपने कमरे में लगाना मान गए हैं। ‘डग्याली की रात’ जोशी की चर्चित कहानी है और इस कहानी का नाट्य रूपांतरण स्वयं कहानीकार ने किया था। यहां यह भी उल्लेख्य है कि इस कहानी का नाट्य रूपांतरण आकाशवाणी में आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम आया था। कहानी संग्रह की अंतिम कहानी ‘बाजी’ का नाटक रूपांतरण भी आकाशवाणी से प्रसारित किया गया था।

-(शेष भाग अगले अंक में)

अतुल ने सजाई कविताओं की चौपाल

अतुल कुमार शर्मा अब काव्य संग्रह ‘मुरारी की चौपाल’ लेकर आए हैं। आस्था प्रकाशन गृह से प्रकाशित इस कविता संग्रह का मूल्य 295 रुपए है। अपने मन की बात में कवि लिखते हैं कि चिंतन करते हुए तूफान उमडऩा स्वाभाविक होता है, वे बिखरते विचार ही शब्द रूप बनकर, पन्नों पर झड़ जाते हैं। बस उन्हीं शब्दों को मां शारदे का सुधारस समझकर, कविता रूप में ढालने का प्रयास भर है ‘मुरारी की चौपाल’। इस तूफान में विचारों के घर्षण से निकले शब्दों को मैंने लिपिबद्ध किया जो कविता रूप में बनते चले गए। 102 पृष्ठों में 54 कविताएं संकलित की गई हैं। हर कविता का अपना भाव, अपना रस है। नई पीढ़ी नामक कविता में पथभ्रष्ट हो रही भावी पीढ़ी के बारे में कवि कहता है, ‘आधुनिकता के रथ पर/आरूढ़ होकर/चल पड़ी है नई पीढ़ी/आंखें मूंदकर/अंधेरे की ओर/उजाले के भ्रम में/लगातार सूख रही है/आंगन की तुलसी/और प्रतीक्षा कर रही है/लोटा भरे जल का।’ निष्क्रियता को उकेरती ‘कमजोर तपस्वी’ कविता की पंक्तियां हैं- ‘देखते ही देखते/निकलता जा रहा है/समय/और छूटता जा रहा है/हर मौका/मेरे हाथों से/फिर भी मैं उठने को तैयार नहीं/कालचक्र ठहरने को तैयार नहीं/आज भी/थका-थका सा/मैं निढाल पड़ा हूं।’ ‘एक पाती तुम्हारे नाम’ में कवि कहता है : ‘कलम तो उठा ली/हिम्मत करके/कुछ लिखने को/तुम्हारे नाम/लेकिन पढऩे के बाद/तुम खुश होगी या नाराज/मुझे भी नहीं पता/क्योंकि तुम्हारे तापमान के गिरने या चढऩे का समीकरण/मैंने कभी सीखा ही नहीं/और न ही रट पाया/तुम्हारा विज्ञान/पढऩे की कोशिश भी की/तो बिना किसी प्रैक्टिकल के/लापरवाही तो इस कदर/कि मैं नहीं जान पाया/तुम्हारे सिद्धांतों को भी/तुम्हारा भूगोल/केवल परिवार तक सिमटा हुआ/यानी घर ही तुम्हारा संसार/तुम्हारे इतिहास में/केवल मैं और तुम/साथ में हमारे बच्चे/जाने क्यों…।’ इस तरह अतुल की कविताओं में दार्शनिक अंदाज के दर्शन भी हो जाते हैं।                                                                                                                                         -फीचर डेस्क

पुस्तक/पत्रिका समीक्षा : होयसल मंदिर को ‘प्रणाम पर्यटन’ का नमस्कार

संस्कृति, साहित्य व पर्यटन की त्रैमासिक पत्रिका ‘प्रणाम पर्यटन’ का अक्तूबर-दिसंबर-2023 अंक काफी आकर्षक है। इस अंक से पाठकों को ज्ञात होता है कि कर्नाटक के प्रसिद्ध होयसल मंदिर परिसर (बेेल्लनूर, हलेबिड व सोमनाथपुरा) को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। इसके अलावा कोलकाता में रवींद्र नाथ टैगोर के पावन ‘शांति निकेतन’ स्मारक को भी धरोहर सूची में शामिल किया गया है। इन दोनों स्मारकों पर विस्तृत आलेख पाठकों को आकर्षित करते हैं। पत्रिका के संपादक प्रदीप श्रीवास्तव ने गुम होते मिट्टी के दीयों पर अपनी कलम संपादकीय में चलाई है। संध्या प्रह्लाद का आलेख है – शुक्र ताल, भागवत कथा का उद्गम। मीनू मीना सिंह ने वैष्णो देवी मंदिर का आध्यात्मिक सौंदर्य उकेरा है। उत्तर प्रदेश मेें फौजियों के गांव गहमर पर कलम चलाई है अखंड सिंह गहमरी ने। संध्या गोयल काले पानी की विशेषताएं गिनवा रही हैं। मंडी के पंचवक्त्र मंदिर पर रूपेश्वरी शर्मा का आलेख भी पठनीय है। अर्पिता अग्रवाल बता रही हैं कि त्रिपुरा में दिवाली पर मां काली की पूजा होती है। डिब्रूगढ़ के जगन्नाथ मंदिर पर डोली शाह का लेख भी अपनी ओर आकर्षित करता है। धरमचंद आहूजा गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब जी की आध्यात्मिक विशेषताएं गिनवा रहे हैं। सुशीला शर्मा कहती हैं कि महाराष्ट्र के जेजुरी नगर में खंडोबा मंदिर में हल्दी का भोग चढ़ता है। इसी तरह भोरमदेव को छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाता है। इस विषय पर गोवर्धन यादव का आलेख आकर्षित करता है। वीरों की भूमि मेवाड़ पर कलम चलाई है यशोधरा भटनागर ने। इसके अलावा पत्रिका में कई कवियों ने अपनी कविताओं से पाठकों को भाव-विभोर करने की कोशिश की है। किसी पर्यटक स्थल की सैर करने के लिए पाठक इस अंक को जरूर पढ़ें।

दिवाली की फुलझडिय़ां चलाता अंक

साहित्यिक पत्रिका ‘हिमतरु’ (मासिक) का अक्तूबर-2023 अंक दशहरा-दिवाली विशेषांक के रूप में आया है और इसके अतिथि संपादक हैं राजेंद्र पालमपुरी। वह कहते हैं कि यह पत्रिका प्रदेश ही नहीं, बल्कि विदेश में रह रहे भारतीय नवांकुरों और वरिष्ठ साहित्यकारों को सदैव प्रकाशित करती रही है। प्रदेश, देश तथा विदेश में अपनी पैठ बनाने में पत्रिका सफल रही है। विविध विषयों पर बच्चों की बाल कविताएं पाठकों का मन मोह लेती हैं। दशहरा तथा दिवाली की परंपराओं पर आधारित कई लेख पत्रिका को सुशोभित कर रहे हैं। राकेश मनहास कहते हैं कि दिवाली एक है, पर परंपराएं अनेक हैं। अशोक भार्गव ने कनाडा में भारत की दीपावली की तस्वीर खींची है। मोनिका सिंह कहती हैं कि दिवाली का त्योहार एक आदर्श स्थापित करता है। नमिता शर्मा कहती हैं कि यह उत्सव हमें अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाता है। प्रवीण राणा कहते हैं कि दिवाली अंधकार पर प्रकाश का प्रतीक है।

विप्लव सिंह इसे प्रेम, करुणा व त्याग का प्रतीक बताते हैं। अलका चावला अपने आलेख के जरिए इस बात पर जोर देती हैं कि दिवाली और दशहरा पर्व हमारे राष्ट्र के लिए गौरवशाली त्योहार हैं। ललिता कश्यप कहती हैं कि दशहरा का मतलब है दस बुराइयों को हर लेना। श्याम लाल हांडा कहते हैं कि कुल्लू के मेले परंपराओं व संस्कृति को संजोए हुए हैं। शबनम आर्य कहती हैं कि दशहरा हमारे साथ बढ़ता है। राजा जरनैल सिंह विदेशों में दिवाली की रौशनी का उजाला उकेर रहे हैं। नेपाल में दशहरा किस तरह मनाया जाता है, यह बता रहे हैं अतुल पोखरेल। कुल्लू दशहरे पर कलम चलाई है संजीव कुमार सुधांशु ने। रोमिता शर्मा कहती हैं कि भीतर का रावण दहन जरूरी है। किरण बाला का आलेख कुल्लू की दशहरा परंपराओं पर है। तेंजिन टोपेन कहती हैं कि प्रकृति से छेड़छाड़ के गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। भगवान प्रकाश चौल पड़ेई (भोज नृत्य) पर प्रकाश डाल रहे हैं। इनके अलावा उदयवीर, इंदु पटियाल, कविता सूद, कविता गुप्ता, प्रेम नंदन, कृष्णा ठाकुर, राकेश, पौमिला, प्रोमिला, सुनील, बसंत राघव, युगल डोगरा, दीया मल्होत्रा, शेर सिंह, कविता गुप्ता, रतन चंद रत्नेश, सुशांत, महेश, आदित्य, रंजना, संजय कुमार और विक्रम सिंह ने भी अपनी-अपनी रचनाओं से पाठकों को भाव-विभोर किया है।

कविता

कोई चिंगारी सुलगे तो, उसे हल्के में मत लेना
कोई चिंगारी सुलगे तो, उसे हल्के में
मत लेना,
कोई मजबूर रोए तो, उसे हल्के में
मत लेना।
सियासी लोग तो हर मसअले का लुत्$फ लेते हंै,
सियासत •ाह्र बोए तो, उसे हल्के में
मत लेना।
कोई दहकान कर ले खुदकुशी कर्जों से बोझिल हो,
कोई सपना भी टूटे तो, उसे हल्के में
मत लेना।
कहां हैं सबकी किस्मत में मुहब्बत के हसीं सपने,
उन्हें अपना ही लूटे तो, उसे हल्के में
मत लेना।
कमर के टूटने तक ही झुका जा सकता
है साथी,
सब्र का बांध टूटे तो, उसे हल्के में
मत लेना।
धधकती हों दिशाएं और भरा हो डर $िफजाओं में,
वतन गर फिर भी सोए तो, उसे हल्के में मत लेना।
अगर पीपल के पेड़ों से परिंदे डर के
उड़ जाएं,
‘शलभ’ नाखून कुतरे तो, उसे हल्के में मत लेना।

-डा. विनोद प्रकाश गुप्ता ‘शलभ’


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